पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई कथित गड़बड़ियों के विरोध में कोलकाता के एस्प्लेनेड मेट्रो चैनल इलाके में अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री का यह कदम राज्य में आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने के विरोध में उठाया गया है। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि भारतीय चुनाव आयोग द्वारा संचालित स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान मनमाने ढंग से नाम काटे गए हैं, जिससे राज्य के लाखों नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ है और यह धरना प्रदर्शन ऐसे समय में आयोजित किया गया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पश्चिम बंगाल दौरा प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री के साथ उनकी पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए हैं।
इस विवाद की जड़ें चुनाव आयोग द्वारा 28 फरवरी को जारी की गई पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची में छिपी हैं। राज्य सरकार और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि इस सूची के प्रकाशन के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने इस प्रक्रिया को 'साजिश' करार देते हुए कहा कि यह निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा के विरुद्ध है। उन्होंने विशेष रूप से उन मामलों पर ध्यान केंद्रित किया है जहां जीवित व्यक्तियों को आधिकारिक रिकॉर्ड में मृत दिखाकर उनके नाम हटा दिए गए हैं।
जीवित व्यक्तियों को मृत दिखाने का दावा और 22 लोगों की पेशी
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने धरने के दौरान एक गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने कई ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं जिन्हें दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया गया है, जबकि वे वास्तव में जीवित हैं। मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि वह ऐसे 22 व्यक्तियों को मीडिया और जनता के सामने पेश करेंगी जिन्हें चुनाव आयोग की सूची में मृत दिखाया गया है। ममता बनर्जी के अनुसार, यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में कितनी बड़ी लापरवाही या जानबूझकर की गई गड़बड़ी हुई है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 8 ऐसे परिवारों को भी मंच पर लाने की बात कही है जिन्होंने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान गंभीर नुकसान झेलने का दावा किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन लोगों को सामने लाकर वह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना चाहती हैं और यह दिखाना चाहती हैं कि जमीनी स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया कितनी त्रुटिपूर्ण रही है।
मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर गंभीर आरोप
तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि पोस्ट-एसआईआर प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किसी पारदर्शी मानक का पालन नहीं किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के विभिन्न हिस्सों से ऐसी शिकायतें मिली हैं जहां लोगों को बिना किसी पूर्व सूचना या पर्याप्त जांच के सूची से बाहर कर दिया गया। पार्टी के अनुसार, यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं है बल्कि एक व्यवस्थित प्रयास है जिसके तहत विशिष्ट क्षेत्रों और समुदायों के मतदाताओं को निशाना बनाया गया है और ममता बनर्जी ने धरने के मंच से कहा कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण एक संवैधानिक जिम्मेदारी है, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की है कि हटाए गए नामों की दोबारा जांच की जाए और पात्र मतदाताओं को तुरंत उनके अधिकार वापस दिए जाएं।
तृणमूल कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत आंकड़े और सांख्यिकीय आपत्तियां
पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इस मुद्दे पर विस्तृत आंकड़े पेश करते हुए चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, प्रारंभिक ड्राफ्ट मतदाता सूची से लगभग 58 लाख नाम हटाए गए थे, लेकिन अंतिम सूची जारी होने तक यह संख्या बढ़कर लगभग 63 लाख हो गई है। इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम अभी भी 'जांच के अधीन' श्रेणी में रखे गए हैं, जिससे उनकी मतदान की स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। अभिषेक बनर्जी ने तर्क दिया कि इतने बड़े पैमाने पर नामों का हटाया जाना महज एक प्रशासनिक संयोग नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जब लाखों लोगों को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित किया जाता है, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। पार्टी ने इन आंकड़ों को लेकर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण की मांग की है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के दौरे का संदर्भ और राजनीतिक प्रभाव
ममता बनर्जी का यह धरना प्रदर्शन रणनीतिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त के पश्चिम बंगाल दौरे से ठीक पहले आयोजित किया गया है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, मुख्यमंत्री इस विरोध के माध्यम से चुनाव आयोग पर दबाव बनाना चाहती हैं ताकि आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची की त्रुटियों को सुधारा जा सके। धरने के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि राज्य सरकार चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर नजर रख रही है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि जब तक हटाए गए नामों को लेकर संतोषजनक समाधान नहीं निकलता, उनका विरोध जारी रहेगा। यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है, जो आने वाले दिनों में और अधिक तीव्र हो सकता है।
लोकतांत्रिक अधिकारों और निष्पक्ष चुनाव की मांग
धरने के दौरान ममता बनर्जी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार है और इसे किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से छीना नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला है और यदि मतदाता सूची ही दोषपूर्ण होगी, तो चुनाव के परिणाम कभी भी जनता की वास्तविक इच्छा को प्रतिबिंबित नहीं करेंगे। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग ऐसी कार्रवाइयां कर रहा है जिससे विपक्षी दलों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या कम की जा सके। उन्होंने राज्य की जनता से अपील की है कि वे अपनी मतदाता पहचान पत्र की स्थिति की जांच करें और यदि उनका नाम हटाया गया है, तो वे इसके खिलाफ आवाज उठाएं।
