राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव ला सकती है सरकार

लोकसभा में बजट चर्चा के दौरान अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर टिप्पणी करने के लिए विपक्ष के नेता राहुल गांधी को विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव का सामना करना पड़ सकता है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने उन पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाया है।

संसद के निचले सदन लोकसभा में बजट पर चर्चा के दौरान राजनीतिक गतिरोध गहरा गया है। केंद्र सरकार विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव (Privilege Motion) लाने की तैयारी कर रही है। यह कदम राहुल गांधी द्वारा अमेरिका के साथ हुए एक कथित व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर सरकार पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद उठाया जा रहा है। गुरुवार को सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों पर हंगामा किया जिसके कारण प्रश्नकाल बाधित हुआ। 11:00AM पर सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसद पोस्टर और तख्तियां लेकर वेल में पहुंच गए और नारेबाजी शुरू कर दी। स्थिति को देखते हुए पीठासीन अधिकारी केपी तेन्नेटी ने मात्र 7minutes के भीतर ही सदन को 12:00PM तक के लिए स्थगित कर दिया।

विवाद की पृष्ठभूमि और राहुल गांधी के आरोप

विवाद की मुख्य जड़ बुधवार को बजट पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी द्वारा दिया गया वह बयान है जिसमें उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर तीखी टिप्पणी की थी। राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि सरकार ने एक विशेष ट्रेड डील के माध्यम से भारत माता को बेच दिया है। उन्होंने इसे पूरी तरह से आत्मसमर्पण करार देते हुए कहा था कि अब अमेरिका यह तय करेगा कि भारत किससे तेल खरीदेगा और हमारे निर्णय प्रधानमंत्री द्वारा नहीं लिए जाएंगे। इन बयानों को सरकार ने अत्यंत आपत्तिजनक और तथ्यों से परे माना है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी ने सदन के पटल पर बेबुनियाद बातें कही हैं और सदन को गुमराह करने का प्रयास किया है। इसी आधार पर सरकार उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस देने पर विचार कर रही है।

विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की संवैधानिक प्रक्रिया

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद सदस्यों को कुछ विशेष अधिकार और उन्मुक्तियां प्रदान की गई हैं ताकि वे बिना किसी बाहरी दबाव या कानूनी डर के अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें। इन अधिकारों में सदन के भीतर बोलने की स्वतंत्रता और किसी भी बयान के लिए अदालती कार्यवाही से सुरक्षा शामिल है। हालांकि यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है और यदि कोई सदस्य सदन में जानबूझकर गलत जानकारी देता है या सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाता है तो इसे विशेषाधिकार का उल्लंघन माना जाता है। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव के तहत कोई भी सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को नोटिस दे सकता है। अध्यक्ष यह तय करते हैं कि मामला प्रथम दृष्टया जांच के योग्य है या नहीं। यदि अध्यक्ष अनुमति देते हैं तो मामला विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges) को भेजा जाता है जो साक्ष्यों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट सदन को सौंपती है।

संभावित परिणाम और अनुशासनात्मक कार्रवाई

संसदीय नियमों के अनुसार यदि विशेषाधिकार समिति किसी सदस्य को दोषी पाती है तो सदन के पास कार्रवाई करने के कई विकल्प होते हैं। दोषी सदस्य को सदन के सामने बुलाकर फटकार लगाई जा सकती है या चेतावनी दी जा सकती है और गंभीर मामलों में सदस्य को सदन की सदस्यता से एक निश्चित अवधि के लिए निलंबित किया जा सकता है। अत्यंत दुर्लभ मामलों में कारावास की सजा का भी प्रावधान है हालांकि आधुनिक संसदीय इतिहास में ऐसा कम ही देखा गया है। किरेन रिजिजू ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह प्रस्ताव कब और किसके द्वारा औपचारिक रूप से पेश किया जाएगा लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा है कि सरकार इस मामले को हल्के में नहीं लेगी।

विशेषज्ञों का विश्लेषण और वर्तमान स्थिति

संसदीय विशेषज्ञों के अनुसार सदन में दिए गए बयानों की सत्यता की जिम्मेदारी संबंधित सदस्य की होती है और यदि कोई सदस्य बिना किसी ठोस प्रमाण के सरकार की संप्रभुता पर सवाल उठाता है तो यह संसदीय मर्यादा का उल्लंघन माना जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रस्ताव के माध्यम से सरकार विपक्ष के आक्रामक रुख का जवाब देने की रणनीति अपना रही है। वर्तमान में लोकसभा की कार्यवाही लगातार बाधित हो रही है और सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच व्यापारिक समझौतों और आर्थिक नीतियों को लेकर टकराव चरम पर है। विपक्ष का तर्क है कि वे केवल जनहित के मुद्दे उठा रहे हैं जबकि सरकार का कहना है कि सदन की कार्यवाही को जानबूझकर बाधित किया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या लोकसभा अध्यक्ष इस नोटिस को स्वीकार करते हैं और इस पर आगे की जांच शुरू होती है।

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