भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वैश्विक बाजारों पर अत्यधिक निर्भर है। वित्त वर्ष 2024-25 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देश की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के आयात पर टिकी हुई है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85% से 88% हिस्सा विदेशों से मंगवाता है। वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों, विशेष रूप से मध्य पूर्व में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने इस निर्भरता को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध भारत की घरेलू आपूर्ति और कीमतों को सीधे प्रभावित करता है। 09 प्रति लीटर की वृद्धि इसी वैश्विक अस्थिरता का परिणाम मानी जा रही है।
कच्चे तेल के आयात की वर्तमान स्थिति और आंकड़े
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं में से एक है और इसकी दैनिक कच्चे तेल की खपत लगभग 55 लाख बैरल तक पहुंच गई है। 5 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) कच्चे तेल का आयात किया था। वर्तमान वित्त वर्ष 2024-25 में भी यह निर्भरता 85% से 88% के बीच बनी हुई है। भारत के तेल आयात बास्केट में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है और रूस अब भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जिसकी हिस्सेदारी कुल आयात में लगभग 37% से 40% के बीच है। इसके बाद इराक 21% की हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं की सूची में शामिल हैं। घरेलू स्तर पर उत्पादन की सीमित क्षमता के कारण भारत को अपनी बढ़ती औद्योगिक और परिवहन संबंधी जरूरतों के लिए इन देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
प्राकृतिक गैस और एलएनजी की आपूर्ति का ढांचा
प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी भारत की स्थिति आयात पर काफी हद तक निर्भर है। देश की कुल प्राकृतिक गैस की खपत लगभग 189 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है। इस मांग का लगभग 50% से अधिक हिस्सा आयातित तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के माध्यम से पूरा किया जाता है। 5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन के स्तर पर स्थिर है, जो बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। एलएनजी के आयात के लिए भारत मुख्य रूप से कतर पर निर्भर है, जहाँ से कुल आयात का लगभग 47% से 50% हिस्सा आता है। कतर के अलावा, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और ओमान भी भारत को गैस की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देश हैं। उर्वरक उत्पादन, बिजली उत्पादन और शहरी गैस वितरण (CGD) नेटवर्क के विस्तार के कारण प्राकृतिक गैस की मांग में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है।
रसोई गैस (एलपीजी) और होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व
भारत में रसोई गैस यानी एलपीजी की खपत में पिछले एक दशक में भारी उछाल आया है। आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60% हिस्सा आयात करता है। एलपीजी आपूर्ति श्रृंखला के लिए सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक मार्ग है। भारत द्वारा आयात की जाने वाली कुल एलपीजी का लगभग 90% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से होकर आता है। यह जलमार्ग ओमान और ईरान के बीच स्थित है और वैश्विक तेल व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। मध्य पूर्व में किसी भी प्रकार के सैन्य संघर्ष या तनाव की स्थिति में इस मार्ग के बाधित होने का सीधा असर भारत की रसोई गैस आपूर्ति पर पड़ता है। सरकार और तेल विपणन कंपनियां इस जोखिम को कम करने के लिए रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक मार्गों पर विचार करती रहती हैं, लेकिन वर्तमान में निर्भरता इसी मार्ग पर बनी हुई है।
वैश्विक तनाव और घरेलू कीमतों पर प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली अस्थिरता का सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब भी मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है, वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उछाल आता है। भारत के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती पेश करती है; एक तरफ व्यापार घाटा बढ़ता है और दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं। 09 प्रति लीटर की बढ़ोतरी इसी का एक उदाहरण है। तेल को 'काला सोना' कहा जाता है क्योंकि यह परिवहन से लेकर कृषि और विनिर्माण तक हर क्षेत्र की बुनियादी जरूरत है। अधिकारियों के अनुसार, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार का व्यवधान भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम है, जिसे कम करने के लिए आयात स्रोतों के विविधीकरण पर जोर दिया जा रहा है।
घरेलू उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियां
भारत सरकार घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन वर्तमान में यह मांग की तुलना में काफी कम है और घरेलू उत्पादन में वृद्धि न होने का मुख्य कारण पुराने तेल क्षेत्रों से उत्पादन में गिरावट और नए क्षेत्रों की खोज में लगने वाला समय है। 5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन प्राकृतिक गैस का उत्पादन हो रहा है, जो कुल आवश्यकता का आधा भी नहीं है। इसी तरह, कच्चे तेल के मामले में भी घरेलू उत्पादन कुल मांग का केवल 12% से 15% ही पूरा कर पाता है। आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा के लिए भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) बनाए हैं, लेकिन वे केवल कुछ दिनों की आपातकालीन जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हैं। भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत अब नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधनों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, ताकि जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जा सके।
