चीन सरकार ने अपनी अंतरराष्ट्रीय यात्रा नीतियों में एक बड़ा बदलाव करते हुए यूनाइटेड किंगडम और कनाडा के नागरिकों के लिए वीजा-मुक्त प्रवेश की घोषणा की है। इस निर्णय के बाद अब 'फाइव आइज' (Five Eyes) खुफिया गठबंधन के पांच सदस्यों में से चार देशों को चीन में बिना वीजा के प्रवेश की सुविधा मिल गई है। इससे पहले जुलाई 2024 में चीन ने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के नागरिकों को भी इसी तरह की छूट प्रदान की थी। वर्तमान में अमेरिका इस गठबंधन का एकमात्र ऐसा सदस्य देश है जिसके नागरिकों को चीन की इस नई वीजा नीति का लाभ नहीं दिया गया है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार यह कदम चीन की उस कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसके तहत वह पश्चिमी देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्गठित करने का प्रयास कर रहा है।
फाइव आइज अलायंस का ऐतिहासिक आधार और गठन
फाइव आइज (FVEY) को दुनिया का सबसे पुराना और सबसे प्रभावी खुफिया साझाकरण गठबंधन माना जाता है। इसकी जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1941 में अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हुए अटलांटिक चार्टर और कोड-ब्रेकिंग सहयोग में निहित हैं। औपचारिक रूप से इसे 1943 के ब्रुसा (BRUSA) समझौते और बाद में 1946 के यूकेयूएसए (UKUSA) समझौते के माध्यम से स्थापित किया गया था। शुरुआत में यह केवल अमेरिका और ब्रिटेन के बीच एक द्विपक्षीय समझौता था लेकिन बाद में 1948 में कनाडा और 1956 में ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड को इसमें शामिल किया गया। शीत युद्ध के दौरान इस गठबंधन ने सोवियत संघ और उसके सहयोगियों की गतिविधियों पर नजर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस गठबंधन के अस्तित्व को दशकों तक गुप्त रखा गया था और आधिकारिक तौर पर 2010 में इसके दस्तावेजों को सार्वजनिक किया गया।
सदस्य देशों की क्षेत्रीय और तकनीकी जिम्मेदारियां
फाइव आइज गठबंधन के भीतर प्रत्येक सदस्य देश को भौगोलिक आधार पर खुफिया जानकारी एकत्र करने की विशिष्ट जिम्मेदारी सौंपी गई है। अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (NSA) वैश्विक स्तर पर सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) की निगरानी करती है। ब्रिटेन की GCHQ यूरोप, पश्चिमी रूस और मध्य पूर्व पर ध्यान केंद्रित करती है। कनाडा की संचार सुरक्षा स्थापना (CSE) लैटिन अमेरिका, उत्तरी अक्षांशों और पूर्वी रूस के कुछ हिस्सों की निगरानी के लिए जिम्मेदार है। ऑस्ट्रेलिया का निदेशालय (ASD) दक्षिण और पूर्वी एशिया की गतिविधियों पर नजर रखता है जबकि न्यूजीलैंड की सरकारी संचार सुरक्षा ब्यूरो (GCSB) दक्षिण प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों की खुफिया जानकारी साझा करती है। यह विभाजन सुनिश्चित करता है कि गठबंधन के पास दुनिया के लगभग हर हिस्से की व्यापक जानकारी उपलब्ध रहे।
गठबंधन के भीतर ऐतिहासिक तनाव और कूटनीतिक विवाद
दशकों पुराने इस सहयोग के बावजूद सदस्य देशों के बीच कई बार गंभीर मतभेद भी उभरे हैं। 1950 के दशक में 'कैम्ब्रिज फाइव' जासूसी कांड के बाद अमेरिका ने ब्रिटेन के साथ जानकारी साझा करने में सावधानी बरतना शुरू कर दिया था। 1973 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ की यूरोप समर्थक नीतियों के कारण खुफिया जानकारी के प्रवाह को अस्थायी रूप से रोक दिया था। न्यूजीलैंड को 1980 के दशक में अमेरिकी परमाणु नीति का विरोध करने के कारण दो दशक से अधिक समय तक गठबंधन की पूर्ण भागीदारी से अलग रखा गया था। इसके अलावा 2003 के इराक युद्ध के दौरान कनाडा द्वारा सैन्य हस्तक्षेप से इनकार करने पर अमेरिका ने कुछ समय के लिए खुफिया साझाकरण को सीमित कर दिया था। हाल के वर्षों में डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान भी गठबंधन के भीतर सूचनाओं की गोपनीयता को लेकर सवाल उठाए गए थे।
प्रमुख खुफिया ऑपरेशन और वैश्विक निगरानी कार्यक्रम
फाइव आइज गठबंधन ने पिछले 70 वर्षों में कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को प्रभावित किया है। 1953 में ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक के खिलाफ तख्तापलट और 1973 में चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे को सत्ता से हटाने में इस गठबंधन की खुफिया जानकारी का उपयोग किया गया था। 2013 में एडवर्ड स्नोडन द्वारा लीक किए गए दस्तावेजों से पता चला कि यह गठबंधन 'प्रिज्म' (PRISM) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से बड़े पैमाने पर वैश्विक डिजिटल निगरानी कर रहा था। इन खुलासों के अनुसार गठबंधन ने न केवल विदेशी सरकारों बल्कि एंजेला मर्केल जैसे मित्र देशों के नेताओं की भी जासूसी की थी। इसके अलावा स्विफ्ट (SWIFT) जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों तक पहुंच बनाकर वित्तीय डेटा की निगरानी भी इस गठबंधन के प्रमुख कार्यों में शामिल रही है। वर्तमान में यह गठबंधन साइबर सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी अभियानों में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है।
