टीएमसी में बगावत की आग: क्या पश्चिम बंगाल में सच होने जा रहा है महाराष्ट्र मॉडल?

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बड़े आंतरिक संकट का सामना कर रही है, जहाँ 50 से 60 विधायकों के असंतुष्ट होने की खबरें हैं। नेता प्रतिपक्ष के चयन में फर्जी हस्ताक्षर के आरोपों और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ सीआईडी जांच के बीच, 'महाराष्ट्र मॉडल' जैसी राजनीतिक टूट की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त हलचल मची हुई है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) एक गंभीर आंतरिक कलह के दौर से गुजर रही है। एक तरफ पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी अपने भतीजे पर हुए हमले के विरोध में सड़कों पर उतरी हुई हैं, तो दूसरी तरफ उनकी अपनी ही पार्टी के भीतर बगावत के बादल गहरे होते जा रहे हैं। राज्य में नई सरकार के गठन के करीब एक महीने बाद ही टीएमसी में ऐसी स्थिति बन गई है कि अब 'महाराष्ट्र मॉडल' की चर्चाएं हर तरफ सुनाई दे रही हैं। यह आंतरिक संकट पार्टी की स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

रानी रासमणि एवेन्यू में ममता का धरना

मंगलवार को ममता बनर्जी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार के खिलाफ कोलकाता के रानी रासमणि एवेन्यू में धरने पर बैठ गईं। इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य कारण उनके भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ-साथ कल्याण बनर्जी पर हुए हमले के खिलाफ कार्रवाई की मांग करना है। ममता बनर्जी का सीधा आरोप है कि वर्तमान सरकार हमलावरों के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने में विफल रही है। हालांकि कोलकाता पुलिस ने इस प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं दी थी, लेकिन ममता बनर्जी अपने समर्थकों के साथ धरने पर डटी रहीं और धरना स्थल से उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विधायकों को उनके घर-घर जाकर धमकाया जा रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके पास अभिषेक बनर्जी पर हमले की साजिश से जुड़ी एक रिकॉर्डिंग है, जिसमें 'मार-मार' जैसे शब्द साफ सुने जा सकते हैं।

क्या है 'महाराष्ट्र मॉडल' और बगावत का सच?

ममता बनर्जी के सड़क पर उतरने से भी ज्यादा चर्चा उनकी पार्टी के भीतर पनप रही बगावत की हो रही है। राजनीतिक गलियारों में इसे 'महाराष्ट्र मॉडल' का नाम दिया जा रहा है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी और बड़ी संख्या में विधायकों को साथ लेकर एक अलग गुट बना लिया था, जिसने बाद में पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी दावा किया था। बंगाल में भी कुछ वैसी ही स्थिति बनती दिख रही है और खबरों के अनुसार, टीएमसी के असंतुष्ट विधायक गुप्त बैठकें कर रहे हैं और उनका दावा है कि उन्हें 50 से 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। यह संख्या पार्टी में एक बड़ी टूट की ओर इशारा कर रही है।

फर्जी हस्ताक्षर विवाद और सीआईडी की कार्रवाई

इस पूरे विवाद की जड़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन से जुड़ी है। इस पद के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन जल्द ही यह मामला विवादों में घिर गया। आरोप लगा कि प्रस्ताव पत्र पर कई विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी तरीके से किए गए हैं। इस मामले में टीएमसी के ही दो विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष से शिकायत की, जिसके बाद सीआईडी ने जांच शुरू कर दी। पार्टी ने शिकायत करने वाले दोनों विधायकों को निष्कासित कर दिया, जिससे असंतोष और बढ़ गया। बगावत की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब ममता बनर्जी ने रविवार को विधायकों की बैठक बुलाई, तो उसमें केवल 20 विधायक ही शामिल हुए, जबकि करीब 60 विधायक इस बैठक से नदारद रहे और अपनी अलग रणनीति बनाने में जुटे रहे।

बागी नेताओं के तेवर और भाजपा की प्रतिक्रिया

टीएमसी से निलंबित नेता रिजू दत्ता ने खुले तौर पर बगावती रुख अपना लिया है और उन्होंने कहा कि सभी बागी विधायक जल्द ही स्पीकर से मुलाकात करेंगे। उनका दावा है कि करीब 50 विधायक उनके साथ हैं और वही 'असली टीएमसी' हैं। उन्होंने ऋताब्रता बंदोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने का प्रस्ताव भी रखा है। दूसरी ओर, बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने इस स्थिति पर तंज कसते हुए कहा कि बंगाल की जनता ममता बनर्जी को अब प्रदर्शन नहीं करने देगी क्योंकि उनकी अपनी ही पार्टी के लोग उनके खिलाफ खड़े हो गए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल टीएमसी के नेताओं के लिए भाजपा के दरवाजे बंद हैं और इस बीच, सीआईडी ने हस्ताक्षर जालसाजी मामले में अपनी जांच तेज करते हुए अभिषेक बनर्जी को पूछताछ के लिए नोटिस भेजा है, जो टीएमसी नेतृत्व के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है।