नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच गठबंधन की चर्चा क्यों हो रही है, पढ़ें पूरी रिपोर्ट विस्तार से

इजराइल में चुनाव के बाद सरकार गठन को लेकर गतिरोध जारी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विपक्षी नेता गादी आइजनकोट के बीच संभावित गठबंधन की चर्चाओं और राजनीतिक हलचल पर विस्तृत रिपोर्ट।

इजराइल की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त हलचल मची हुई है और चुनाव के बाद सरकार बनाने को लेकर गहरा गतिरोध पैदा हो गया है। मौजूदा राजनीतिक हालात के मुताबिक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट के साथ मिलकर सरकार बनाने को तैयार नजर आ रहे हैं, हालांकि सार्वजनिक रूप से वह ऐसी किसी भी योजना से साफ इनकार कर चुके हैं। इजराइली मीडिया संस्थान i24 न्यूज के अनुसार प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड के करीबी नेताओं ने यह जानकारी दी है कि प्रधानमंत्री सत्ता में बने रहने और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सभी संभावित विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को इस बात का बड़ा डर सता रहा है कि विपक्षी नेता गादी आइजनकोट कहीं अरब पार्टियों और अति-धार्मिक यहूदी गुटों के साथ हाथ मिलाकर अपनी सरकार न बना लें।

इजराइली संसद नेसेट में सीटों का मौजूदा गणित और पार्टियों की स्थिति

बीते 27 अक्टूबर को इजराइल में संसदीय चुनाव संपन्न हुए थे, जिनके नतीजों ने किसी भी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। इजराइल की 120 सदस्यों वाली संसद यानी नेसेट के चुनाव परिणामों के अनुसार प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सहयोगी दलों और गठबंधन को कुल 53 सीटें हासिल हुई हैं। गौरतलब है कि पिछली संसद में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास कुल 68 सीटें थीं, जिससे इस बार उनकी स्थिति कमजोर हुई है और बहुमत के जादुई आंकड़े से उनके सहयोगी दल आठ सीटें पीछे रह गए हैं। दूसरी ओर विपक्षी नेता गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को कुल 48 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। इसके अलावा चुनाव मैदान में उतरी अरब पार्टियों ने कुल 19 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की है। इन आंकड़ों को अगर बारीकी से देखा जाए तो विपक्ष और अरब पार्टियों की कुल सीटें मिलकर सरकार गठन के लिए जरूरी बहुमत के आंकड़े को पार कर जाती हैं, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते फिलहाल उनके बीच सरकार बनाने को लेकर कोई पुख्ता सहमति बनती हुई नजर नहीं आ रही है।

अरब पार्टियों के समर्थन को लेकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का बयान और विरोध

अरब पार्टियों के राजनीतिक समीकरणों में बढ़ते दखल को लेकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से बयान देते हुए कहा है कि विपक्षी नेता गादी आइजनकोट का अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाना देशद्रोह जैसा होगा। प्रधानमंत्री के इस तीखे बयान के बाद देश के विपक्षी नेताओं ने इसकी जमकर आलोचना की है और उन पर राजनीतिक स्वार्थ का आरोप लगाया है। विपक्षी नेताओं का साफ तौर पर यह आरोप है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू किसी भी कीमत पर देश में दूसरी सरकार बनने से रोकना चाहते हैं ताकि उनकी अपनी सत्ता सुरक्षित रह सके। इस राजनीतिक रस्साकशी के बीच बीते रविवार को कुछ दर्जन प्रदर्शनकारी विपक्षी नेता गादी आइजनकोट के घर के बाहर एकत्र हुए और उन्होंने अरब पार्टियों के साथ किसी भी प्रकार के गठबंधन की संभावना का खुलकर विरोध किया। इसके विपरीत हाल के दिनों में देश के कुछ अन्य हिस्सों में हुए प्रदर्शनों में यहूदी और अरब दलों को आपसी मतभेद भुलाकर साथ आने और मिलकर सरकार बनाने की मांग भी जोर-शोर से उठाई गई है, जिससे राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है।

चुनाव नतीजों की विश्वसनीयता पर उठे सवाल और आपराधिक गिरफ्तारियां

सरकार बनाने को लेकर चल रही अंदरूनी बातचीत और जोड़-तोड़ के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया और इसकी पारदर्शिता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। हालांकि लिकुड पार्टी की तरफ से ऐसा कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि अंतिम चुनाव नतीजे किसी भी तरह से प्रभावित हुए थे। लिकुड पार्टी ने मुख्य रूप से वोट खरीदने की कोशिश से जुड़े मामलों का हवाला दिया है। प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार 27 अक्टूबर को मतदान की प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले कैश यानी नकदी से भरे लिफाफों के साथ तीन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। इस घटना के ठीक दो दिन बाद इस्लामी पार्टी राअम से कथित संबंधों के गंभीर आरोपों के चलते चार और लोगों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया। हालांकि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यह भी सामने आया कि पहले गिरफ्तार किए गए तीन लोगों में से दो लोगों को पूछताछ के बाद रिहा किया जा चुका है। इसके अलावा इजराइल की प्रमुख सुरक्षा एजेंसी शिन बेट द्वारा इस पूरे चुनाव में किसी भी प्रकार के विदेशी दखल के शक की गहन जांच की जा रही है। चुनाव आयोग के प्रमुख नोआम सोलबर्ग ने इस मामले में स्पष्ट बयान देते हुए कहा है कि यदि चुनाव में विदेशी दखल के आरोप सही भी साबित हो जाते हैं, तब भी मौजूदा चुनाव के नतीजे नहीं बदलेंगे और इससे पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी कोई आंच नहीं आएगी।

विपक्षी नेता गादी आइजनकोट के आरोप और कतर की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान विपक्षी नेता गादी आइजनकोट ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर तीखा हमला बोलते हुए उन पर चुनाव नतीजों को गलत और विवादित साबित करने के लिए एक सुनियोजित मुहिम चलाने का गंभीर आरोप लगाया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपनी सफाई में यह दावा किया था कि खाड़ी देश कतर ने विपक्षी दलों की आर्थिक मदद की है ताकि चुनाव नतीजों को प्रभावित किया जा सके और हालांकि कतर ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किसी भी तरह का पैसा देने की बात से साफ इनकार कर दिया है। चुनाव आयोग के तय शेड्यूल के मुताबिक चुनाव नतीजों को आगामी 4 नवंबर को आधिकारिक रूप से मंजूरी मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है। इसी निर्धारित दिन यानी 4 नवंबर को इजराइल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग चुनाव में जीत दर्ज करने वाले विभिन्न दलों के नेताओं के साथ आमने-सामने की बातचीत करेंगे। इस विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रपति किसी एक प्रमुख नेता को आगामी 11 नवंबर तक सरकार बनाने का आधिकारिक मौका सौंपेंगे। उस चुने हुए नेता को बहुमत साबित करने के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाना होगा और इसके लिए उसे संविधान के अनुसार 28 दिन का समय मिलेगा। यदि वह नेता तय समय सीमा के भीतर बहुमत जुटाने में नाकाम रहता है, तो राष्ट्रपति के पास अधिकार होगा कि वह किसी दूसरे राजनीतिक नेता को सरकार बनाने का अवसर दें। अगर तमाम कोशिशों के बावजूद इजराइल में कोई भी स्थिर गठबंधन नहीं बन पाता है, तो देश को एक बार फिर से मध्यावधि चुनावों का सामना करना पड़ सकता है।