नासा की पूर्व वैज्ञानिक इंग्रिड होनकाला के दावों ने मृत्यु और उसके बाद के जीवन को लेकर चल रही वैश्विक बहस को एक नया और रोमांचक मोड़ दे दिया है। इंग्रिड का दावा है कि वह अपने जीवनकाल में एक बार नहीं, बल्कि तीन बार मृत्यु के द्वार तक पहुंचकर वापस लौटी हैं। कोलंबिया के बोगोटा की रहने वाली इंग्रिड ने अपने इन अनुभवों को अत्यंत विस्तार से साझा किया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि मौत के उस पार की दुनिया कैसी है और वहां जाने के बाद एक इंसान क्या महसूस करता है। उनके अनुसार, मृत्यु कोई डरावना अंत नहीं है, बल्कि यह एक अलग तरह की शुरुआत है। इंग्रिड के ये अनुभव न केवल व्यक्तिगत हैं, बल्कि उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी एक नई दिशा प्रदान करते हैं।
2 साल की उम्र में पहला नियर डेथ एक्सपीरियंस
इंग्रिड बताती हैं कि उनका पहला 'नियर डेथ एक्सपीरियंस' (NDE) तब हुआ था जब वह महज दो साल की थीं। वह अपने घर के पास स्थित एक बर्फीले पानी के टैंक में गिर गई थीं। उस समय उनका दम घुटने लगा था और वह सांस लेने के लिए छटपटा रही थीं। इंग्रिड के अनुसार, उस ठंडे पानी में डूबते समय अचानक उनके भीतर एक गहरी शांति छा गई। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वह अपने भौतिक शरीर से बाहर निकल गई हैं। शरीर से बाहर निकलने के बाद उन्होंने देखा कि उनकी मां घर से दूर अपने ऑफिस जा रही थीं। इंग्रिड ने दावा किया कि उन्होंने मन ही मन अपनी मां से संपर्क करने की कोशिश की, जिसके तुरंत बाद उनकी मां को किसी अनहोनी का आभास हुआ और उनकी मां तुरंत घर की ओर भागीं और इंग्रिड को उस बर्फीले टैंक से बाहर निकालकर उनकी जान बचाई।
मौत के बाद की रहस्यमयी दुनिया का अनुभव
अब 55 वर्ष की हो चुकीं इंग्रिड का कहना है कि उनके अनुभवों ने मौत के प्रति उनके डर को पूरी तरह खत्म कर दिया है। उनके अनुसार, मौत के बाद की दुनिया में समय का कोई अस्तित्व नहीं होता है और वहां समय की गणना पृथ्वी की तरह नहीं की जाती। इंग्रिड ने बताया कि उस पार उन्होंने खुद को एक छोटे बच्चे के रूप में नहीं देखा, बल्कि वह प्रकाश की किरणों के रूप में मौजूद थीं और उन्हें यह स्पष्ट अहसास हुआ कि इस पूरे ब्रह्मांड की हर एक चीज एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। इस दौरान उन्होंने कुछ दिव्य आकृतियों से भी बातचीत की, जो उस रहस्यमयी दुनिया का हिस्सा थीं और उनके लिए यह अनुभव डरावना होने के बजाय अत्यंत शांतिपूर्ण और ज्ञानवर्धक था।
25 और 52 की उम्र में दोबारा मौत से सामना
इंग्रिड की मौत से मुठभेड़ केवल बचपन तक सीमित नहीं रही। जब वह 25 साल की थीं, तब एक भीषण बाइक हादसे के दौरान वह फिर से मौत की दहलीज पर जा पहुंची थीं। इसके बाद, 52 साल की उम्र में एक सर्जरी के दौरान उनका ब्लड प्रेशर अचानक बहुत कम हो गया, जिससे वह तीसरी बार उसी स्थिति में पहुंच गईं। इंग्रिड का कहना है कि हर बार जब वह मृत्यु के करीब पहुंचीं, तो वह उसी शांतिपूर्ण और प्रकाशमय अवस्था में लौट जाती थीं। इन बार-बार होने वाले अनुभवों ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया है कि मृत्यु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह केवल एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने की प्रक्रिया है।
विज्ञान और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम
इंग्रिड होनकाला केवल एक अनुभवकर्ता नहीं हैं, बल्कि वह एक उच्च शिक्षित वैज्ञानिक भी हैं। उन्होंने मैरीन साइंस में पीएचडी की है और नासा के साथ-साथ अमेरिकी नेवी के लिए भी काम किया है। हालांकि कई आलोचक उनके इन अनुभवों को मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी से होने वाला भ्रम मानते हैं, लेकिन इंग्रिड का मानना है कि विज्ञान और आध्यात्मिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उन्होंने अपने वैज्ञानिक करियर और इन अनुभवों को एक साथ जोड़कर देखा है और उनका तर्क है कि हमारी चेतना केवल हमारे मस्तिष्क की उपज नहीं है, बल्कि यह इस विशाल ब्रह्मांड का एक मौलिक और अविभाज्य हिस्सा है।
इंग्रिड ने अपने इन सभी अनुभवों और शोध को अपनी आने वाली किताब ‘Dying to See the Light’ में संकलित किया है और इस पुस्तक में उन्होंने विस्तार से लिखा है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, बल्कि यह चेतना का एक रूप से दूसरे रूप में होने वाला परिवर्तन है। उनके अनुसार, जब हम मरते हैं, तो हम केवल अपने भौतिक शरीर को छोड़ते हैं, जबकि हमारी चेतना ब्रह्मांड के व्यापक स्वरूप में विलीन हो जाती है। इंग्रिड के ये दावे न केवल आम लोगों के लिए कौतूहल का विषय हैं, बल्कि वैज्ञानिक समुदाय के लिए भी चेतना के रहस्यों को समझने की एक नई चुनौती पेश करते हैं।
