ईरान डील से अमेरिका को बाहर करने की तैयारी में खाड़ी देश, सऊदी-कतर का नया प्लान

सऊदी अरब, कतर और ओमान एक नई रणनीति पर काम कर रहे हैं जिसके तहत ईरान समझौते से अमेरिका को बाहर किया जा सकता है ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा और तेल व्यापार को सुचारू बनाया जा सके।

खाड़ी क्षेत्र की कूटनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सऊदी अरब, कतर और ओमान एक ऐसी नई योजना पर काम कर रहे हैं जिसके तहत ईरान डील से अमेरिका को बाहर करने की तैयारी की जा रही है। इन खाड़ी देशों का स्पष्ट मानना है कि ईरान के साथ कोई भी समझौता तभी सफल और प्रभावी हो सकता है जब अमेरिका इसका हिस्सा नहीं होगा। गौरतलब है कि इससे पहले ईरान डील की रूपरेखा से इजराइल को भी बाहर रखा गया था, जो इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय देश अब अपने मामलों को खुद सुलझाना चाहते हैं।

अमेरिका को बाहर रखने के पीछे का मुख्य कारण

ओमान, सऊदी अरब और कतर का मानना है कि हाल के वर्षों में हुए युद्धों और संघर्षों के कारण अमेरिका की विश्वसनीयता में भारी कमी आई है। इन देशों का तर्क है कि अमेरिका की मौजूदगी के कारण ही ईरान डील पर सही तरीके से अमल नहीं हो पा रहा है। हालांकि, इस नई योजना की औपचारिक कवायद कतर में प्रस्तावित अमेरिका और ईरान की बैठक के बाद और तेज की जा सकती है। यह बैठक मुख्य रूप से एक अस्थाई डील को पूरी तरह से लागू करने के उद्देश्य से बुलाई गई है, लेकिन खाड़ी देश अब एक अलग रास्ते की तलाश में हैं।

अगस्त 2026 तक का लक्ष्य और रणनीति

द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब, कतर और ओमान की कोशिश है कि अगस्त 2026 तक एक अंतिम और ठोस समझौते तक पहुंचा जाए। इसके लिए जो प्लान तैयार किया जा रहा है, उसमें अमेरिका को डील से पूरी तरह बाहर रखने का प्रावधान है। खाड़ी देशों को लगता है कि अमेरिका के बाहर होने से आने वाले समय में समझौते को लागू करने में कोई बड़ी बाधा नहीं आएगी और क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहेगी।

खाड़ी देशों की चार सूत्रीय योजना

इस पूरी डील को लेकर खाड़ी देशों ने एक विस्तृत योजना तैयार की है जिसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं। सबसे पहले, खाड़ी देशों की प्राथमिकता फारस की खाड़ी में पूर्ण शांति स्थापित करना है ताकि उनके तेल व्यापार में किसी भी प्रकार की बाधा न आए और उसमें बढ़ोतरी हो सके। इसके लिए ये देश ईरान की टोल संबंधी शर्तों को भी मानने के लिए तैयार हैं। एक विशेष प्रस्ताव पर काम किया जा रहा है जिसके तहत ईरान को टोल के नाम पर भुगतान किया जाएगा। वर्तमान में अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान द्वारा मांगे जा रहे टोल को स्वीकार नहीं कर रहा है, जो विवाद की एक बड़ी वजह है।

दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि खाड़ी देश ईरान विवाद को एक स्थानीय मुद्दा मानकर अमेरिका को इससे बाहर करना चाहते हैं। उनकी कोशिश अमेरिका को एक सुरक्षित निकास (सेफ एग्जिट) देने की है। दरअसल, वर्तमान में डील इसलिए सफल नहीं हो पा रही है क्योंकि ईरान झुकने को तैयार नहीं है और अमेरिका भी ईरान के सामने आत्मसमर्पण जैसी स्थिति नहीं चाहता है।

क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक वार्ता का क्रम

खाड़ी देशों का यह भी मानना है कि ईरान के साथ किसी भी संघर्ष में पड़ोसी होने के नाते उनका नुकसान सबसे ज्यादा होता है, जबकि अमेरिका की भौगोलिक दूरी ईरान से बहुत अधिक है। क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर वार्ताओं का दौर शुरू हो चुका है। सोमवार 29 जून को सबसे पहले ईरान और ओमान के बीच महत्वपूर्ण वार्ता हुई। इसके बाद ओमान और कतर के बीच बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और फिर ईरान ने सऊदी अरब से संपर्क किया और अंत में कतर और सऊदी अरब के बीच इस मुद्दे पर चर्चा हुई।

इसके अलावा, लेबनान का मुद्दा भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। ईरान लगातार अमेरिका पर लेबनान में शांति स्थापित करने का दबाव बना रहा है, लेकिन दूसरी तरफ इजराइल अमेरिका की बातों को अनसुना कर रहा है। खाड़ी देशों को लगता है कि यदि अमेरिका इस पूरी प्रक्रिया से बाहर हो जाता है, तो लेबनान का मुद्दा भी शांत हो सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व

समझौते की शर्तों के अनुसार, ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाने पर सहमत हो सकता है, लेकिन वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना दावा छोड़ने को किसी भी कीमत पर तैयार नहीं है। हाल ही में इस क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य झड़पें भी देखी गई थीं। रूस के पूर्व राष्ट्रपति देमेत्री मेदवेदेव ने होर्मुज को नए जमाने का परमाणु हथियार करार दिया है। हालिया संघर्षों के दौरान ईरान ने होर्मुज को बंद करने की धमकी देकर अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश की थी।

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी का मुख्य प्रवेश द्वार है और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस संकरे रास्ते से दुनिया की कुल तेल और गैस आपूर्ति का 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। सऊदी अरब, कतर, यूएई और कुवैत जैसे प्रमुख निर्यातक देश इसी रास्ते का उपयोग करते हैं। खाड़ी देशों की योजना इस 20 प्रतिशत आपूर्ति को सुरक्षित रखने और ईरान के साथ एक स्थायी समाधान निकालने की है।