खाड़ी देशों पर आर्थिक संकट: ईरान युद्ध से जीडीपी में भारी गिरावट की आशंका

गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान से जुड़े युद्ध और होर्मुज जलमार्ग में संभावित रुकावट के कारण कतर और कुवैत की जीडीपी में 14% तक की गिरावट आ सकती है। यह 1990 के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक संकट हो सकता है, जिससे सऊदी अरब और यूएई भी प्रभावित होंगे।

मध्य-पूर्व में ईरान से जुड़े बढ़ते तनाव और संभावित सैन्य टकराव ने खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक गंभीर चेतावनी जारी की है। वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग में आवाजाही बाधित होती है, तो इस क्षेत्र को 1990 के दशक के बाद की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संकट का सबसे गहरा असर कतर और कुवैत जैसे देशों पर पड़ेगा, जिनकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक समुद्री व्यापार मार्गों पर निर्भर है।

ऐतिहासिक संदर्भ और 1990 का आर्थिक संकट

विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान स्थिति की तुलना 1990 के दशक की शुरुआत में हुए खाड़ी युद्ध से की जा रही है। उस समय इराक द्वारा कुवैत पर किए गए हमले ने पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिरता को हिला दिया था। गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री फारूक सूसा के अनुसार, यदि होर्मुज जलमार्ग करीब दो महीने तक बंद रहता है, तो कतर और कुवैत की जीडीपी में लगभग 14% तक की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट पिछले तीन दशकों में देखी गई किसी भी आर्थिक मंदी से अधिक गंभीर होगी। 1990 के संकट के दौरान भी ऊर्जा निर्यात और व्यापारिक गतिविधियों के रुकने से इसी तरह की स्थिति उत्पन्न हुई थी, जिसने वैश्विक बाजारों को प्रभावित किया था।

होर्मुज जलमार्ग की रणनीतिक भूमिका और तेल निर्यात

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग माना जाता है। वैश्विक तेल निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है और ईरान और उसके सहयोगियों के साथ बढ़ते तनाव के कारण इस मार्ग के बंद होने की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, युद्ध की आशंकाओं के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमतें 103 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। यदि इस मार्ग से आपूर्ति रुकती है, तो न केवल खाड़ी देशों के राजस्व में कमी आएगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतों में अनियंत्रित वृद्धि हो सकती है।

सऊदी अरब और यूएई की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव

हालांकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की स्थिति कतर और कुवैत की तुलना में कुछ बेहतर मानी जा रही है, लेकिन वे भी इस संकट से अछूते नहीं रहेंगे। अनुमानों के अनुसार, सऊदी अरब की जीडीपी में 3% और यूएई की जीडीपी में 5% तक की गिरावट दर्ज की जा सकती है। इन देशों के पास होर्मुज जलमार्ग के विकल्प के रूप में अन्य निर्यात मार्ग उपलब्ध हैं, जो उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, तेल की कीमतों में होने वाली वृद्धि से इन देशों को कुछ वित्तीय लाभ मिल सकता है, जो उनके कुल आर्थिक नुकसान की आंशिक भरपाई कर सकता है।

ऊर्जा बाजार और औद्योगिक उत्पादन में व्यवधान

कतर दुनिया के सबसे बड़े तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यातकों में से एक है। युद्ध के कारण गैस निर्यात में आने वाली किसी भी बाधा का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय गैस बाजार पर पड़ेगा, जिससे यूरोप और एशिया में ऊर्जा संकट गहरा सकता है। इसके अलावा, अन्य औद्योगिक क्षेत्र भी प्रभावित हो रहे हैं। बहरीन में स्थित दुनिया के सबसे बड़े एल्युमीनियम स्मेल्टरों में से एक को कच्चे माल की आपूर्ति और ऊर्जा लागत में वृद्धि के कारण उत्पादन कम करने की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले ये व्यवधान विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर को धीमा कर सकते हैं।

गैर-तेल क्षेत्रों और विदेशी निवेश पर अनिश्चितता

पिछले कुछ वर्षों में खाड़ी देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को तेल पर निर्भरता से मुक्त करने के लिए पर्यटन, रियल एस्टेट और वित्तीय सेवाओं जैसे गैर-तेल क्षेत्रों में भारी निवेश किया है। हालांकि, क्षेत्रीय अस्थिरता और युद्ध के खतरों ने इन क्षेत्रों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो विदेशी निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है, जिससे बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स और पर्यटन राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल, बॉन्ड बाजार में निवेशकों ने इस क्षेत्र की वित्तीय स्थिति को लेकर अत्यधिक चिंता नहीं दिखाई है, लेकिन युद्ध के विस्तार की स्थिति में यह परिदृश्य तेजी से बदल सकता है।