डोपिंग पर सरकार सख्त मानसून सत्र में आएगा नया कानून और होगी जेल

केंद्र सरकार मानसून सत्र में नाडा डोपिंग बिल 2026 पेश करने की तैयारी में है जिसमें डोपिंग को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। इस कानून के तहत खिलाड़ियों के साथ-साथ कोच और सप्लायरों पर भी कार्रवाई होगी जिसमें 5 साल तक की जेल और 2 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।

केंद्र सरकार भारतीय खेलों में डोपिंग की समस्या से निपटने के लिए एक बड़ा और कड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार आगामी मानसून सत्र के दौरान संसद में नाडा (राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी) से जुड़ा डोपिंग बिल 2026 पेश कर सकती है। इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य डोपिंग को एक आपराधिक श्रेणी में लाना है, जिससे मौजूदा नियमों को और अधिक प्रभावी और सख्त बनाया जा सके। इस नए कानून के माध्यम से सरकार का लक्ष्य केवल उन खिलाड़ियों को सजा देना नहीं है जो डोपिंग में पकड़े जाते हैं, बल्कि उस पूरे तंत्र को ध्वस्त करना है जो खिलाड़ियों को प्रतिबंधित दवाओं के सेवन के लिए उकसाता है या उन्हें ये दवाएं उपलब्ध कराता है।

कानून के दायरे में आएगा पूरा नेटवर्क

प्रस्तावित डोपिंग बिल 2026 की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके दायरे में अब सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं आएंगे। नए प्रावधानों के अनुसार, ड्रग्स सप्लायर, कोच, हॉस्टल प्रशासन और डोपिंग के इस पूरे नेटवर्क में शामिल हर व्यक्ति को कानून के दायरे में लाया जाएगा। सरकार का मानना है कि डोपिंग अक्सर एक संगठित अपराध की तरह काम करता है, जिसमें कई लोग पर्दे के पीछे से सक्रिय रहते हैं और इस बिल का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि डोपिंग के पूरे नेटवर्क पर कड़ी कार्रवाई हो और असली दोषियों को कानून के तहत सजा मिल सके। इससे खेलों में पारदर्शिता आएगी और खिलाड़ियों के शोषण पर लगाम लगेगी।

सजा और जुर्माने के कड़े प्रावधान

नए कानून के मसौदे में सजा को लेकर बहुत ही सख्त प्रावधान किए गए हैं। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, जो लोग प्रतिबंधित दवाओं की आपूर्ति में शामिल पाए जाएंगे, उन्हें 5 साल तक की कैद की सजा दी जा सकती है। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति किसी एथलीट को डोपिंग के मकसद से या उससे संबंधित किसी भी उद्देश्य के लिए डोपिंग की अनुमति देता है या उससे संपर्क करता है, तो उसे भी 5 साल तक की जेल या 2 लाख रुपये तक के जुर्माने या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है। सरकार ने इन आंकड़ों को स्पष्ट रखा है ताकि किसी भी स्तर पर ढिलाई की गुंजाइश न रहे।

जनता की राय और खेल मंत्री का रुख

इस महत्वपूर्ण विधेयक को अंतिम रूप देने से पहले खेल मंत्रालय ने पारदर्शिता बरतते हुए इसके ड्राफ्ट को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराया था। सरकार ने सभी हितधारकों और आम जनता से इस पर अपनी राय देने की अपील की थी, जिसके लिए 18 जून तक का समय दिया गया था। खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने पूर्व में स्पष्ट किया है कि लोगों से प्राप्त सुझावों और फीडबैक को शामिल करते हुए संशोधित विधेयक को मानसून सत्र में पेश किए जाने की पूरी उम्मीद है। मांडविया ने कई मौकों पर कहा है कि डोपिंग अब केवल खेल के नियमों का उल्लंघन नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा संगठित तंत्र बन गया है जो खिलाड़ियों का शोषण करता है।

भारत की वैश्विक छवि और 2036 ओलंपिक का लक्ष्य

भारत के लिए यह कानून इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि पिछले 3 साल से भारत वाडा (विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी) की उन देशों की सूची में शीर्ष पर बना हुआ है जहां सबसे ज्यादा डोपिंग के मामले सामने आते हैं। यह स्थिति देश की खेल साख के लिए चिंताजनक है, विशेषकर तब जब भारत साल 2036 में ओलंपिक खेलों की मेजबानी करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। एक स्वच्छ खेल संस्कृति विकसित करना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि के लिए अनिवार्य है। उल्लेखनीय है कि यह नया प्रस्ताव साल 2018 में पेश किए गए एक मसौदे से काफी मिलता-जुलता है, जिसमें संगठित नेटवर्क के लिए 4 साल की जेल और 2 लाख रुपये के जुर्माने की सिफारिश की गई थी। हालांकि, 2022 में पारित कानून से इन प्रावधानों को हटा दिया गया था, लेकिन अब इन्हें और अधिक मजबूती के साथ वापस लाया जा रहा है।

चिकित्सा पेशेवरों पर भी रहेगी नजर

संशोधित कानून के तहत अब चिकित्सा पेशेवरों यानी डॉक्टरों को भी जांच के दायरे में लाया गया है। यदि कोई डॉक्टर जानबूझकर किसी खिलाड़ी को ऐसी दवाएं लिखता है जो प्रतिबंधित पदार्थों की श्रेणी में आती हैं, तो डोपिंग उल्लंघन में संलिप्त पाए जाने पर उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी विशेषज्ञता का दुरुपयोग खेलों में गलत तरीके से लाभ दिलाने के लिए न करें। इस प्रकार, सरकार डोपिंग के हर संभावित रास्ते को बंद करने की दिशा में काम कर रही है।