भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट: निवेशकों के ₹13 लाख करोड़ डूबे

मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण भारतीय शेयर बाजार में सोमवार को बड़ी गिरावट दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार में ही निवेशकों के लगभग ₹13 लाख करोड़ डूब गए। सेंसेक्स और निफ्टी में 2% से अधिक की गिरावट आई, जबकि रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया।

भारतीय शेयर बाजार के लिए सोमवार का दिन 'ब्लैक मंडे' साबित हुआ। पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के संकट और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी में भारी गिरावट देखी गई और बाजार खुलते ही बिकवाली का ऐसा दौर चला कि महज एक घंटे के भीतर निवेशकों की करीब ₹13 लाख करोड़ की संपत्ति स्वाहा हो गई। यह गिरावट पूरे एशिया में जोखिम से बचने के व्यापक रुझान को दर्शाती है, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।

85 पर आ गया। बाजार में गिरावट का आलम यह था कि लगभग 2990 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि केवल 592 शेयर ही बढ़त बनाने में कामयाब रहे। 153 शेयरों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। पिछले कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार को बीएसई का कुल मार्केट कैप करीब ₹429 लाख करोड़ था, जो सोमवार को घटकर ₹416 लाख करोड़ के स्तर पर आ गया।

मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव का गहराता संकट

बाजार में इस बड़ी गिरावट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दी गई चेतावनी ने वैश्विक बाजारों में डर का माहौल पैदा कर दिया है। ट्रंप ने शनिवार को धमकी दी थी कि यदि ईरान ने 48 घंटों के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को नहीं खोला, तो उसके ऊर्जा ढांचे को पूरी तरह तबाह कर दिया जाएगा। इसके जवाब में तेहरान ने भी चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने उसके बिजली संयंत्रों को निशाना बनाया, तो वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह बंद कर देगा। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों को जोखिम वाली संपत्तियों से दूर कर दिया है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और मुद्रास्फीति की चिंता

9 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। आपूर्ति में संभावित बाधाओं की चिंताओं के बीच तेल की कीमतें लगातार 110 डॉलर के स्तर से ऊपर बनी हुई हैं। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर घरेलू मुद्रास्फीति को प्रभावित करती हैं और राजकोषीय घाटे पर दबाव डालती हैं। बाजार के जानकारों के अनुसार, तेल की कीमतों में अस्थिरता ने बाजार की धारणा को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है।

भारतीय रुपये का रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचना

8925 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि की आशंका ने रुपये पर भारी दबाव डाला है। अमेरिका-ईरान संघर्ष की शुरुआत के बाद से घरेलू मुद्रा में लगभग 3% की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। रुपये की इस कमजोरी ने विदेशी निवेशकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि इससे उनके निवेश का मूल्य कम हो जाता है। मुद्रा बाजार में इस अस्थिरता का सीधा असर इक्विटी मार्केट पर देखने को मिला है।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भारी बिकवाली

बाजार में गिरावट का एक और प्रमुख कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा की जा रही रिकॉर्ड बिकवाली है। NSDL के आंकड़ों के मुताबिक, FPIs ने मार्च महीने में 20 तारीख तक भारतीय वित्तीय बाजार से 103967 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और रुपये की कमजोरी के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों को बेचना जारी रखा है। अकेले अमेरिका-ईरान-इजराइल युद्ध शुरू होने के बाद से 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेचे जा चुके हैं। विदेशी पूंजी की इस निकासी ने बाजार के सेंटिमेंट को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है।

बाजार पूंजीकरण और क्षेत्रीय सूचकांकों पर प्रभाव

सोमवार की गिरावट ने बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण को ₹429 लाख करोड़ से घटाकर ₹416 लाख करोड़ कर दिया। क्षेत्रीय सूचकांकों की बात करें तो बैंकिंग, ऑटो, आईटी और मेटल सेक्टर में सबसे ज्यादा बिकवाली देखी गई और निफ्टी बैंक और निफ्टी आईटी जैसे प्रमुख इंडेक्स में 2% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। बाजार में चौतरफा बिकवाली के कारण मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक भी दबाव में रहे। वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू कारकों के मेल ने बाजार को एक अस्थिर दौर में धकेल दिया है, जहां निवेशक अब सुरक्षित निवेश विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।