अमेरिकी नाकेबंदी बेअसर? ईरान ने चीन और पाकिस्तान को रेल से भेजा तेल

अमेरिका द्वारा लगाई गई समुद्री नाकेबंदी के बीच ईरान ने चीन और पाकिस्तान को तेल और एलपीजी की आपूर्ति जारी रखने के लिए रेलवे मार्ग का सहारा लिया है। रिपोर्टों के अनुसार, चीन जाने वाली मालगाड़ियों की संख्या में तीन गुना वृद्धि हुई है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों को चुनौती दे रही है।

अमेरिका द्वारा लगाई गई समुद्री नाकेबंदी के बीच ईरान ने अपनी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए एक नया रास्ता खोज लिया है। ईरान अब चीन और पाकिस्तान तक तेल और एलपीजी (LPG) की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए रेलवे मार्ग का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है। ईरानी समाचार एजेंसी फार्स के अनुसार, 13 अप्रैल को अमेरिकी नाकेबंदी शुरू होने के लगभग 50 दिन बाद चीन की ओर जाने वाली मालगाड़ियों की संख्या में तीन गुना वृद्धि देखी गई है। रात के अंधेरे में तेल के टैंकरों से लदी लंबी ट्रेनें लगातार चीन की सीमा की ओर बढ़ती देखी जा रही हैं, जो इस बात का संकेत है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपने निर्यात को रुकने नहीं देना चाहता।

मध्य एशिया के रेल नेटवर्क का बढ़ता महत्व

ईरान का अधिकांश तेल निर्यात ऐतिहासिक रूप से समुद्री रास्तों और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होता रहा है। हालांकि, अमेरिका की बढ़ती सख्ती ने ईरान को वैकल्पिक रास्तों की तलाश करने पर मजबूर कर दिया है। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, ईरान ने एशियाई देशों को औसतन 1840000 बैरल प्रतिदिन तेल का निर्यात किया था। अब समुद्र के रास्ते पहले जैसी मात्रा में तेल भेजना चुनौतीपूर्ण हो गया है, इसलिए मई 2025 में शुरू हुआ 10400 किलोमीटर लंबा चीन-ईरान रेलवे कॉरिडोर इस रणनीति का मुख्य केंद्र बन गया है। यह रेल मार्ग चीन के शियान शहर से शुरू होकर कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों से गुजरते हुए तेहरान तक पहुंचता है। समुद्री मार्ग से जहां सामान पहुंचने में लगभग एक महीने का समय लगता है, वहीं इस रेल मार्ग से यह सफर मात्र 15 दिनों में पूरा हो जाता है।

बुनियादी ढांचे में निवेश और बढ़ती ट्रेनें

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी नाकेबंदी के बाद शियान से तेहरान जाने वाली मालगाड़ियों की आवृत्ति में तेजी से इजाफा हुआ है। पहले जहां सप्ताह में केवल एक ट्रेन चलती थी, वहीं अब हर तीन से चार दिन में एक ट्रेन रवाना की जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में चीन, ईरान, रूस और मध्य एशियाई देशों ने मिलकर कई नए रेलवे कॉरिडोर विकसित किए हैं और वर्ष 2024 में चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान रेलवे परियोजना की शुरुआत हुई थी, जिसमें चीन ने 2 अरब 35 करोड़ डॉलर का भारी निवेश किया है। इसके अलावा, नवंबर 2025 में रूस से ईरान तक पहली मालगाड़ी भी कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के रास्ते पहुंची थी, जो इस क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत करती है।

क्या रेल मार्ग समुद्री व्यापार की जगह ले सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि रेल मार्ग ईरान को तात्कालिक राहत प्रदान कर रहा है, लेकिन यह समुद्री निर्यात का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता। क्षमता के लिहाज से देखा जाए तो एक मालगाड़ी आमतौर पर 60000 से 70000 बैरल तेल ही ले जा सकती है। इसकी तुलना में एक सामान्य तेल टैंकर 600000 बैरल से अधिक और एक बहुत बड़ा क्रूड कैरियर (VLCC) 2000000 बैरल से अधिक तेल ले जाने में सक्षम होता है। इसके अलावा, ईरान के मुख्य तेल क्षेत्र देश के दक्षिणी हिस्से में स्थित हैं, जबकि चीन की बड़ी रिफाइनरियां उसके पूर्वी तट पर हैं, जिससे रेल द्वारा परिवहन काफी जटिल हो जाता है। यदि ईरान एक खेप में 70000 बैरल तेल चीन भेजता है, तो उसे लगभग 52 लाख 50 हजार डॉलर से लेकर 70 लाख डॉलर तक की आय हो सकती है। यह राशि समुद्री मार्ग से होने वाली अरबों डॉलर की कमाई के मुकाबले काफी कम है।