इस्लामिक नाटो का विस्तार: मिस्र और बहरीन के शामिल होने की संभावना बढ़ी

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की द्वारा गठित इस्लामिक नाटो में अब मिस्र और बहरीन को शामिल करने की तैयारी है। मक्का समझौते के तहत बने इस गठबंधन का उद्देश्य ईरान और हूती विद्रोहियों के खतरों से निपटना और परमाणु सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है और पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की द्वारा हाल ही में गठित किए गए इस्लामिक नाटो में अब नए सदस्यों को जोड़ने की कवायद तेज हो गई है। ताजा जानकारी के अनुसार, इस रक्षा गठबंधन में मिस्र और बहरीन जैसे महत्वपूर्ण मुस्लिम देशों को शामिल किया जा सकता है। बहरीन ने इस संबंध में पाकिस्तान से संपर्क भी साधा है, जबकि मिस्र के संबंध भी पाकिस्तान के साथ काफी बेहतर रहे हैं, जिससे इन दोनों देशों के इस गठबंधन में शामिल होने की राह आसान दिख रही है।

मक्का समझौता और गठबंधन की संरचना

इस गठबंधन की नींव मक्का शहर में रखी गई थी, जहां पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि यदि कोई भी बाहरी देश इन तीनों में से किसी एक पर हमला करता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह प्रावधान ठीक उसी तरह का है जैसा कि अंतरराष्ट्रीय संगठन नाटो के संविधान में मौजूद है। सऊदी अरब और पाकिस्तान ने इस पूरे समझौते को रक्षात्मक करार दिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों की संप्रभुता की रक्षा करना है। इस गठबंधन के माध्यम से सुन्नी बहुल मुस्लिम देश एक साझा मंच पर एकजुट हो रहे हैं।

क्षेत्रीय चुनौतियां और हूती विद्रोहियों का खतरा

इस्लामिक नाटो के गठन और विस्तार के पीछे क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियां एक बड़ा कारण हैं। सऊदी अरब के लिए इस समय हूती विद्रोही एक बड़ा खतरा बने हुए हैं। हाल ही में लाल सागर में हूती विद्रोहियों ने एक कार्गो जहाज पर हमला किया था, जिसमें 2 पाकिस्तानी नागरिकों की जान चली गई थी। इसी तरह के खतरों से निपटने के लिए सऊदी अरब ने तुर्की को इस गठबंधन में शामिल किया है। बहरीन की बात करें तो ईरान के साथ सऊदी अरब की दोस्ती के कारण तेहरान लगातार बहरीन को निशाना बना रहा है। वहीं, मिस्र के लिए लाल सागर में हूती विद्रोहियों की सक्रियता उसके व्यापारिक और सुरक्षा हितों के लिए बड़ा खतरा है।

आर्थिक शक्ति और रक्षा बजट की तुलना

इस गठबंधन की ताकत का अंदाजा इसके रक्षा बजट से लगाया जा सकता है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का सम्मिलित रक्षा बजट लगभग 120 अरब डॉलर है। यदि इसकी तुलना भारत से की जाए, तो भारत का रक्षा बजट करीब 90 अरब डॉलर है, यानी इस गठबंधन का बजट भारत के मुकाबले काफी अधिक है। यह भारी-भरकम बजट इन देशों को आधुनिक हथियार खरीदने और अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने में मदद करता है।

परमाणु सुरक्षा और पाकिस्तान की भूमिका

मक्का समझौते का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू परमाणु सुरक्षा है। चूंकि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है, इसलिए इस गठबंधन में शामिल होने से तुर्की और सऊदी अरब जैसे देशों को एक तरह की परमाणु सुरक्षा की गारंटी मिल गई है और यदि इन देशों पर कोई बड़ा हमला होता है और पाकिस्तान उस युद्ध में शामिल होता है, तो इस्लामाबाद अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल विरोधी देशों के खिलाफ कर सकता है। यह तुर्की और सऊदी अरब के लिए एक बड़ी रणनीतिक राहत है।

ईरान और इजराइल का डर

मध्य पूर्व के देशों, विशेषकर तुर्की और सऊदी अरब को दो तरफा खतरों का सामना करना पड़ रहा है और एक तरफ ईरान के हमले का डर है, तो दूसरी तरफ इजराइल की ओर से लगातार मिल रही धमकियां इन देशों की चिंता बढ़ा रही हैं। इन खतरों से बचने के लिए ही इन देशों ने पाकिस्तान का साथ लिया है और पाकिस्तान के पास न केवल परमाणु हथियार हैं, बल्कि उसकी सेना भी काफी अनुभवी मानी जाती है। वर्तमान में पाकिस्तान अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए अपने सैनिकों को सुरक्षा कार्यों के लिए अन्य देशों को उपलब्ध करा रहा है, जो इन मुस्लिम देशों के लिए एक बड़ी सैन्य सहायता के रूप में देखा जा रहा है।