ट्रंप की ईरान को दोटूक: समझौता हो या न हो, अमेरिका जीत चुका है

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ समझौता हो या न हो, अमेरिका सैन्य रूप से जीत चुका है। साथ ही उन्होंने चीन को ईरान को हथियार न देने की चेतावनी दी है।

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही उच्च स्तरीय शांति वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि ईरान के साथ किसी समझौते पर पहुंचना या न पहुंचना अब अमेरिका के लिए अधिक महत्व नहीं रखता है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका पहले ही सैन्य रूप से ईरान पर बढ़त बना चुका है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच दो सप्ताह के नाजुक युद्धविराम के बाद पहली बार आमने-सामने की बातचीत हो रही है और राष्ट्रपति ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों और चीन की भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की।

सैन्य जीत और समझौते पर ट्रंप का रुख

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस्लामाबाद में चल रही बैठकों के संदर्भ में कहा कि प्रतिनिधिमंडल कई घंटों से चर्चा कर रहे हैं, लेकिन परिणाम चाहे जो भी हो, अमेरिका की जीत सुनिश्चित है। ट्रंप के अनुसार, ईरान समझौता करे या न करे, इससे अमेरिका के रणनीतिक रुख पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से पछाड़ दिया है और वर्तमान में होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी सेना पूरी तरह सक्रिय है। ट्रंप ने यह भी उल्लेख किया कि ईरान की सैन्य क्षमताएं, जिनमें उसकी नौसेना, रडार प्रणाली और वायु सेना शामिल हैं, अब उस स्थिति में नहीं हैं कि वे अमेरिका को चुनौती दे सकें। उन्होंने कहा कि ईरान के नेतृत्व ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे अमेरिका एक मजबूत स्थिति में आ गया है।

चीन को हथियारों की आपूर्ति पर सख्त चेतावनी

ईरान के साथ चल रहे तनाव के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन को भी कड़ा संदेश दिया है। उन खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए जिनमें चीन द्वारा ईरान को हथियार भेजने की संभावना जताई गई थी, ट्रंप ने कहा कि अगर चीन ऐसा कदम उठाता है, तो उसे गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह ईरान की सैन्य शक्ति को फिर से संगठित करने के किसी भी विदेशी प्रयास पर कड़ी नजर रख रहा है। यह चेतावनी वैश्विक कूटनीति में एक नया मोड़ ला सकती है, क्योंकि चीन पहले से ही मध्य पूर्व में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी नौसेना का अभियान

रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी नौसेना ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। अमेरिकी सेना के अनुसार, दो विध्वंसक पोत इस जलमार्ग से गुजरे हैं, जो युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार हुआ है। इन जहाजों का मुख्य उद्देश्य बारूदी सुरंगों को साफ करना और एक सुरक्षित समुद्री मार्ग स्थापित करना है। अमेरिकी केंद्रीय कमान के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने पुष्टि की कि एक नया मार्ग स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है जिसे जल्द ही वैश्विक समुद्री उद्योग के लिए खोल दिया जाएगा। इस अभियान में आने वाले दिनों में पानी के भीतर काम करने वाले ड्रोन और अतिरिक्त सैन्य बल भी शामिल होंगे। हालांकि, ईरानी सरकारी मीडिया ने इन दावों पर संशय व्यक्त किया है।

इस्लामाबाद वार्ता और कूटनीतिक गतिरोध

इस्लामाबाद में हो रही इस वार्ता का नेतृत्व अमेरिकी पक्ष से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी पक्ष से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ कर रहे हैं। जेडी वेंस ने ईरान को चेतावनी दी है कि वह कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका को गुमराह करने की कोशिश न करे। वहीं, गालिबफ, जो रिवोल्यूशनरी गार्ड के पूर्व कमांडर रह चुके हैं, ईरान की मांगों पर अड़े हुए हैं। ईरान ने वार्ता के लिए कुछ पूर्व शर्तें रखी थीं, जिनमें दक्षिणी लेबनान पर इजराइली हमलों में कमी और जब्त की गई ईरानी संपत्तियों को जारी करना शामिल है। इसके अलावा, ईरान ने 28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए मुआवजे की भी मांग की है।

युद्ध का मानवीय और आर्थिक प्रभाव

इस संघर्ष ने मध्य पूर्व में व्यापक तबाही मचाई है और आंकड़ों के अनुसार, इस युद्ध में अब तक ईरान में कम से कम 3000, लेबनान में 2020, इजराइल में 23 और खाड़ी देशों में एक दर्जन से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ा है, क्योंकि दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऊर्जा की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे वैश्विक बाजार में अस्थिरता पैदा हो गई है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चीन, मिस्र, सऊदी अरब और कतर के अधिकारी भी अप्रत्यक्ष रूप से इस वार्ता को सफल बनाने के लिए इस्लामाबाद में मौजूद हैं।

प्रस्तावों का टकराव और भविष्य की राह