सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिका को दिए दो बड़े झटके, आर्थिक और सैन्य मोर्चे पर बढ़ी मुश्किलें

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिकी ट्रेजरी से 15 अरब डॉलर निकालकर और ईरान पर हमले का विरोध कर अमेरिका को बड़ा आर्थिक और कूटनीतिक झटका दिया है।

मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है जहां अमेरिका के दो सबसे भरोसेमंद सहयोगी माने जाने वाले देशों, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने वाशिंगटन के खिलाफ कड़े फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। पिछले 24 घंटों के भीतर इन दोनों देशों ने अमेरिका को दो बड़े झटके दिए हैं। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई है जब अमेरिका पहले से ही ईरान के साथ युद्ध जैसी परिस्थितियों में उलझा हुआ है। इन फैसलों ने न केवल अमेरिका की आर्थिक स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं बल्कि क्षेत्र में उसकी सैन्य रणनीति को भी प्रभावित किया है।

आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चोट: 15 अरब डॉलर की निकासी

सऊदी अरब और यूएई द्वारा दिया गया पहला झटका पूरी तरह से आर्थिक है। इन दोनों देशों ने अमेरिकी ट्रेजरी से अपनी जमा पूंजी को बड़े पैमाने पर निकालना शुरू कर दिया है। बुधवार को साझा की गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, दोनों देशों ने मिलकर अमेरिकी कोष से 15 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि निकाल ली है। इस कदम का सीधा असर अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ने की संभावना है क्योंकि अमेरिका अपनी विकास योजनाओं और आर्थिक मजबूती के लिए इन निवेशों पर निर्भर रहता है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो सऊदी अरब ने मार्च के महीने में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी को 10 अरब 80 करोड़ डॉलर कम कर दिया है। इसका मतलब है कि सऊदी अरब ने यह पैसा अमेरिकी सिस्टम से बाहर निकाल लिया है। इस निकासी के बाद अब अमेरिकी ट्रेजरी में सऊदी अरब का हिस्सा 149 अरब 60 करोड़ डॉलर रह गया है। इसी तरह, संयुक्त अरब अमीरात ने भी अपनी जमा पूंजी से 5 अरब 80 करोड़ डॉलर निकाल लिए हैं। अब अमेरिकी कोष में यूएई की कुल जमा पूंजी 114 अरब 10 करोड़ डॉलर बची है। यह महत्वपूर्ण जानकारी मंगलवार को सार्वजनिक हुई है जिससे अमेरिकी बाजार में हलचल तेज हो गई है।

अमेरिका के लिए क्यों है यह चिंता का विषय?

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका ट्रेजरी बॉन्ड के माध्यम से दुनिया भर के देशों से धन जुटाता है और इस धन का उपयोग अमेरिका अपने देश में विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए करता है। यही कारण है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर मजबूत बनी रहती है। हालांकि, सऊदी अरब और यूएई द्वारा जिस तरह से पैसा निकालने की प्रक्रिया शुरू की गई है, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका को कर्ज देने वाले अन्य देशों का भरोसा कम हो सकता है।

डॉलर की मजबूती के लिए भी यह एक बड़ा नकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यदि बड़े निवेशक अपना पैसा निकालते हैं, तो इससे डॉलर की साख पर असर पड़ता है। इसके अलावा, इस कदम से अमेरिका के लिए भविष्य में कर्ज लेना महंगा हो सकता है और वहां ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ सकती है और अमेरिकी नागरिक पहले से ही युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं, ऐसे में ब्याज दरों का बढ़ना उनकी मुश्किलों को और बढ़ा सकता है।

सैन्य मोर्चे पर झटका: ईरान पर हमले का विरोध

दूसरा बड़ा झटका ईरान के साथ चल रहे तनाव के बीच आया है और एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब और यूएई ने ईरान पर किसी भी तरह के अमेरिकी हमले का खुलकर विरोध किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संबंध में एक बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि वह ईरान पर हमला करने के फैसले से महज एक घंटा दूर थे। यानी हमले की पूरी तैयारी हो चुकी थी, लेकिन अंतिम समय में उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा और इस बदलाव का मुख्य कारण सऊदी अरब और यूएई द्वारा जताया गया कड़ा विरोध था।

डोनाल्ड ट्रंप मंगलवार 18 मई को ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने का मन बना चुके थे। लेकिन जब इस योजना को लेकर सऊदी अरब और यूएई से राय मांगी गई, तो दोनों देशों ने अमेरिका का साथ देने से साफ इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि इस युद्ध से उन्हें और पूरे क्षेत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। सऊदी और यूएई ने विशेष रूप से अपने तेल ठिकानों की सुरक्षा का हवाला दिया। उन्हें डर था कि ईरान के साथ युद्ध शुरू होने पर उनके तेल उत्पादन केंद्रों को निशाना बनाया जा सकता है, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। सहयोगियों के इस रुख को देखते हुए ट्रंप को पीछे हटना पड़ा।

बदलते कूटनीतिक समीकरण

सऊदी अरब और यूएई को हमेशा से मध्य पूर्व में अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी माना जाता रहा है। लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब ये देश अपने हितों को सर्वोपरि रख रहे हैं। ईरान के साथ युद्ध में शामिल न होने का फैसला और अमेरिकी ट्रेजरी से अरबों डॉलर की निकासी यह दर्शाती है कि अब ये देश अमेरिका की हर नीति का आंख मूंदकर समर्थन करने के मूड में नहीं हैं। यह अमेरिका के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है, क्योंकि उसे अब क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए नए सिरे से सोचना होगा।