क्या भारत पर लगेगा 100 प्रतिशत टैरिफ? सर्जियो गोर ने कहा 10 दिनों में फैसला लेंगे ट्रंप

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने संकेत दिया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले 10 दिनों में भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने पर फैसला ले सकते हैं। यह कदम रूस के साथ भारत के ऊर्जा व्यापार और यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस की कमाई रोकने की अमेरिकी रणनीति से जुड़ा है।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने एक ऐसा बयान दिया है जिससे भारतीय निर्यातकों और सरकार की चिंताएं बढ़ सकती हैं। दिल्ली में गुरुवार को आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में बोलते हुए सर्जियो गोर ने संकेत दिया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले करीब 10 दिनों के भीतर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के संबंध में कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। इस बयान के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में हलचल तेज हो गई है क्योंकि यह फैसला भारत के कई प्रमुख उद्योगों की कमर तोड़ सकता है।

व्हाइट हाउस से 10 दिनों में आ सकता है बड़ा फैसला

सर्जियो गोर ने फोरम में स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच इस विषय पर लगातार और गहन चर्चा चल रही है। उनके अनुसार अभी तक किसी भी देश पर अंतिम रूप से प्रतिबंध लगाने का फैसला नहीं लिया गया है लेकिन व्हाइट हाउस की ओर से अगले 10 दिनों में इस पर स्थिति साफ हो सकती है। गोर ने यह भी बताया कि अमेरिकी प्रतिबंधों की रूपरेखा किसी एक देश को निशाना बनाने के लिए नहीं तैयार की गई है। इसके बजाय इन्हें तीन अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है और यह महज एक संयोग है कि भारत कई अन्य देशों के साथ मिलकर इनमें से एक श्रेणी में शामिल है। इन प्रतिबंधों का मुख्य उद्देश्य किसी देश को सजा देना नहीं बल्कि युद्ध को समाप्त करना और युद्ध लड़ रहे देशों को मिल रही आर्थिक मदद को धीरे-धीरे कम करना है।

रूस से तेल खरीद और अमेरिकी दबाव की पूरी कहानी

इस पूरे विवाद की जड़ में रूस और यूक्रेन का युद्ध है। अमेरिका चाहता है कि रूस की आर्थिक शक्ति को कमजोर किया जाए ताकि वह यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी न रख सके। रूस की आय का सबसे बड़ा स्रोत कच्चा तेल और गैस है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों से तेल खरीदता है और रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद रहा है। भारत का तर्क हमेशा से स्पष्ट रहा है कि उसे अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी है और वह वहीं से तेल खरीदेगा जहां उसे बेहतर कीमत मिलेगी। दूसरी ओर अमेरिका का मानना है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाया जाना चाहिए ताकि रूस की कमाई कम हो सके। इसी खींचतान के बीच अमेरिका में एक ऐसा कानून लाने की चर्चा है जिसके तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सके और भारत इसी के निशाने पर आ सकता है।

भारत के लिए अमेरिकी बाजार की अहमियत और व्यापारिक आंकड़े

अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय यानी यूएसटीआर के आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2025 में अमेरिका ने भारत से करीब 103 अरब 80 करोड़ डॉलर का सामान खरीदा था। दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार लगभग 239 अरब 60 करोड़ डॉलर के स्तर पर था। इतने बड़े व्यापारिक आंकड़े यह बताते हैं कि अगर अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगता है तो भारतीय उत्पादों की कीमत वहां दोगुनी हो जाएगी। इससे कपड़े, जूते, चमड़े का सामान, कालीन, हीरे-जवाहरात और समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। भारत में इन उद्योगों से लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है और निर्यात घटने का सीधा मतलब होगा उत्पादन में कमी और नौकरियों पर संकट।

आम आदमी और कर्मचारियों पर क्या होगा असर

ट्रंप के इस संभावित फैसले का असर केवल बड़े उद्योगपतियों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह आम आदमी की जेब तक पहुंचेगा। उदाहरण के तौर पर यदि भारत में बनी एक शर्ट अमेरिका में 100 डॉलर की बिकती है और उस पर 100 प्रतिशत टैरिफ लग जाता है तो टैक्स ही 100 डॉलर हो जाएगा। इस तरह शर्ट की कुल कीमत 200 डॉलर हो जाएगी। ऐसी स्थिति में अमेरिकी ग्राहक भारतीय शर्ट के बजाय किसी दूसरे देश का सस्ता विकल्प चुनेगा। जब ऑर्डर कम होंगे तो भारतीय फैक्ट्रियों में काम कम होगा जिससे कर्मचारियों की छंटनी की नौबत आ सकती है। इसके अलावा यदि व्यापारिक तनाव के कारण विदेशी निवेशक भारत से अपना पैसा निकालते हैं तो भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ेगा। रुपया कमजोर होने से भारत द्वारा आयात किया जाने वाला कच्चा तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगा हो सकता है जिससे देश में महंगाई बढ़ सकती है।

साल 2025 का इतिहास और पिछले टैरिफ का प्रभाव

अगर अमेरिका भारत पर टैरिफ बढ़ाता है तो यह कोई नई बात नहीं होगी। साल 2025 में भी अमेरिका ने भारतीय सामान पर पहले 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। इसके बाद रूस से तेल खरीदने के मुद्दे को लेकर 25 प्रतिशत और अतिरिक्त टैरिफ जोड़ दिया गया था जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2025 में अमेरिका को होने वाला भारतीय निर्यात सालाना आधार पर करीब 11 दशमलव 9 प्रतिशत घटकर 5 अरब 46 करोड़ डॉलर रह गया था। अगस्त 2025 में समुद्री उत्पादों के निर्यात में करीब 33 प्रतिशत और कीमती पत्थरों के निर्यात में करीब 54 प्रतिशत की भारी गिरावट देखी गई थी। यह आंकड़े गवाह हैं कि जब भी अमेरिका टैरिफ बढ़ाता है तो भारतीय कारोबारियों के लिए रास्ता बहुत मुश्किल हो जाता है।

ट्रंप की रणनीति और बातचीत का दबाव

डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ को केवल एक टैक्स के रूप में नहीं देखते बल्कि वह इसे बातचीत की मेज पर दबाव बनाने के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। वह चाहते हैं कि दुनिया के अन्य देश अमेरिकी शर्तों पर व्यापार करें और रूस के खिलाफ अमेरिकी रणनीति में उनका साथ दें। हालांकि इस खेल में जोखिम दोनों तरफ है। अगर भारतीय सामान महंगा होता है तो अमेरिकी कंपनियों और वहां के ग्राहकों को भी ज्यादा कीमत चुकानी होगी। टैरिफ का पैसा अंततः अमेरिका में सामान आयात करने वाला कारोबारी ही अपनी सरकार को देता है। इसलिए ट्रंप के लिए भी यह फैसला लेना इतना आसान नहीं है क्योंकि इससे अमेरिका में भी महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

भविष्य की राह और तीन संभावित रास्ते

आने वाले 10 दिनों में तीन मुख्य संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। पहली यह कि ट्रंप वास्तव में 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का कड़ा फैसला ले लें जिससे भारतीय निर्यातकों पर भारी दबाव आएगा। दूसरी संभावना यह है कि भारत को इन प्रतिबंधों से कोई विशेष छूट मिल जाए या टैरिफ का दायरा बहुत सीमित रखा जाए। तीसरी और सबसे सकारात्मक संभावना यह है कि दोनों देश बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकाल लें और किसी नए व्यापार समझौते पर पहुंचें। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों की गहराई को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि कूटनीतिक स्तर पर कोई समाधान निकाला जाएगा। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें व्हाइट हाउस के अगले कदम पर टिकी हैं क्योंकि सरकारों की इस लड़ाई की कीमत अक्सर आम आदमी को चुकानी पड़ती है।