UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई, सवर्णों के साथ भेदभाव का आरोप

सुप्रीम कोर्ट आज यूजीसी रेगुलेशन 2026 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और उन्हें सुरक्षा के दायरे से बाहर रखते हैं।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए नए नियमों को लेकर विवाद गहरा गया है और सुप्रीम कोर्ट आज यानी गुरुवार को 'UGC रेगुलेशन 2026' के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए तैयार है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर विचार करेगी। वकील विनीत जिंदल द्वारा दायर इस याचिका में दावा किया गया है कि नए नियम न केवल भेदभावपूर्ण हैं, बल्कि वे समाज के एक बड़े वर्ग को संस्थागत संरक्षण से वंचित करते हैं।

क्या है पूरा विवाद और याचिका की मांग?

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि यूजीसी के नए नियमों में 'जाति-आधारित भेदभाव' की जो परिभाषा दी गई है, वह समावेशी नहीं है। याचिका में कहा गया है कि रेगुलेशन 3(c) के तहत बनाई गई व्यवस्था केवल कुछ विशेष श्रेणियों (SC, ST और OBC) को ही सुरक्षा प्रदान करती है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सामान्य वर्ग के छात्रों को इस सुरक्षा चक्र से पूरी तरह बाहर रखा गया है, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है। याचिका में मांग की गई है कि जब तक इस मामले की पूरी समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक इन नियमों के कार्यान्वयन पर रोक लगाई जाए।

सीजेआई की महत्वपूर्ण टिप्पणी

मामले की मेंशनिंग के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि इन नियमों से सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव और बढ़ सकता है। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा, 'हमें पता है कि क्या हो रहा है। सुनिश्चित करें कि खामियां दूर कर दी जाएं। ' अदालत ने मामले की गंभीरता को समझते हुए इसे जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया और याचिका में यह भी कहा गया है कि नए नियमों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कोई 'शिकायत निवारण प्रणाली' (Grievance Redressal System) नहीं बनाई गई है, जो कि न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

'नेचुरल ऑफेंडर' की धारणा पर आपत्ति

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि यूजीसी के नए एक्ट में भेदभाव की परिभाषा इस। तरह से गढ़ी गई है जैसे कि जातिगत भेदभाव केवल आरक्षित श्रेणियों के साथ ही होता है। उनका कहना है कि इस एक्ट के माध्यम से सामान्य वर्ग यानी सवर्णों को एक तरह से 'नेचुरल ऑफेंडर' (स्वाभाविक अपराधी) मान लिया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि समानता का अधिकार हर। नागरिक के लिए है, चाहे वह किसी भी जाति का हो। यदि किसी संस्थान में सामान्य वर्ग के छात्र के साथ भेदभाव होता है, तो उसके पास शिकायत करने का कोई वैधानिक मंच नहीं होगा, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

क्या हैं यूजीसी के नए नियम 2026?

भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों के आधार पर यूजीसी एक्ट में बदलाव किए थे और 13 जनवरी 2026 को नए नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों का प्राथमिक उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना और जातिगत भेदभाव की शिकायतों की जांच करना है। इसके तहत हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक 'समता समिति' (Equity Committee) बनाना अनिवार्य किया गया है और हालांकि, विरोध इस बात का है कि यह समिति और इसके नियम केवल आरक्षित वर्ग के हितों की रक्षा तक सीमित क्यों हैं।

छात्रों और विशेषज्ञों की राय

इस मामले ने शैक्षणिक जगत में एक नई बहस छेड़ दी है और सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि वे भी कई बार संस्थानों में मानसिक प्रताड़ना और भेदभाव का शिकार होते हैं, लेकिन नए नियमों में उनके लिए कोई जगह नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियम केवल एक तरफा होंगे, तो इससे संस्थानों के भीतर सामाजिक सद्भाव बिगड़ने का खतरा है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि क्या अदालत इन नियमों में। संशोधन का आदेश देती है या फिर इन्हें यथावत रखने का फैसला करती है।

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