राजस्थान के अलवर जिले में हाल ही में एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला है और राज्य सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संजय शर्मा अपनी ही सरकार के नगर निगम कार्यालय परिसर में सफाई कर्मचारियों के साथ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए, जिससे पूरे जिले में हलचल मच गई। यह पूरा मामला वर्ष 2012 के सफाई कर्मचारी अभ्यर्थियों की भर्ती प्रक्रिया से संबंधित है, जो पिछले कई वर्षों से कानूनी और प्रशासनिक उलझनों के कारण अटका हुआ था। दो दिन पहले इस मामले में अदालत का स्पष्ट निर्देश आने के बावजूद, जब नगर निगम आयुक्त सोहन सिंह नरूका और जिला प्रशासन ने चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र यानी जॉइनिंग लेटर जारी करने में देरी की, तो मंत्री संजय शर्मा का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर जिला कलेक्टर डॉ. अर्तिका शुक्ला की कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराया और उन पर हठधर्मिता के गंभीर आरोप लगाए।
मंत्री और कलेक्टर के बीच तीखा टकराव
मंत्री संजय शर्मा ने इस घटनाक्रम के दौरान बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया और उन्होंने आरोप लगाया कि जब उन्होंने इस ज्वलंत मुद्दे के समाधान के लिए जिला कलेक्टर से संपर्क किया, तो उन्होंने मौके पर आने से इनकार कर दिया। मंत्री के अनुसार, कलेक्टर ने अपने हाथ में दर्द होने का हवाला देते हुए घटनास्थल पर आने में असमर्थता जताई। इस पर मंत्री ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि कलेक्टर स्वयं आने की स्थिति में नहीं थीं, तो उन्हें कम से कम नगर निगम आयुक्त को तुरंत प्रभाव से नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश देना चाहिए था। इस टकराव के बाद से ही 2016 बैच की चर्चित आईएएस अधिकारी डॉ. अर्तिका शुक्ला का नाम पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग उनके प्रशासनिक सफर के बारे में जानने को उत्सुक हैं।
डॉ. अर्तिका शुक्ला का पारिवारिक और शैक्षिक परिचय
वाराणसी (काशी) में 5 सितंबर 1990 को जन्मीं डॉ. अर्तिका शुक्ला एक ऐसे परिवार से आती हैं जिसकी जड़ें चिकित्सा और प्रशासन में काफी गहरी हैं। उनके पिता डॉ. बृजेश शुक्ला एक प्रतिष्ठित चिकित्सक हैं और वे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के पूर्व सचिव भी रह चुके हैं। उनकी माता लीना शुक्ला एक गृहिणी हैं। अर्तिका के परिवार में प्रशासनिक सेवाओं का गहरा प्रभाव है। उनके सबसे बड़े भाई गौरव शुक्ला 2012 बैच के आईएएस अधिकारी हैं, जबकि उनके दूसरे भाई उत्कर्ष शुक्ला भारतीय रेलवे यातायात सेवा (IRTS) में कार्यरत हैं। अर्तिका ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी के सेंट जॉन स्कूल से प्राप्त की और इसके बाद उन्होंने दिल्ली के प्रसिद्ध मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (MAMC) से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की।
डॉक्टर से आईएएस बनने का सफर
एमबीबीएस पूरा करने के बाद अर्तिका ने दिल्ली के लोक नायक अस्पताल में अपनी इंटर्नशिप की और फिर चंडीगढ़ के विख्यात संस्थान PGIMER में पीडियाट्रिक्स (बाल रोग) में एमडी की पढ़ाई शुरू की। हालांकि, अपने आईएएस भाई गौरव शुक्ला से प्रेरित होकर उन्होंने एक डॉक्टर के रूप में अपने स्थापित करियर को छोड़ने का साहसी निर्णय लिया। उन्होंने एमडी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गईं। उनकी यह मेहनत रंग लाई और उन्होंने वर्ष 2015 की यूपीएससी परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में पूरे भारत में चौथा स्थान (AIR 4) प्राप्त कर सबको चौंका दिया। विशेष बात यह है कि उन्होंने इसके लिए किसी कोचिंग की मदद नहीं ली और मेडिकल साइंस को ही अपना वैकल्पिक विषय चुना था।
व्यक्तिगत जीवन और राजस्थान में प्रशासनिक करियर
प्रशिक्षण के दौरान अर्तिका की मुलाकात 2015 बैच के ही आईएएस अधिकारी जसमीत सिंह संधू से हुई, जिन्होंने परीक्षा में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। वर्ष 2017 में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए। जसमीत सिंह संधू भी वर्तमान में राजस्थान कैडर में कार्यरत हैं। अर्तिका शुक्ला को देश की प्रसिद्ध आईएएस अधिकारी टीना डाबी का भी करीबी मित्र माना जाता है। राजस्थान कैडर की 2016 बैच की अधिकारी के रूप में अर्तिका ने अजमेर में एसडीओ के पद से अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने जयपुर में वाणिज्यिक कर विभाग में एडिशनल कमिश्नर और ऊर्जा विभाग में संयुक्त सचिव के रूप में कार्य किया। वे नए बने जिले दूदू की पहली ओएसडी और पहली जिला कलेक्टर भी रहीं और सितंबर 2024 में उन्हें अलवर का कलेक्टर नियुक्त किया गया और नवंबर 2025 में उन्हें खैरथल-तिजारा का अतिरिक्त प्रभार भी मिला।
नवाचार और वर्तमान विवाद की जड़ें
अलवर कलेक्टर के रूप में डॉ. अर्तिका शुक्ला ने 'विद्या कुंज' नामक एक अनूठा प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिसके तहत सार्वजनिक पार्कों में ओपन-एयर लाइब्रेरी बनाई गईं। इस पहल की पूरे राज्य में प्रशंसा हुई थी। हालांकि, वर्तमान में सफाई कर्मचारियों की भर्ती को लेकर उपजा विवाद उनके लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। मंत्री संजय शर्मा का तर्क है कि जब अदालत और सरकार दोनों ही पात्र लोगों को रोजगार देना चाहते हैं, तो प्रशासनिक अधिकारियों को इसमें देरी नहीं करनी चाहिए। मंत्री का सड़क पर धरने पर बैठना राजस्थान की नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच के तनाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है।
