अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की चेतावनी: सैन्य बेस के इस्तेमाल पर कड़ा रुख

अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने उन देशों को चेतावनी दी है जो युद्ध के समय अमेरिकी सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देते। उन्होंने विशेष रूप से ईरान संघर्ष और यूरोपीय देशों के रुख का उल्लेख करते हुए सैन्य उपस्थिति पर पुनर्विचार की बात कही है।

वाशिंगटन डीसी में अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी करते हुए उन सहयोगी देशों को चेतावनी दी है जो संकट के समय अमेरिकी सैन्य ठिकानों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाते हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले ग्राहम ने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका को जरूरत पड़ने पर अपने ही ठिकानों का उपयोग करने की अनुमति नहीं मिलती है, तो उन देशों में सैन्य उपस्थिति बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह बयान विशेष रूप से ईरान के साथ चल रहे मौजूदा तनाव और यूरोपीय देशों द्वारा अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए अपनी जमीन के उपयोग से इनकार करने के संदर्भ में आया है।

यूरोपीय देशों का रुख और अमेरिकी सैन्य उपस्थिति

अधिकारियों के अनुसार स्पेन और जर्मनी जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने ईरान के साथ संभावित संघर्ष में अपनी भूमि पर स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों के उपयोग की अनुमति देने से मना कर दिया है। वर्तमान में अमेरिका की वैश्विक सैन्य उपस्थिति अत्यंत व्यापक है, जिसमें 80 से अधिक देशों में 750 से अधिक सैन्य ठिकाने शामिल हैं। इनमें से 128 प्रमुख बेस 55 अलग-अलग देशों में स्थित हैं। यूरोप के विभिन्न देशों में अमेरिका के लगभग तीन दर्जन सैन्य बेस हैं, जहां करीब 80000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। जर्मनी में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य आधार मौजूद है, जबकि इटली, ब्रिटेन, स्पेन और पोलैंड में भी महत्वपूर्ण ठिकाने हैं।

मध्य पूर्व में सैन्य नेटवर्क और रणनीतिक चुनौतियां

मध्य पूर्व के क्षेत्र में अमेरिका का एक मजबूत सैन्य नेटवर्क है जो दस देशों में फैला हुआ है। कतर में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य बेस स्थित है, जबकि बहरीन में अमेरिकी नौसेना की 5th फ्लीट का मुख्यालय है। कुल मिलाकर मध्य पूर्व में अमेरिका के लगभग 20 सैन्य ठिकाने सक्रिय हैं। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका वर्तमान में ईरान के खिलाफ अपने इसी नेटवर्क का उपयोग कर रहा है। इसके जवाब में ईरान इन देशों को निशाना बनाने की चेतावनी दे रहा है। यही कारण है कि कई यूरोपीय देश अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति देने से कतरा रहे हैं, ताकि उन्हें ईरान के सीधे हमले का सामना न करना पड़े।

नाटो देशों पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणी

सीनेटर ग्राहम के बयान से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी नाटो (NATO) देशों की भूमिका पर कड़े सवाल उठाए थे। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अमेरिका के समर्थन के बिना नाटो की स्थिति अत्यंत कमजोर है। उन्होंने आरोप लगाया कि नाटो के सदस्य देश परमाणु शक्ति संपन्न ईरान को रोकने के सैन्य प्रयासों में शामिल होने से पीछे हट रहे हैं। ट्रंप के अनुसार जब सैन्य अभियानों के माध्यम से सफलता प्राप्त कर ली गई है, तब ये देश तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर शिकायत कर रहे हैं, जबकि उन्होंने संघर्ष के समय आवश्यक सहयोग प्रदान नहीं किया।

होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक तेल आपूर्ति का संकट

राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया है। उन्होंने कहा कि नाटो देश इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को खुला रखने में मदद करने के इच्छुक नहीं हैं, जबकि यह वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अनिवार्य है। ट्रंप के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा सुनिश्चित करना एक आवश्यक सैन्य कार्रवाई है और इसकी अस्थिरता ही तेल की ऊंची कीमतों का मुख्य कारण है। उन्होंने सहयोगी देशों के इस व्यवहार को अनुचित बताते हुए कहा कि अमेरिका भविष्य में इन देशों के रुख को ध्यान में रखेगा।