नोएडा छात्र को नोटिस पर भड़के CJI सूर्य कांत, मजिस्ट्रेट से मांगा स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के एक छात्र को 5 लाख रुपये का मुचलका भरने का नोटिस जारी करने पर कड़ी नाराजगी जताई है। CJI सूर्य कांत ने मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा है, क्योंकि कोर्ट ने पहले ही छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने ग्रेटर नोएडा के एक मजिस्ट्रेट द्वारा गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र को नोटिस जारी किए जाने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बेहद तल्ख टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि कोई मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है, जबकि शीर्ष अदालत ने पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए थे। कोर्ट ने अब इस मामले में ग्रेटर नोएडा की मजिस्ट्रेट से औपचारिक स्पष्टीकरण मांगने का निर्णय लिया है।

मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही

यह पूरा विवाद गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के एक छात्र को जारी किए गए नोटिस से शुरू हुआ और ग्रेटर नोएडा आयुक्तालय के तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट कार्यालय ने छात्र को 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने का आदेश दिया था। यह नोटिस उस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिया गया था, जो जंतर-मंतर पर सीजेपी (CJP) के नेतृत्व में आयोजित किया गया था। सुनवाई के दौरान, वकील विश्वजीत भट्टाचार्य ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच के सामने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है और यह नोटिस सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है।

CJI सूर्य कांत की तल्ख टिप्पणी

वकील की दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए CJI सूर्य कांत ने कहा कि युवाओं के खिलाफ कार्रवाई का कोई सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने याद दिलाया कि कोर्ट ने इस संबंध में पहले ही साफ आदेश पारित किया था। मुख्य न्यायाधीश ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि जब कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तो मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी कर दिया। उन्होंने वकील से सभी तथ्यों को रिकॉर्ड पर रखने को कहा और स्पष्ट किया कि कोर्ट इस मामले में मजिस्ट्रेट से जवाब तलब करेगा ताकि वे अपनी बात रख सकें।

नोटिस और पुलिस का पक्ष

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने यह भी पूछा कि क्या नोटिस वापस लिए जाने की कोई आधिकारिक जानकारी है। वकील ने बताया कि प्रेस रिपोर्टों के अनुसार इसे वापस ले लिया गया है, लेकिन उन्हें इस बारे में कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि 1 सितंबर को कोर्ट का फैसला आने के बाद पूरी दुनिया को इसकी जानकारी थी, ऐसे में इस तरह का नोटिस जारी करना अदालत की अवमानना के समान है। मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। पुलिस का आरोप था कि छात्र ने अन्य विद्यार्थियों को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाया था और हालांकि, बाद में पुलिस ने कहा कि शांति बनाए रखने के लिए जारी किया गया यह बंधपत्र नोटिस वापस ले लिया गया है।

शांति बंधपत्र और छात्र का दावा

कानूनी रूप से शांति बंधपत्र नोटिस कोई सजा या दोषसिद्धि नहीं होती है, बल्कि यह एक एहतियाती कदम है। इसके तहत प्रशासन किसी व्यक्ति से यह आश्वासन ले सकता है कि वह शांति बनाए रखेगा और कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से दूर रहेगा। इस मामले में छात्र अक्षत त्रिपाठी ने पुलिस के आरोपों को खारिज किया है और उनका कहना है कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से भाग लिया था और उस दौरान वे विश्वविद्यालय की कक्षाओं में भी नहीं जा रहे थे। 5 लाख रुपये की बड़ी राशि का मुचलका मांगे जाने और सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के बावजूद कार्रवाई किए जाने के कारण अब यह मामला मजिस्ट्रेट के लिए गले की फांस बन गया है।