लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को सदन को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार की विदेश नीति और अमेरिका के साथ हाल ही में हुई ट्रेड डील पर तीखे सवाल उठाए। लंबे विवाद के बाद सदन में अपनी बात रखते हुए कांग्रेस सांसद ने दावा किया कि केंद्र सरकार ने अमेरिका के दबाव में आकर व्यापारिक समझौते किए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भारत अमेरिका की शर्तों को पूरी तरह नहीं मानता है, तो भविष्य में टैरिफ बढ़ाए जाने का जोखिम बना रहेगा। राहुल गांधी ने अपने भाषण में विशेष रूप से भारतीय नागरिकों के डेटा की सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीतिक बदलावों पर ध्यान केंद्रित किया।
आर्थिक सर्वेक्षण और वैश्विक अस्थिरता का संदर्भ
राहुल गांधी ने अपने संबोधन की शुरुआत आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) के संदर्भ से की। उन्होंने कहा कि सर्वेक्षण में दो महत्वपूर्ण बातें रेखांकित की गई हैं जो वर्तमान वैश्विक स्थिति को दर्शाती हैं। उनके अनुसार, दुनिया अब स्थिरता के दौर से निकलकर अस्थिरता की ओर बढ़ रही है और उन्होंने यूक्रेन, गाजा और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों का उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया भर में भू-राजनीतिक टकराव बढ़ रहे हैं। राहुल गांधी ने तर्क दिया कि अमेरिका के वैश्विक दबदबे को अब चीन, रूस और अन्य उभरती हुई ताकतें चुनौती दे रही हैं, जिससे एक नई वैश्विक व्यवस्था का उदय हो रहा है।
भारतीय डेटा और डॉलर की चुनौती
कांग्रेस सांसद ने डेटा को आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण हथियार बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच चल रहे वैश्विक मुकाबले में भारतीय डेटा सबसे कीमती संपत्ति है। राहुल गांधी के अनुसार, यदि अमेरिका अपनी महाशक्ति की स्थिति और डॉलर के प्रभुत्व को बनाए रखना चाहता है, तो उसे भारतीय डेटा की आवश्यकता होगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की विशाल जनसंख्या कोई बोझ नहीं, बल्कि एक बड़ी संपत्ति है, बशर्ते सरकार डेटा की संप्रभुता को पहचाने और उसकी रक्षा करे। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान ट्रेड डील में डेटा सुरक्षा के पहलुओं को नजरअंदाज किया गया है।
डोनाल्ड ट्रंप को संदेश और कूटनीतिक दृष्टिकोण
सदन के माध्यम से राहुल गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी एक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) सत्ता में होता और राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बातचीत कर रहा होता, तो उनका रुख स्पष्ट होता। उन्होंने कहा कि वे ट्रंप से कहते कि भारत एक मित्र राष्ट्र है और डॉलर की स्थिरता में सहयोग करना चाहता है, लेकिन इसके बदले में भारतीय डेटा की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह अमेरिका के सामने मजबूती से भारत का पक्ष रखने में विफल रही है और व्यापारिक हितों के लिए राष्ट्रीय डेटा सुरक्षा को जोखिम में डाल रही है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण और डेटा संप्रभुता
राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, राहुल गांधी का भाषण भारत की 'डिजिटल संप्रभुता' की बढ़ती मांग को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक व्यापार समझौतों में डेटा स्थानीयकरण (Data Localization) और डेटा सुरक्षा अब प्राथमिक मुद्दे बन गए हैं। विश्लेषकों के अनुसार, डॉलर के प्रभुत्व को लेकर राहुल गांधी की टिप्पणी वैश्विक स्तर पर चल रही 'डी-डलराइजेशन' (De-dollarization) की चर्चाओं से मेल खाती है। हालांकि, सरकार की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया है और ट्रेड डील को भारत के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक बताया गया है।
निष्कर्ष और संसदीय गतिरोध
राहुल गांधी के इस भाषण ने संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक मतभेदों को और गहरा कर दिया है। जहां विपक्ष इसे राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता बता रहा है, वहीं सरकार का तर्क है कि ये समझौते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को मजबूत करेंगे और डेटा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के इन जटिल मुद्दों पर आने वाले दिनों में सदन के भीतर और बाहर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। यह भाषण न केवल व्यापारिक चिंताओं को उजागर करता है, बल्कि भारत की भविष्य की विदेश नीति और डिजिटल सुरक्षा की दिशा पर भी सवाल खड़े करता है।
