सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाकर उत्तर प्रदेश बीजेपी को एक बड़ी राजनीतिक संजीवनी दे दी है। हालांकि यूजीसी का मुद्दा सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़ा है, लेकिन इसके सामाजिक और चुनावी निहितार्थ इतने गहरे थे कि इसका सीधा असर 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों पर पड़ना तय था। कोर्ट के इस हस्तक्षेप ने सरकार को एक ऐसा अवसर दिया है, जिससे वह समाज के विभिन्न वर्गों के बीच पैदा हो रही दरार को भर सके।
चुनावी गणित और यूजीसी विवाद का गहरा नाता
यूजीसी के नए नियमों में दो मुख्य बिंदुओं पर भारी विरोध हो रहा था। पहला मुद्दा यह था कि जातिगत भेदभाव की जांच करने वाली समिति में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर स्पष्टता का अभाव था। दूसरा, इन नियमों के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए किसी ठोस कार्रवाई का प्रावधान नहीं किया गया था। इन कमियों की वजह से देश भर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे और उत्तर प्रदेश में, जहां राजनीति जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है, वहां बीजेपी के भीतर भी बेचैनी साफ देखी जा रही थी। पार्टी के कुछ नेताओं के इस्तीफे और विरोध के सुरों ने आलाकमान की चिंता बढ़ा दी थी।
सवर्ण बनाम दलित-ओबीसी का संकट
यूपी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अगर वह इन नियमों को वापस लेती, तो दलित और ओबीसी वोट बैंक के खिसकने का खतरा था। वहीं, अगर नियमों को लागू रहने दिया जाता, तो सवर्ण समाज की नाराजगी झेलनी पड़ती। बीजेपी के लिए यह 'आगे कुआं पीछे खाई' वाली स्थिति थी। 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के वोट शेयर में आई 8 और 50 प्रतिशत की गिरावट ने पहले ही पार्टी को सतर्क कर दिया था। अखिलेश यादव के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने बीजेपी के विजय रथ को रोका था, ऐसे में यूजीसी विवाद आग में घी डालने का काम कर रहा था।
ब्राह्मण वोट बैंक और धारणा की लड़ाई
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी भले ही करीब 12 प्रतिशत हो, लेकिन वे राज्य की राजनीति में 'माहौल बनाने' का काम करते हैं और हाल के दिनों में ब्राह्मणों की नाराजगी की खबरें लगातार आ रही थीं। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा और लखनऊ में ब्राह्मण विधायकों की बैठकें इस बात का संकेत थीं कि सवर्ण समाज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा था। उन्हें लग रहा था कि सरकार की पूरी राजनीति केवल दलितों और पिछड़ों के इर्द-गिर्द सिमट गई है। सुप्रीम कोर्ट की रोक ने इस धारणा को बदलने का समय दे दिया है।
2027 की राह और 'बंटेंगे तो कटेंगे' का नारा
बीजेपी 2027 के चुनावों के लिए 'बंटेंगे तो कटेंगे' के नारे के साथ हिंदुत्व को एकजुट करने की कोशिश कर रही है और यूजीसी के नए नियमों ने समाज को फिर से अगड़े और पिछड़े में बांटना शुरू कर दिया था, जो बीजेपी की रणनीति के लिए घातक था। अब कोर्ट की रोक के बाद, सरकार के पास इन नियमों में संशोधन करने और इनकी भाषा को अधिक स्पष्ट और समावेशी बनाने का मौका है। इससे जातिगत भेदभाव भी रुकेगा और नियमों के दुरुपयोग की गुंजाइश भी खत्म होगी, जिससे सभी वर्गों को साधा जा सकेगा।
