राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने प्रदेश के राजकीय वृक्ष खेजड़ी के संरक्षण को लेकर एक बड़ी घोषणा की है। 16वीं विधानसभा के बजट सत्र के दौरान राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार खेजड़ी को बचाने के लिए एक विशेष कानून लेकर आएगी। मुख्यमंत्री ने सदन में पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि खेजड़ी राजस्थान का 'कल्पवृक्ष' है और इसकी सुरक्षा के लिए कड़े कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है। यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब बीकानेर सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में खेजड़ी वृक्षों की कटाई को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
विधानसभा की कार्यवाही के दौरान मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रस्तावित कानून का मसौदा तैयार करने के निर्देश दे दिए गए हैं। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि इस कानून के माध्यम से खेजड़ी की कटाई पर प्रभावी रोक लगाई जाएगी और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान होगा। मुख्यमंत्री का यह संबोधन मूल रूप से बुधवार 4 फरवरी को होना था, लेकिन कार्यमंत्रणा समिति की बैठक के बाद इसे एक दिन के लिए बढ़ा दिया गया था। गुरुवार 5 फरवरी को मुख्यमंत्री ने विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए इस महत्वपूर्ण विधायी कदम की जानकारी साझा की।
विधानसभा में मुख्यमंत्री का संबोधन और विधायी प्रक्रिया
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सदन में कहा कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में खेजड़ी की भूमिका अतुलनीय है। उन्होंने कहा कि सरकार इस दिशा में गंभीर है और जल्द ही इस कानून का मसौदा सदन के पटल पर रखा जाएगा। विधायी विशेषज्ञों के अनुसार, इस नए कानून के तहत खेजड़ी की कटाई को गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखने और भारी जुर्माने के प्रावधानों पर विचार किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर होने वाली अंधाधुंध कटाई को नियंत्रित किया जा सके और मुख्यमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि इस कानून में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी सुनिश्चित किया जाएगा ताकि जमीनी स्तर पर वृक्षों की निगरानी हो सके।
बीकानेर में जारी आंदोलन और संतों का आमरण अनशन
मुख्यमंत्री की यह घोषणा बीकानेर में चल रहे तीव्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में आई है और बीकानेर में खेजड़ी वृक्षों की कटाई के विरोध में संत समाज और स्थानीय नागरिक पिछले कई दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं। महापड़ाव स्थल पर बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष सरकार से खेजड़ी संरक्षण की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं और अन्य निर्माण कार्यों के लिए हजारों की संख्या में खेजड़ी के पेड़ काटे जा रहे हैं। अनशन के कारण 10 से अधिक प्रदर्शनकारियों की तबीयत बिगड़ने की खबरें भी सामने आई हैं, जिसके बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया है। संतों ने सरकार को एक दिन का अल्टीमेटम देते हुए स्पष्ट किया था कि जब तक ठोस कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती, आंदोलन समाप्त नहीं होगा।
खेजड़ी का सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व
खेजड़ी (Prosopis cineraria) को राजस्थान का गौरव माना जाता है। 1983 में इसे राज्य वृक्ष घोषित किया गया था। थार के मरुस्थल में यह वृक्ष न केवल पशुओं के लिए चारे का स्रोत है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी सहायक होता है। ऐतिहासिक रूप से, खेजड़ी का संरक्षण राजस्थान की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। 1730 में जोधपुर के खेजड़ली गांव में अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने इन वृक्षों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के दौर में, खेजड़ी जैसे मरुस्थलीय वृक्षों का महत्व और अधिक बढ़ गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, खेजड़ी के बिना राजस्थान के पारिस्थितिकी तंत्र की कल्पना करना कठिन है, क्योंकि यह भीषण गर्मी में भी हरा-भरा रहता है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण और भविष्य की राह
पर्यावरणविदों और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान में खेजड़ी के लिए अलग से कानून बनाना एक ऐतिहासिक कदम हो सकता है। वर्तमान में वृक्षों की कटाई राजस्थान वन अधिनियम 1953 के तहत नियंत्रित होती है, लेकिन खेजड़ी के लिए विशिष्ट प्रावधानों की कमी महसूस की जा रही थी। विश्लेषकों का मानना है कि नया कानून न केवल कटाई पर रोक लगाएगा, बल्कि नए वृक्षारोपण को भी बढ़ावा देगा। हालांकि, कानून के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राजस्व और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता होगी। सरकार के इस कदम को बीकानेर में जारी गतिरोध को समाप्त करने और पर्यावरण प्रेमियों के विश्वास को बहाल करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की इस घोषणा ने प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण की नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें प्रस्तावित कानून के मसौदे पर टिकी हैं, जिसे आगामी सत्रों में पेश किए जाने की संभावना है। सरकार के इस निर्णय से न केवल खेजड़ी के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा कम होने की उम्मीद है, बल्कि यह राजस्थान की समृद्ध पर्यावरणीय विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
