2% की दर से बढ़ने का अनुमान है। यह रिपोर्ट देश की मध्यम अवधि की विकास संभावनाओं पर आधारित है, जिसमें हालिया नीतिगत सुधारों और वैश्विक व्यापारिक संबंधों को प्रमुख कारक माना गया है। अधिकारियों के अनुसार, यह आर्थिक गति न केवल औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देगी, बल्कि बाजार में तरलता और रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि करेगी।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक मजबूत स्थिति में है, जहां घरेलू मांग और सरकारी निवेश दोनों ही विकास को गति दे रहे हैं। वित्तीय सलाहकार फर्म का मानना है कि यदि वर्तमान सुधारों की गति बनी रहती है, तो भारत वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अपनी स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करने में सफल होगा।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों का प्रभाव
ईवाई इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार डीके श्रीवास्तव के अनुसार, भारत द्वारा हाल के वर्षों में किए गए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों ने अर्थव्यवस्था के लिए नए द्वार खोले हैं। इन समझौतों के माध्यम से भारतीय उत्पादों की वैश्विक पहुंच बढ़ी है और विदेशी निवेश के प्रवाह में भी सुधार देखा गया है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि प्रमुख आर्थिक समूहों के साथ बढ़ते व्यापारिक नेटवर्क ने भारत की विकास संभावनाओं को काफी उज्ज्वल बना दिया है।
इन व्यापारिक संबंधों के विस्तार से न केवल निर्यात क्षेत्र को मजबूती मिली है, बल्कि तकनीकी हस्तांतरण और विनिर्माण क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव आए हैं। अधिकारियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती सक्रियता ने देश को एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भागीदार के रूप में स्थापित किया है।
कर ढांचे में बदलाव और क्रय शक्ति
वित्त वर्ष 2025 के दौरान व्यक्तिगत आयकर और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के ढांचे में किए गए बदलावों का सीधा असर आम जनता की क्रय शक्ति पर पड़ने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार, इन सुधारों का मुख्य उद्देश्य मध्यम वर्ग और निम्न-आय वर्ग के परिवारों की खर्च करने योग्य आय में वृद्धि करना है। जब उपभोक्ताओं के पास अधिक नकदी उपलब्ध होती है, तो वे बाजार में मांग को बढ़ावा देते हैं, जो अंततः जीडीपी विकास में योगदान देता है।
हालांकि, इन कर रियायतों के कारण सरकारी राजस्व पर कुछ दबाव देखा जा सकता है। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि वित्त वर्ष 2026 के लिए निर्धारित सकल कर राजस्व लक्ष्यों को प्राप्त करना एक चुनौती हो सकती है। इसके बावजूद, घरेलू खपत में होने वाली वृद्धि को अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
राजकोषीय घाटे का प्रबंधन और राजस्व चुनौतियां
टैक्स कलेक्शन में संभावित कमी के बावजूद, रिपोर्ट में यह विश्वास जताया गया है कि सरकार अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम होगी और अधिकारियों के अनुसार, सरकार ने अपने खर्चों को नियंत्रित करने और गैर-कर राजस्व स्रोतों को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। वित्त वर्ष 2026 के बजट अनुमानों के अनुसार, राजकोषीय घाटे को कम करने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि कर अनुपालन को सख्त बनाकर और डिजिटल बुनियादी ढांचे का उपयोग करके राजस्व की कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अब बड़े संरचनात्मक कर सुधारों के बजाय मौजूदा प्रणाली को अधिक कुशल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
विकसित भारत 2047 के लिए रणनीतिक रोडमैप
भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा है। ईवाई की रिपोर्ट के अनुसार, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात में निरंतर सुधार करना अनिवार्य होगा। वर्तमान में यह अनुपात अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम है, जिसे बढ़ाने के लिए सरकार को दीर्घकालिक नीतियों पर काम करना होगा।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि विकसित भारत के विजन को साकार करने के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार और विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक है। इन क्षेत्रों में होने वाला निवेश न केवल विकास दर को स्थिर रखेगा, बल्कि समावेशी विकास को भी सुनिश्चित करेगा।
मध्यम अवधि में आर्थिक स्थिरता के कारक
मध्यम अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता के पीछे कई महत्वपूर्ण कारक कार्य कर रहे हैं। इनमें बैंकिंग क्षेत्र की मजबूती, कॉर्पोरेट बैलेंस शीट में सुधार और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियों और सरकार की राजकोषीय नीतियों के बीच समन्वय ने एक स्थिर आर्थिक वातावरण तैयार किया है।
इसके अतिरिक्त, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की वृद्धि ने भी विकास के नए इंजन तैयार किए हैं। अधिकारियों का मानना है कि इन कारकों के संयुक्त प्रभाव से भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना रहेगा।
