भारतीय जनता पार्टी ने गुरुवार को चार राज्यों के लिए नए प्रदेश अध्यक्षों के नामों का ऐलान किया है। जिन चार नेताओं को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है, उनमें से दो ऐसे चेहरे हैं जिनकी राजनीतिक शुरुआत बीजेपी से नहीं बल्कि कांग्रेस से हुई थी और इसे बीजेपी की संगठनात्मक सोच और कार्यशैली में आए एक बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी अब अपने मूल कैडर से इतर उन नेताओं को भी संगठन के शीर्ष पदों पर मौका दे रही है जिनका स्थानीय स्तर पर मजबूत प्रभाव है और जो चुनावी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हैं।
पंजाब में केवल सिंह ढिल्लों को मिली कमान
पंजाब में पार्टी ने वरिष्ठ नेता सरदार केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। ढिल्लों लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और मालवा क्षेत्र में उनका काफी अच्छा प्रभाव माना जाता है। वे 2007 और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर बरनाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। विशेष रूप से 2012 के चुनाव में उन्होंने एक बड़ी जीत दर्ज की थी। इसके अलावा उन्होंने पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दी हैं।
हालांकि, बाद के वर्षों में उनके राजनीतिक सफर में कुछ उतार-चढ़ाव आए। उन्हें 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के संगरूर लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इन चुनावी परिणामों के बाद उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था। अब बीजेपी ने उन्हें पंजाब इकाई की कमान सौंपकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह राज्य की राजनीति में नए समीकरणों और चेहरों के साथ आगे बढ़ने की तैयारी में है। पंजाब में इससे पहले भी बीजेपी ने गैर भाजपा बैकग्राउंड के सुनील जाखड़ को 2023 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, और केवल सिंह ढिल्लों की नियुक्ति उसी रणनीति का विस्तार मानी जा रही है।
त्रिपुरा में अभिषेक देबरॉय की नियुक्ति
त्रिपुरा में बीजेपी ने अभिषेक देबरॉय को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। वे वर्तमान में गोमती जिले में बीजेपी संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और 2023 के चुनावों में विधायक भी चुने गए थे। उनके राजनीतिक सफर का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उनकी शुरुआत भी कांग्रेस पार्टी से ही हुई थी। बाद में वे बीजेपी में शामिल हुए और अपनी मेहनत के दम पर संगठन में इस अहम मुकाम तक पहुंचे हैं। उनकी नियुक्ति यह दर्शाती है कि पार्टी अब उन राज्यों में स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को ज्यादा महत्व दे रही है जहां वह अभी अपने विस्तार के दौर में है।
रणनीति में बदलाव और विस्तार की कोशिश
सामान्य तौर पर बीजेपी की यह परंपरा रही है कि वह दूसरे दलों से आए नेताओं को मुख्यमंत्री जैसे पदों पर तो बिठाती रही है, लेकिन संगठन के मुख्य पदों पर हमेशा अपने मूल कैडर के नेताओं को ही प्राथमिकता देती थी। बीजेपी को लंबे समय से एक कैडर आधारित और वैचारिक रूप से अनुशासित पार्टी माना जाता रहा है। आमतौर पर संगठन के बड़े पद उन नेताओं को मिलते थे जो दशकों से पार्टी की विचारधारा से जुड़े रहे हों और लेकिन अब पार्टी उन राज्यों में अपनी रणनीति बदल रही है जहां उसे सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर विस्तार की आवश्यकता है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, बिहार के सम्राट चौधरी, पश्चिम बंगाल में सुभेंदु अधिकारी, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह इसके प्रमुख उदाहरण हैं जिन्होंने दूसरे दलों से बीजेपी में आने के बाद पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। इन नियुक्तियों से यह साफ है कि बीजेपी अब सिर्फ पारंपरिक कैडर राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। वह चुनावी जरूरतों और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए संगठनात्मक प्रयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इससे पार्टी को दोहरा लाभ मिलता है; एक तरफ विपक्ष के कद्दावर नेताओं को अपने पाले में लाया जाता है और दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश होती है।
