भारतीय शेयर बाजार में कुछ बेहद बड़े और बहुप्रतीक्षित आईपीओ दस्तक देने जा रहे हैं जो बाजार से भारी लिक्विडिटी खींचेंगे। इन आईपीओ में बड़े कॉर्पोरेट घराने और टेक स्टार्टअप्स शामिल हैं। हालिया बाजार के उतार-चढ़ाव, वैश्विक संकेतों और वैल्यूएशन की चिंताओं के कारण छोटे रिटेल निवेशक थोड़े सतर्क और डरे हुए हैं। ये बड़े आईपीओ यह तय करेंगे कि रिटेल निवेशकों का भरोसा प्राइमरी मार्केट में कितना मजबूत है। बाजार के विशेषज्ञ इसे दलाल स्ट्रीट का एक बड़ा टेस्ट मान रहे हैं, जहां निवेशकों की भागीदारी और उत्साह का आकलन किया जाएगा।
7 बिलियन डॉलर का बड़ा सवाल
भारत में आने वाले दो बड़े आईपीओ जियो प्लेटफॉर्म और एनएसई सीधे तौर पर रिटेल निवेशकों की सोच और उनकी निवेश क्षमता से जुड़े हुए हैं। अब 7 बिलियन डॉलर का सवाल यह है कि क्या निवेशकों का यह जुड़ाव बना रहेगा। अगर ग्रे-मार्केट की कीमतों और रुझानों पर यकीन करें, तो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (NSE) का 3 बिलियन डॉलर का आईपीओ और अरबपति मुकेश अंबानी के टेलीकॉम और डिजिटल मीडिया साम्राज्य का 4 बिलियन डॉलर का डेब्यू — दोनों में ही स्थानीय निवेशकों की काफी दिलचस्पी देखने को मिल सकती है। ये निवेशक कुछ ऐसे उत्साह की तलाश में हैं जो सेकेंडरी मार्केट में हाल-फिलहाल के उतार-चढ़ाव के कारण नहीं मिल पा रहा है।
वैश्विक बाजार और भारतीय इंडेक्स की स्थिति
जबकि ग्लोबल कैपिटल ताइपे और सियोल में एआई सेमीकंडक्टर बूम के पीछे भाग रहा था — जिससे कोरियाई शेयरों में तीन गुना और ताइवानी इक्विटी में दोगुना उछाल आया — वहीं भारत का बेंचमार्क इंडेक्स पिछले दो सालों में उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पाया है। इससे भी चुनौतीपूर्ण स्थिति तब पैदा हुई जब ईरान में युद्ध की स्थितियों ने एनर्जी इंपोर्ट करने वाले भारत के कमजोर बैलेंस ऑफ पेमेंट यानी भुगतान संतुलन को प्रभावित किया। भारतीय रुपये में आई गिरावट ने विदेशी पूंजी को कुछ हद तक दूर कर दिया है। लेकिन अब जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की खबरें आ रही हैं, तो सबकी नजरें भारत के व्यक्तिगत शेयर खरीदारों पर टिकी हैं। वे हाल ही में बाजार से पीछे हटने के बाद अब वापस लौटना शुरू हुए हैं। आम निवेशकों को अपना खोया हुआ उत्साह वापस पाने की जरूरत है, और यहीं पर दोनों आईपीओ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
एनएसई और जियो आईपीओ के बीच समानताएं
भारत के सबसे बड़े एक्सचेंज एनएसई और अंबानी की जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड, दोनों के पास मजबूत प्रतिस्पर्धी बढ़त है। वे ऐसे उद्योगों में प्रमुख खिलाड़ी हैं जहां असल में दो ही बड़ी कंपनियां यानी ड्युओपोली है और नए प्रतिस्पर्धियों के लिए इन क्षेत्रों में प्रवेश करना बहुत मुश्किल है क्योंकि नियम-कानून बहुत कड़े हैं। एनएसई की प्रतिद्वंद्वी 151 साल पुरानी बीएसई लिमिटेड है, जिसकी कुल कैश-इक्विटी टर्नओवर में हिस्सेदारी सिर्फ 7 फीसदी है। वहीं जियो के 50 करोड़ से ज्यादा सब्सक्राइबर और क्रिकेट पर मजबूत पकड़ वाला मीडिया साम्राज्य इसे अपने सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी भारती एयरटेल लिमिटेड से काफी आगे खड़ा करता है। भारतीय निवेशक इन दोनों कंपनियों के कामकाज से अच्छी तरह वाकिफ हैं। जब तक भारत में कैपिटल कंट्रोल है, तब तक स्थानीय निवेशकों को वेल्थ बनाने के लिए एनएसई पर निर्भर रहना होगा और मोबाइल वायरलेस के मामले में जियो के अलावा किसी और के बारे में सोचना मुश्किल है। यहां तक कि सैटेलाइट ब्रॉडबैंड जैसी नई तकनीक में भी नेशनल सिक्योरिटी से जुड़ी चिंताओं की वजह से अंबानी को एलन मस्क की स्टारलिंक या जेफ बेजोस की अमेजन के मुकाबले फायदा मिल सकता है।
दोनों आईपीओ के बीच मुख्य अंतर
दोनों आईपीओ में कुछ बुनियादी अंतर भी हैं जिन्हें समझना जरूरी है। एनएसई की लिस्टिंग, जिसमें गवर्नेंस से जुड़े पुराने मुद्दों की वजह से काफी देरी हुई, पूरी तरह से मौजूदा शेयरहोल्डर्स द्वारा स्टॉक बेचने का मामला यानी ऑफर फॉर सेल है। इसके विपरीत, जियो नया पैसा जुटाएगी, जिसका कुछ हिस्सा लगभग 3 बिलियन डॉलर का कर्ज चुकाने में इस्तेमाल होगा। मैच्योर मार्केट में ऑफर फॉर सेल और नई पूंजी जुटाने के बीच का अंतर सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया जैसा होता है, लेकिन भारत के मौजूदा माहौल में यह बात अलग है और क्योंकि एनएसई की लिस्टिंग पूरी तरह से ऑफर फॉर सेल है, इसलिए एक्सचेंज के खजाने में कोई नया कैश नहीं आएगा। चिंता की बात यह है कि अपनी हिस्सेदारी कम करने वालों में मॉर्गन स्टेनली और टेमासेक होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड जैसी विदेशी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। ऐसे समय में जब सरकार कमजोर होते रुपये को संभालने के लिए विदेशी निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है, एनएसई आईपीओ विदेशी पूंजी के बाहर निकलने का जरिया बन सकता है। इसके उलट, जियो नए फंड को आकर्षित करने वाली कंपनी है। हालांकि, जियो की कामयाबी के लिए एनएसई के शेयर बेचने वाले भारतीय बैंकों, बीमा कंपनियों और विदेशी संस्थानों को कुछ मुनाफा छोड़ना होगा।
जियो के ग्लोबल इंवेस्टर्स और भविष्य की राह
अल्फाबेट इंक और मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक जियो के बड़े समर्थक हैं। इसके साथ ही सऊदी अरब का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड, केकेआर एंड कंपनी और कई अन्य सॉवरेन वेल्थ फंड भी इसमें शामिल हैं। हालांकि इनमें से कोई भी आईपीओ में अपने शेयर नहीं बेच रहा है, लेकिन वे अपनी बुक्स में होने वाले फायदे को दर्ज कर सकेंगे। सिर्फ गूगल के लिए ही, छह साल पहले खरीदी गई 4 बिलियन 50 करोड़ डॉलर की हिस्सेदारी अब 10 बिलियन डॉलर की संपत्ति बन गई है। जियो की कामयाबी से अंबानी की प्रमुख कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को अपने अगले बड़े पब्लिक फ्लोट यानी कंज्यूमर कॉमर्स के लिए रास्ता बनाने में मदद मिलेगी। भारत की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी को अलग करने में अभी भी मेहनत करनी होगी, क्योंकि ग्रॉसरी, फैशन और इलेक्ट्रॉनिक्स में कॉम्पिटिशन टेलीकॉम के मुकाबले कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि रिटेल शेयरहोल्डर्स को खुश रखना कंपनी के लिए बेहद जरूरी है।
