भारतीय रुपया पहली बार 93 के पार, डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड गिरावट

भारतीय रुपया शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 93 के ऐतिहासिक निचले स्तर को पार कर गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा की जा रही निरंतर बिकवाली ने घरेलू मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट से आयातित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।

भारतीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार को ऐतिहासिक हलचल देखी गई, जब रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। 92 पर खुली। 08 पर पहुंच गई। यह गिरावट पिछले बंद भाव के मुकाबले 19 पैसे की कमी को दर्शाती है। 89 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। गुरुवार को गुड़ी पड़वा के उपलक्ष्य में विदेशी मुद्रा बाजार बंद रहने के कारण शुक्रवार को बाजार खुलते ही यह दबाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

मुद्रा बाजार में गिरावट के प्रमुख कारण

बाजार विशेषज्ञों और ट्रेजरी अधिकारियों के अनुसार, रुपए में इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक जिम्मेदार हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और डॉलर की मजबूती ने घरेलू मुद्रा पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी (Finrex Treasury Advisors LLP) के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाकर रुपए को और अधिक गिरने से बचाने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय इक्विटी बाजार से लगातार पूंजी निकालने के कारण रुपए की स्थिति कमजोर बनी हुई है। आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने हालिया सत्रों में भारी बिकवाली की है, जिससे डॉलर की मांग में भारी इजाफा हुआ है।

विदेशी निवेशकों की निकासी और बाजार की स्थिति

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली का सिलसिला मार्च महीने में भी जारी रहा। एक्सचेंज से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने मार्च महीने में अब तक स्थानीय शेयर बाजार से 8 अरब डॉलर से अधिक की राशि निकाली है। यह जनवरी 2025 के बाद से किसी एक महीने में होने वाली सबसे बड़ी निकासी दर्ज की गई है। 19 करोड़ के शेयर बेचे। 65 पर कारोबार कर रहा था। शेयर बाजार की इस तेजी ने रुपए को और अधिक गिरने से रोकने में कुछ हद तक मदद की है।

डॉलर इंडेक्स और कच्चे तेल का प्रभाव

25 पर पहुंच गया। डॉलर इंडेक्स में इस बढ़त का सीधा मतलब है कि अन्य वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर अधिक शक्तिशाली हो रहा है। 9 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। हालांकि, एक दिन पहले तेल की कीमतें 119 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थीं। ऊर्जा की कीमतों में यह उतार-चढ़ाव भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए व्यापार घाटे की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना देता है, जिसका सीधा असर मुद्रा के मूल्य पर पड़ता है।

आयातित महंगाई और आम जनता पर असर

रुपए के मूल्य में गिरावट का सीधा प्रभाव भारत की आयात लागत पर पड़ता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, जब रुपया कमजोर होता है, तो विदेशों से मंगाई जाने वाली वस्तुओं जैसे कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, और मशीनरी के लिए अधिक भुगतान करना पड़ता है। इसे 'आयातित महंगाई' (Imported Inflation) कहा जाता है। इसका असर घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों के साथ-साथ अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, जो छात्र विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या जो लोग विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं, उनके लिए खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) से जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों और अमेरिका द्वारा तेल आपूर्ति बढ़ाने के कदमों के बावजूद, निकट भविष्य में रुपए पर दबाव बने रहने की आशंका जताई जा रही है।