जेएनयू परिसर में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाने के मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई है और यह कार्रवाई कुछ छात्रों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन के बाद की गई है, जिसमें कथित तौर पर देश विरोधी और हिंसा को उकसाने वाले नारे लगाए गए थे। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने इस घटना को गंभीरता से लिया है और स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे कृत्यों में शामिल किसी भी छात्र को बख्शा नहीं जाएगा। यह घटना एक बार फिर से जेएनयू में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुशासन की सीमाओं। पर बहस छेड़ दी है, जहां शैक्षणिक माहौल को बनाए रखने की चुनौती सामने आई है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कड़ा संदेश
जेएनयू प्रशासन ने इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि विश्वविद्यालय पढ़ाई, नए विचारों और नवाचार का केंद्र है, न कि नफरत फैलाने का अड्डा। प्रशासन ने दोहराया है कि सभी को अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का। दुरुपयोग हिंसा भड़काने, कानून तोड़ने या देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए नहीं किया जा सकता। ऐसे किसी भी कृत्य को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया। जाएगा, क्योंकि यह विश्वविद्यालय के मूल सिद्धांतों और राष्ट्रीय मूल्यों के खिलाफ है। यह बयान विश्वविद्यालय के मूल मूल्यों और शैक्षणिक माहौल को बनाए रखने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जहां रचनात्मक बहस और विचारों का आदान-प्रदान होता है, न कि विद्वेष का प्रचार।
सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी
इस घटना में शामिल पाए गए छात्रों के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रबंधन ने तत्काल और कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है। इसमें छात्रों का निलंबन, निष्कासन और यहां तक कि विश्वविद्यालय से हमेशा के लिए बाहर किया जाना भी शामिल है और प्रशासन का यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए है कि परिसर में शांति, व्यवस्था और शैक्षणिक माहौल बना रहे, और कोई भी छात्र नियमों का उल्लंघन कर विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को धूमिल न कर सके। यह चेतावनी उन छात्रों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो विश्वविद्यालय के नियमों और देश के कानूनों का उल्लंघन करने का प्रयास करते हैं, और यह दर्शाता है कि ऐसे कृत्यों के गंभीर परिणाम होंगे।
शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत नामंजूर होने का विरोध
दावा किया जा रहा है कि यह विरोध प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली हिंसा मामले में आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत नामंजूर किए जाने के विरोध में किया गया था। सोमवार को जेएनयू परिसर में कुछ छात्रों ने इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए खुलेआम उग्र नारेबाजी की। यह घटना एक बार फिर से जेएनयू में कुछ छात्रों के बीच कथित देशविरोधी मानसिकता के उभरने का संकेत देती है, जैसा कि पहले भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं और इस तरह के विरोध प्रदर्शन अक्सर परिसर में तनाव पैदा करते हैं और विश्वविद्यालय के शांतिपूर्ण माहौल को भंग करते हैं।
उकसाने वाले और अमर्यादित नारों के आरोप
प्रदर्शनकारी छात्रों पर आरोप है कि उन्होंने न केवल संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देने वाले नारे लगाए, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के खिलाफ हिंसा को उकसाने वाले और अमर्यादित नारे भी लगाए। इस तरह के नारे सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चिंताएं पैदा करते हैं, क्योंकि वे समाज में विभाजन और अशांति को बढ़ावा दे सकते हैं। इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। ताकि कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जा सके और ऐसे कृत्यों को रोका जा सके।
यह पहली बार नहीं है जब जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी परिसर में इस तरह के आपत्तिजनक नारे लगाने का मामला सामने आया है। इससे पहले साल 2016 और 2020 में भी इसी तरह की घटनाएं हुई थीं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी बहस छेड़ दी थी और विश्वविद्यालय की छवि पर सवाल उठाए थे। इन घटनाओं ने विश्वविद्यालय के भीतर कुछ तत्वों द्वारा कथित देश विरोधी गतिविधियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं पर सवाल उठाए थे। वर्तमान घटना इन पिछली घटनाओं की याद दिलाती है और विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए एक चुनौती पेश करती है कि वह ऐसे कृत्यों को कैसे रोके और परिसर में एक स्वस्थ शैक्षणिक वातावरण बनाए रखे।
दिल्ली सरकार ने घटना को बताया निंदनीय
इस पूरे मामले पर दिल्ली के गृहमंत्री आशीष सूद ने बयान जारी कर नारेबाजी की घटना को अत्यंत निंदनीय बताया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन हिंसा, उकसावे और व्यक्तिगत या वैचारिक हिंसा की राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। सूद ने जोर देकर कहा कि नीतियों पर वैचारिक लड़ाई हो सकती है और लोकतंत्र में असहमति पर सहमत हुआ जा सकता है, लेकिन देश को तोड़ने की साजिश करने वालों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिए। यह बयान सरकार की उस दृढ़ता को दर्शाता है कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता से समझौता नहीं किया जाएगा।
देश तोड़ने की साजिश करने वालों के प्रति सहानुभूति नहीं
आशीष सूद ने अपने बयान में आगे कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से हमारी वैचारिक लड़ाई नीतियों पर हो सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि शिक्षा नीति, वित्तीय नीतियों या अन्य जनहित के मुद्दों पर संवाद और बहस होनी चाहिए, जो लोकतंत्र का एक स्वस्थ हिस्सा है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग देश को तोड़ने की साजिश करते हैं, उनके प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं होनी चाहिए। यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव को प्राथमिकता देता है, जबकि वैध असहमति के लिए जगह भी छोड़ता है। सरकार का मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक सीमा होती है, और वह सीमा तब पार हो जाती है जब यह देश की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देती है।