Nepal News / नेपाल में सांप्रदायिक हिंसा का बढ़ता ग्राफ: 8 साल में 17 दंगे, क्यों सुलग रहा शांत देश?

पिछले 8 सालों में नेपाल में हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव में भारी वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप भारत के सीमावर्ती इलाकों में 17 दंगे हुए हैं। हाल ही में वीरगंज और धनुषा में टिकटॉक पोस्ट और मस्जिद में तोड़फोड़ के बाद कर्फ्यू लगाना पड़ा। विशेषज्ञ इसे 2008 के बाद धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने और मुस्लिम समुदाय की बढ़ती धार्मिक स्वतंत्रता की मांग से जोड़ रहे हैं।

नेपाल, जिसे कभी एक शांत और सद्भावपूर्ण राष्ट्र के रूप में जाना जाता था, पिछले आठ वर्षों से सांप्रदायिक हिंसा की आग में सुलग रहा है। 2008 से पहले, हिंदू और मुसलमानों के बीच छिटपुट घटनाएं ही देखने को मिलती थीं, लेकिन उसके बाद से तनाव में नाटकीय वृद्धि हुई है। विशेष रूप से भारत के सीमावर्ती इलाकों में, दोनों समुदायों के बीच 17 बड़े दंगे दर्ज किए गए हैं, जिससे। यह सवाल उठ रहा है कि आखिर यह शांत हिमालयी राष्ट्र बार-बार सांप्रदायिक संघर्षों का शिकार क्यों हो रहा है।

वर्तमान संकट: वीरगंज और धनुषा में हिंसा

हाल ही में, नेपाल और भारत के सीमावर्ती इलाकों में हिंदू बनाम मुस्लिम की लड़ाई एक बार फिर भड़क उठी है। हिंसक प्रदर्शनों और आगे के तनाव के खतरे को देखते हुए, वीरगंज और। धनुषा के कई शहरों में तत्काल प्रभाव से कर्फ्यू लागू करना पड़ा है। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि शुरुआत में यह एक सामान्य विवाद प्रतीत हुआ, लेकिन जल्द ही यह सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया, जिसने पूरे इलाके में अशांति फैला दी। इस तेजी से बिगड़ती स्थिति ने अधिकारियों को आनन-फानन में कर्फ्यू की घोषणा। करने पर मजबूर कर दिया, ताकि कानून और व्यवस्था को बनाए रखा जा सके। नेपाल में पिछले आठ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा की कुल 17 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें से अधिकांश भारतीय सीमावर्ती इलाकों में ही हुई हैं, जो इन क्षेत्रों की संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।

हिंसा की तात्कालिक वजह: टिकटॉक पोस्ट और मस्जिद पर हमला

द हिमालयन टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, वीरगंज स्थित कमला इलाके में हालिया हिंसा की शुरुआत तब हुई जब कथित तौर पर दो मुस्लिम युवकों ने टिकटॉक पर एक हिंदू विरोधी पोस्ट साझा किया। इस पोस्ट के सामने आने के बाद स्थानीय हिंदू समुदाय में भारी नाराजगी फैल गई। जब पुलिस ने इन युवकों के खिलाफ तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की, तो आक्रोशित भीड़ ने इलाके में स्थित एक मस्जिद पर तोड़फोड़ कर दी। इस घटना ने पूरे इलाके में तनाव को और बढ़ा दिया, जिससे स्थिति विस्फोटक हो गई। मस्जिद पर हुए इस हमले के विरोध में मुस्लिम समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए। उन्होंने टायर जलाकर और प्रदर्शन करके सरकार के प्रति अपना विरोध व्यक्त किया। इसके जवाब में, हिंदू समुदाय के लोग भी विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो गए, जिससे दोनों समुदायों के बीच टकराव और गहरा गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, पूरे इलाके में तत्काल कर्फ्यू लागू कर दिया गया ताकि किसी भी बड़ी हिंसा को रोका जा सके। धनुषा जिला पुलिस बल के प्रवक्ता गणेश बाम ने बताया कि पुलिस ने टिकटॉक वीडियो पोस्ट करने और मस्जिद में तोड़फोड़ की। घटना में शामिल होने के आरोप में तीन लोगों को हिरासत में लिया है और मामले की आगे की जांच जारी है।

आठ साल में 17 दंगे: एक चिंताजनक पैटर्न

नेपाल में पिछले आठ वर्षों में हिंदू और मुसलमानों के बीच हुई 17 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं एक चिंताजनक पैटर्न को उजागर करती हैं। ये घटनाएं अक्सर धार्मिक जुलूसों, त्योहारों या सोशल मीडिया पोस्ट जैसे छोटे-मोटे विवादों से शुरू होती हैं और तेजी से बड़े दंगों में बदल जाती हैं।

2017: कपिलवस्तु के बसबरिया में दुर्गा विसर्जन

2017 में, कपिलवस्तु के बसबरिया में एक मस्जिद के पास से गुजर रही दुर्गा विसर्जन प्रतिमा पर पत्थरबाजी की घटना हुई। इस घटना के बाद इलाके में भारी तनाव फैल गया और रिपोर्ट के मुताबिक, 100 से अधिक मुस्लिम परिवार अपने घरों से विस्थापित होने पर मजबूर हुए, जिससे उनकी सुरक्षा और आजीविका पर गंभीर असर पड़ा।

नवंबर 2019: कपिलवस्तु में फिर हिंसक झड़पें

इसी इलाके में नवंबर 2019 में फिर से हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं और स्थानीय त्योहारों के जुलूसों को लेकर दोनों समुदायों के बीच झड़पें हुईं, जिनमें कई लोग घायल हो गए। इन झड़पों ने इलाके में स्थायी शांति स्थापित करने की चुनौती को उजागर किया।

सितंबर 2019: रोतहट में गणेश पूजा के दौरान हिंसा

सितंबर 2019 में, रोतहट इलाके में गणेश पूजा के दौरान हिंदू-मुस्लिम तनाव के कारण हिंसा भड़क उठी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को पूरे इलाके में कर्फ्यू लगाना पड़ा ताकि और अधिक नुकसान को रोका जा सके।

सितंबर 2020: सरलाही के मलंगवा में विश्वकर्मा प्रतिमा विसर्जन

सितंबर 2020 में, सरलाही के मलंगवा में विश्वकर्मा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान विवाद देखने को मिला। इस दौरान हुई पत्थरबाजी के कारण पूरे इलाके में कर्फ्यू लागू करना पड़ा, जिससे सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

नवंबर 2021: सरलाही के कलैया में स्थानीय त्योहार पर झड़पें

नवंबर 2021 में, सरलाही के कलैया में एक स्थानीय त्योहार के दौरान हिंदू-मुस्लिम झड़पें हुईं, जिसके कारण अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए और लोगों को घरों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।

नवंबर 2021: देवपुरा रूपेठा में छठ पूजा विवाद

इसी महीने, देवपुरा रूपेठा में छठ पूजा में कुछ मुस्लिम युवकों के हस्तक्षेप के बाद हिंदू और मुस्लिम समूहों के बीच तनाव पैदा हुआ और हिंसक झड़पें हुईं, जिससे इलाके में भय का माहौल बन गया।

अक्टूबर 2022: महोतरी के भंगाहा नगरपालिका में जुलूस के दौरान झड़पें

अक्टूबर 2022 में, महोतरी के भंगाहा नगरपालिका में जुलूस के दौरान झड़पें देखने को मिलीं। इन घटनाओं ने सरकार और प्रशासन की टेंशन बढ़ा दी, क्योंकि उन्हें सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

जुलाई 2023: सरलाही के गोदैता में सड़क निर्माण और त्योहार को लेकर तनाव

जुलाई 2023 में, सरलाही के गोदैता में सड़क निर्माण और एक स्थानीय त्योहार को लेकर तनाव के कारण समुदायों के बीच झड़पें हुईं, जिससे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और धार्मिक आयोजनों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती सामने आई।

अक्टूबर 2023: बांके के नेपालगंज में ईद के जुलूसों के दौरान तनाव

अक्टूबर 2023 में, बांके के नेपालगंज में ईद के जुलूसों के दौरान तनाव देखने को मिला। इसके बाद स्थिति को शांत करने और भविष्य की घटनाओं को रोकने के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलानी पड़ी।

फरवरी 2024: रौतहट में सरस्वती पूजा के दौरान झड़पें

फरवरी 2024 में, रौतहट में सरस्वती पूजा के दौरान झड़पें देखी गईं। पुलिस को स्थिति को नियंत्रित करने और शांति बहाल करने के लिए कर्फ्यू लागू करना पड़ा।

फरवरी 2024: ईशनाथ और बीरगंज तक फैली झड़पें

इसी महीने, सरस्वती पूजा के दौरान ईशनाथ इलाके में एक और झड़प हुई। यह झड़प तेजी से बीरगंज तक फैल गई, जिसमें स्थानीय निवासी और पुलिसकर्मी दोनों घायल हुए, जिससे कानून प्रवर्तन के लिए भी खतरा पैदा हो गया।

अप्रैल 2024: बीरतनगर और सुनसरी के भूताहा बाजार में राम नवमी हिंसा

अप्रैल 2024 में, बीरतनगर और सुनसरी के भूताहा बाजार में राम नवमी की रैलियों के दौरान हिंसा भड़क उठी, जिससे त्योहारों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए।

अप्रैल 2025: बीरगंज में हनुमान जयंती जुलूस पर पथराव

अप्रैल 2025 में, बीरगंज के श्रीराम हॉल चौक के पास हनुमान जयंती जुलूस पर पथराव की घटना हुई। इस घटना में 41 लोग घायल हुए, जो सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती गंभीरता को दर्शाता है।

अगस्त 2025: जनकपुरधाम के पास गणेश प्रतिमा विसर्जन जुलूस हिंसक

अगस्त 2025 में, जनकपुरधाम के पास गणेश प्रतिमा विसर्जन जुलूस हिंसक हो गया, जिसमें पत्थरबाजी की खबरें आईं। इस दुखद घटना में 2 लोगों के मारे जाने की भी खबर आई, जो नेपाल में सांप्रदायिक हिंसा के घातक परिणामों को रेखांकित करता है।

अक्टूबर 2025: बीरगंज, नेपालगंज, दुदुवा और नारायणपुर में फिर झड़पें

अक्टूबर 2025 में, त्योहारों के जुलूसों के दौरान बीरगंज के नेपालगंज, दुदुवा और नारायणपुर में फिर से झड़पें हुईं, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि सांप्रदायिक तनाव एक व्यापक और लगातार बनी रहने वाली समस्या है।

अक्टूबर 2025: रिजवी जामा मस्जिद के पास दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान झड़पें

इसी महीने, रिजवी जामा मस्जिद के पास दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान झड़पें हुईं। पुलिस को घटना को रोकने और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल का इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे स्थिति की संवेदनशीलता और पुलिस के सामने आने वाली चुनौतियों का पता चलता है।

हिंदू और मुस्लिम की आग में क्यों सुलग रहा है नेपाल?

नेपाल में सांप्रदायिक हिंसा के बढ़ते मामलों के पीछे कई जटिल कारण हैं और यूएन मानवाधिकार काउंसिल (UNHRC) के लिए दिसंबर 2025 में प्रोफेसर निकोलस लेवरेट द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल में मुस्लिम विरोधी हिंसक घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसकी सबसे बड़ी वजह हिंदुओं के बीच बढ़ता जनजागरण बताया गया है। नेपाल की जनसंख्या में 82 प्रतिशत हिंदू हैं, जबकि मुसलमानों की संख्या लगभग 9 प्रतिशत है और यह जनसांख्यिकीय असंतुलन और हिंदुओं के बीच बढ़ती धार्मिक चेतना को तनाव का एक प्रमुख कारक माना जा रहा है। लेवरेट की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि नेपाल मीडिया में मुसलमानों को लेकर अधिकांश रिपोर्टें नहीं लिखी जाती हैं, जिससे उनकी आवाज और चिंताओं को पर्याप्त मंच नहीं मिल पाता है।

इतना ही नहीं, सामाजिक, राजनीतिक और न्याय प्रणाली में भी मुसलमानों की भागीदारी काफी कम है। इसका मतलब है कि सरकार और न्याय के स्तर पर मुसलमानों की कोई अहम भूमिका नहीं है, जिससे उनके मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने में बाधा आती है और उनमें अलगाव की भावना बढ़ सकती है। अमेरिका स्थित गेटिसबर्ग कॉलेज की प्रोफेसर मेगन एडमसन सिजापति के विश्लेषण से भी इस समस्या की जड़ें गहरी दिखाई देती हैं। उनके अनुसार, 2008 से पहले तक नेपाल एक हिंदू राष्ट्र था, जहां हिंदू धर्म को राजकीय धर्म का दर्जा प्राप्त था। हालांकि, संविधान लागू होने के बाद इसे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया गया और इस संवैधानिक परिवर्तन का गहरा प्रभाव पड़ा।

2008 से पहले तक नेपाल में जो मुसलमान समुदाय अपेक्षाकृत दबकर रहता था, वह धर्मनिरपेक्षता की घोषणा के बाद अपनी धार्मिक आजादी और पहचान की बात करने लगा और इस नई मुखरता का असर आसपास के हिंदू समुदायों पर पड़ा, जिन्हें यह बदलाव अपनी पारंपरिक स्थिति के लिए चुनौती के रूप में महसूस हुआ। इसी के परिणामस्वरूप, नेपाल में बार-बार सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं देखने को मिल रही। हैं, क्योंकि दोनों समुदाय अपनी-अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर संवेदनशील हो गए हैं। यह एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक संक्रमण है, जिसमें धार्मिक पहचान और अधिकारों को लेकर नए सिरे से संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है।