आज की युवा पीढ़ी में 40 साल की उम्र तक एक करोड़ रुपये का वित्तीय कोष बनाने का सपना तेजी से बढ़ रहा है। यह एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए अक्सर लोग उच्च रिटर्न वाले निवेश विकल्पों की तलाश में रहते हैं। हालांकि, वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि करोड़पति बनने का असली मंत्र सिर्फ उच्च रिटर्न का पीछा करना नहीं, बल्कि निवेश में निरंतरता और अनुशासन बनाए रखना है और रिटायरमेंट स्ट्रैटेजिस्ट मिलिंद देवगांवकर ने इस अवधारणा को अपने अनुभव के आधार पर स्पष्ट किया है, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे निरंतरता ही वित्तीय सफलता की कुंजी है।
उच्च रिटर्न का भ्रम और निरंतरता का महत्व
अक्सर निवेशक सोचते हैं कि उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए ऐसे निवेश साधनों की आवश्यकता है जो असाधारण रूप से उच्च रिटर्न प्रदान करें और यह सोच उन्हें जोखिम भरे निवेशों की ओर धकेल सकती है, या फिर वे बाजार की अस्थिरता के दौरान घबराकर अपने निवेश को रोक देते हैं। मिलिंद देवगांवकर इस बात पर जोर देते हैं कि 1 करोड़ रुपये का कॉर्पस। बनाने का वास्तविक रहस्य उच्च रिटर्न में नहीं, बल्कि निवेश की निरंतरता में निहित है। उनका मानना है कि एक स्थिर और अनुशासित निवेश रणनीति, भले ही। वह मध्यम रिटर्न दे, लंबी अवधि में अधिक प्रभावी साबित होती है। यह निवेशकों को बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाती है और उन्हें। अपने वित्तीय लक्ष्यों की ओर लगातार बढ़ने में मदद करती है। देवगांवकर अपने लिंक्डइन पोस्ट में बताते हैं कि उन्हें अक्सर 20 के दशक के अंत में अपने ग्राहकों से यह सुनने को मिलता है कि वे 40 की उम्र तक करोड़पति बनना चाहते हैं। हालांकि, उनके अनुभव में, अधिकांश निवेशक इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक निरंतरता बनाए रखने में विफल रहते हैं। उन्होंने खुलासा किया कि उनके पास आने वाले हर 10 में से 6 निवेशक 3 से 5 साल के भीतर ही अपनी सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) को बंद कर देते हैं या रोक देते हैं। यह आंकड़ा इस बात को दर्शाता है कि वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करना एक बात है, लेकिन उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक अनुशासन और धैर्य बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। यह प्रवृत्ति अक्सर निवेशकों को उनके दीर्घकालिक वित्तीय लक्ष्यों से दूर कर देती है।
निवेशकों के सामने निरंतरता की चुनौती
**1 करोड़ का कॉर्पस क्यों नहीं बन पाता? निवेशकों द्वारा अपनी SIP बंद करने या रोकने के पीछे कई सामान्य कारण होते हैं। देवगांवकर के अनुसार, जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं जैसे शादी, घर के लिए डाउन पेमेंट, नई कार खरीदना या नौकरी बदलना, अक्सर लोगों को अपने निवेश को बीच में ही निकालने के लिए मजबूर कर देती हैं। ये ऐसी स्थितियां हैं जहां तत्काल वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए निवेशित धन का उपयोग किया जाता है। कागज पर, वित्तीय योजनाएं बहुत अच्छी दिख सकती हैं, लेकिन वास्तविक चुनौती यह है कि बाजार में गिरावट हो, नौकरी छूट जाए या परिवार में कोई आपात स्थिति आ जाए, तब भी निवेश को जारी रखना। इन अप्रत्याशित परिस्थितियों में भी निवेश को बनाए रखना ही असली परीक्षा होती है और जो इसमें सफल होते हैं, वे ही अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर पाते हैं।
लक्ष्य कैसे प्राप्त करें: व्यावहारिक उदाहरण
मिलिंद देवगांवकर ने दो व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि कैसे 40 की उम्र तक 1 करोड़ रुपये का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है और यदि कोई व्यक्ति 25 साल की उम्र में निवेश शुरू करता है और उसकी सालाना आय 12 लाख रुपये है, तो उसे हर महीने लगभग 21,500 रुपये की SIP करनी होगी। वहीं, यदि कोई व्यक्ति 30 साल की उम्र में निवेश शुरू करता है और उसकी सालाना आय 18 लाख रुपये है, तो उसे हर महीने 45,000 रुपये की SIP करनी होगी। इन दोनों ही मामलों में, 12% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ, 40 की उम्र तक 1 करोड़ रुपये का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। हालांकि, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल सही निवेश विकल्प चुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए कड़े अनुशासन और जीवनशैली पर नियंत्रण की भी आवश्यकता होती है ताकि मासिक निवेश को बिना किसी बाधा के जारी रखा जा सके।
विशेषज्ञ की महत्वपूर्ण सलाह
देवगांवकर ने युवा निवेशकों को कुछ महत्वपूर्ण सलाह दी है और सबसे पहले,
जल्दी शुरुआत करें
। उनका कहना है कि 25 साल की उम्र में हर महीने 5,000 रुपये का निवेश करना, 32 साल की उम्र में 15,000 रुपये का निवेश करने से कहीं बेहतर है। यह चक्रवृद्धि की शक्ति का लाभ उठाने में मदद करता है और कम राशि के साथ भी बड़ा फंड बनाने में सहायक होता है। दूसरा,
रिटर्न नहीं, निरंतरता पर ध्यान दें
। वे बताते हैं कि जो निवेशक बाजार में हर गिरावट पर अपनी SIP रोक देते हैं, वे अंततः नुकसान में रहते हैं। बाजार की अस्थिरता के बावजूद निवेश जारी रखना महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह लंबी अवधि में औसत लागत का लाभ देता है।
महंगाई के प्रभाव को न भूलें
एक और महत्वपूर्ण पहलू जिस पर देवगांवकर ने प्रकाश डाला है, वह है महंगाई का प्रभाव। वे चेतावनी देते हैं कि 6% की वार्षिक महंगाई दर के साथ, 40 की उम्र में 1 करोड़ रुपये के फंड का वास्तविक मूल्य आज के हिसाब से केवल 55 लाख रुपये ही बचेगा। इसका मतलब है कि वित्तीय योजना बनाते समय भविष्य की क्रय शक्ति को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक है। निवेशकों को अपने लक्ष्यों को महंगाई-समायोजित तरीके से निर्धारित करना चाहिए ताकि वे भविष्य में अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा कर सकें और उनके फंड का वास्तविक मूल्य समय के साथ कम न हो।
