भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट: सेंसेक्स 900 अंक टूटा, निवेशक प्रभावित

शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई, जहां सेंसेक्स 900 अंक और निफ्टी 300 अंक से अधिक लुढ़क गया। वैश्विक संकेतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच निवेशकों को लगभग ₹6.00 lakh crore का नुकसान हुआ। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और रुपये की कमजोरी ने बाजार पर दबाव बनाया।

भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार की सुबह भारी उतार-चढ़ाव और बिकवाली का माहौल देखा गया। गुरुवार को अवकाश के बाद जब शुक्रवार को बाजार खुला, तो निवेशकों को वैश्विक अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ा। शुरुआती कारोबार में ही बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स लगभग 800 अंक नीचे गिर गया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी भी 1% से अधिक की गिरावट के साथ खुला। कारोबार के पहले कुछ घंटों में ही निवेशकों की संपत्ति में भारी कमी दर्ज की गई।

सूचकांकों में गिरावट और बाजार पूंजीकरण का नुकसान

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, सुबह लगभग 10:00 बजे सेंसेक्स 900 अंकों से अधिक यानी 1% से ज्यादा गिरकर 74,347 के इंट्राडे निचले स्तर पर पहुंच गया। इसी तरह, निफ्टी 50 भी लगभग 300 अंक या 1% से अधिक की गिरावट के साथ 23,026 के स्तर पर आ गया। 00 lakh crore रह गया। 00 lakh crore का नुकसान उठाना पड़ा। मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी 1% से अधिक की गिरावट देखी गई, जो बाजार में व्यापक बिकवाली का संकेत देती है।

डोनाल्ड ट्रंप के बयान और भू-राजनीतिक अनिश्चितता

बाजार में इस अस्थिरता का एक मुख्य कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान और पश्चिम एशिया में जारी तनाव को माना जा रहा है। ट्रंप ने हाल ही में कहा कि अमेरिका 6 अप्रैल तक ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर संभावित हमलों को टाल देगा। हालांकि, दूसरी ओर ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि इजराइल युद्ध समाप्त होने से पहले ईरान की सैन्य क्षमताओं को लक्षित करना चाहता है। इन विरोधाभासी बयानों ने वैश्विक निवेशकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह तनाव लंबा खिंचता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा कीमतों पर पड़ेगा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आर्थिक प्रभाव

ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है और 00 प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से देश के व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ता है। अधिकारियों और विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की ऊंची कीमतें कंपनियों की इनपुट लागत को बढ़ाती हैं, जिससे उनके मुनाफे पर नकारात्मक असर पड़ता है। बाजार में मौजूदा गिरावट इस चिंता को भी दर्शा रही है कि ऊर्जा की बढ़ती लागत मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकती है।

रुपये का ऐतिहासिक निचला स्तर और मुद्रा दबाव

शेयर बाजार में गिरावट के साथ-साथ भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। 15 के स्तर के आसपास पहुंच गया, जो इसके पिछले रिकॉर्ड स्तरों से भी नीचे है। 50% की गिरावट दर्ज की गई है। मुद्रा बाजार में इस कमजोरी ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की धारणा को प्रभावित किया है। डॉलर की मजबूती और घरेलू बाजार से पूंजी की निकासी ने रुपये पर दबाव और बढ़ा दिया है, जिससे आयात महंगा होने की संभावना है।

वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेत

भारतीय बाजार की गिरावट केवल घरेलू कारकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसे वैश्विक बाजारों से भी नकारात्मक संकेत मिले। 00% की गिरावट देखी गई। 00% तक टूट गए। वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरों की चिंता और भू-राजनीतिक जोखिमों ने निवेशकों को जोखिम वाली संपत्तियों से दूर रहने पर मजबूर किया है, जिसका सीधा असर दलाल स्ट्रीट पर दिखाई दिया।