इजराइल में हुए हालिया चुनावों के बाद जारी किए गए एग्जिट पोल के आंकड़ों ने देश की राजनीतिक तस्वीर को पूरी तरह से उलझा दिया है। इन एग्जिट पोल के सामने आने के बाद दो मुख्य बातें पूरी तरह से साफ हो चुकी हैं। पहली बात यह है कि इजराइल की संसद यानी नेसेट (सदन) में इस बार भी किसी भी राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट और पूर्ण बहुमत मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्पष्ट समर्थन के बावजूद देश के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अकेले अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं और यदि ये एग्जिट पोल के आंकड़े आने वाले समय में वास्तविक चुनाव परिणामों में तब्दील होते हैं, तो प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मुश्किलें बहुत अधिक बढ़ सकती हैं, क्योंकि उनकी राजनीतिक साख और सत्ता का भविष्य अब पूरी तरह से कुछ अन्य नेताओं के निर्णयों पर निर्भर हो गया है।
इस पूरी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, ऐसी विकट स्थिति में सत्ता की चाबी उन दो प्रमुख मुस्लिम नेताओं के हाथों में चली गई है, जिन्हें तेल अवीव की जटिल सियासत में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का सबसे बड़ा और धुर विरोधी माना जाता है। इजराइल चुनाव के दौरान आए एग्जिट पोल के आंकड़ों का विस्तार से विश्लेषण करें तो प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को कुल 55 सीटों पर जीत हासिल हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, उनके सबसे बड़े धुर विरोधी माने जाने वाले आइजनकोट गठबंधन को भी लगभग 49 सीटों पर जीत मिलने का अनुमान जताया गया है। इसके अलावा, अरब समर्थित कुल दो पार्टियों को इस चुनाव में 16 सीटों पर बढ़त मिलती हुई दिखाई दे रही है।
यहाँ यह जानना बेहद जरूरी है कि इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। इस सदन में किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सदस्यों के समर्थन की अत्यंत आवश्यकता होती है। जब कोई भी गठबंधन जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाता है, तो छोटे दलों और क्षेत्रीय नेताओं का महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है, और यही स्थिति इस समय इजराइल के राजनीतिक पटल पर स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है।
वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, इन दो मुस्लिम नेताओं के पास इस समय इजराइल की सत्ता की चाबी मौजूद है। इनमें से पहले नेता यूसुफ जबरीन हैं, जो जॉइंट लिस्ट के प्रमुख नेता हैं। यूसुफ जबरीन के गठबंधन को इस चुनाव में 12 सीटों पर जीत मिलती हुई दिखाई दे रही है। राजनीतिक सफर की बात करें तो यूसुफ जबरीन साल 2016 में पहली बार इजराइल की संसद नेसेट के सदस्य बने थे और वे साल 2021 तक इस महत्वपूर्ण पद पर लगातार अपनी सेवाएं देते रहे थे। इस बार के चुनावों में उन्होंने एक बहुत बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए सभी अरब पार्टियों को एकजुट किया और एक मजबूत गठबंधन तैयार किया। इजराइल की मुख्यधारा की राजनीति में यूसुफ जबरीन को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का खुला और धुर विरोधी माना जाता है। चुनाव के आधिकारिक नतीजे सामने आने के बाद बहुत कुछ इसी बात पर निर्भर करेगा कि यूसुफ जबरीन क्या रुख अपनाते हैं। जबरीन जिस भी राजनीतिक धड़े की तरफ अपना समर्थन देंगे, उसी की इजराइल में आसानी से सरकार बन सकती है, क्योंकि वर्तमान में नेतन्याहू गठबंधन के पास 55 सीटें हैं और दूसरी तरफ आइजनकोट गठबंधन के पास भी 55 सीटें ही हैं, जिससे यह मुकाबला पूरी तरह से बराबरी पर आ गया है।
इन समीकरणों में दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता मंसूर अब्बास हैं, जो आरएएम गठबंधन के नेता के रूप में जाने जाते हैं। मंसूर अब्बास की पार्टी को इस बार इजराइल की राजनीति में चार सीटों पर जीत मिलती हुई दिखाई दे रही है। मंसूर अब्बास को एक कट्टरपंथी मुस्लिम नेता के तौर पर पहचाना जाता है। हालांकि, मंसूर अब्बास के समर्थन का सीधा और स्वतंत्र असर शायद तुरंत दिखाई न दे, लेकिन अगर अब्बास यूसुफ जबरीन के साथ मिलकर किसी एक विशेष राजनीतिक तरफ अपना समर्थन देते हैं, तो इसका इजराइल की सरकार गठन पर बहुत बड़ा और निर्णायक असर पड़ सकता है।
इस आंतरिक राजनीतिक संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी हलचलें तेज हो गई हैं। प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय व्हाइट हाउस पर्दे के पीछे एक तीसरा राजनीतिक समीकरण बनाने की पुरजोर कोशिश में जुटा हुआ है। व्हाइट हाउस की मुख्य कोशिश यह है कि किसी तरह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच एक संयुक्त गठबंधन कराया जाए। अमेरिका का यह शक्तिशाली प्रशासनिक केंद्र चाहता है कि दोनों ही प्रमुख नेता आपसी मतभेदों को भुलाकर एक साथ मिलकर देश की बागडोर संभालें, ताकि हालिया ईरान के साथ चल रहे कड़े विवाद और तनाव के समय इजराइल का पलड़ा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी बना रहे और देश किसी भी प्रकार की रणनीतिक कमजोरी का सामना न करे।
एक तरफ जहां व्हाइट हाउस इस प्रकार के तमाम राजनीतिक समीकरणों को साधने में अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है, वहीं दूसरी तरफ आइजनकोट की नजर भी हर हाल में अपना खुद का गठबंधन बनाकर देश में शासन करने पर टिकी हुई है। इस बीच, चुनाव के एग्जिट पोल के शुरुआती नतीजे सामने आने के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और खुद को इस पूरी प्रक्रिया की जीत का मुख्य श्रेय दिया है और पत्रकारों के साथ बातचीत करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मैं वहां जीत रहा हूँ, जो उनके इजराइली मामलों में लगातार दखਲ और राजनीतिक प्रभाव को दर्शाने के लिए काफी है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि यूसुफ जबरीन और मंसूर अब्बास जैसे दो मुस्लिम नेता आने वाले दिनों में इजराइल की राजनीति की दिशा तय करते हैं और क्या बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने में सफल हो पाते हैं या नहीं।
