भारतीय आईटी कंपनियों पर अमेरिकी कार्रवाई का असर कम, ग्रीन कार्ड आवेदनों में भारी गिरावट

अमेरिका ने टीसीएस और इन्फोसिस सहित 8 प्रमुख आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड आवेदन प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। हालांकि, आंकड़ों से पता चलता है कि इन कंपनियों के आवेदनों में पहले ही बड़ी गिरावट आ चुकी है, जिससे इस कार्रवाई का असर सीमित रहने की संभावना है।

भारतीय आईटी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में अमेरिका ने गुरुवार को टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल टेक सहित 8 प्रमुख आईटी कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड आवेदन करने वाले प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। अमेरिकी प्रशासन का यह कदम उन आरोपों के बाद आया है जिनमें कहा गया है कि इस प्रोग्राम के कारण अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। इस कार्रवाई की जद में आने वाली अन्य कंपनियों में कैपजेमिनी, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी शामिल हैं और ये सभी कंपनियां बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवरों को रोजगार देती हैं। हालांकि, शुरुआती विश्लेषणों से संकेत मिल रहे हैं कि इस अमेरिकी कार्रवाई का भारतीय आईटी कंपनियों के कामकाज पर कोई बहुत बड़ा या खास प्रभाव पड़ता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

ग्रीन कार्ड आवेदनों में देखी गई भारी कमी

अमेरिकी प्रशासन की इस कार्रवाई का असर कम होने का मुख्य कारण यह है कि भारतीय आईटी कंपनियों ने इस साल ग्रीन कार्ड के लिए पहले ही बहुत कम आवेदन किए हैं। स्थायी श्रम प्रमाणन (PERM) आवेदनों के विस्तृत विश्लेषण के अनुसार, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने अमेरिकी वित्त वर्ष 2026 में ग्रीन कार्ड के लिए केवल 2 आवेदन किए हैं। यदि इसकी तुलना पिछले वर्षों से की जाए, तो कंपनी ने वित्त वर्ष 2025 में 513 आवेदन और वित्त वर्ष 2024 में 1804 आवेदन किए थे। आवेदनों की संख्या में आई यह भारी गिरावट दर्शाती है कि कंपनियां पहले से ही इस प्रक्रिया पर अपनी निर्भरता कम कर रही थीं।

विभिन्न कंपनियों के आंकड़ों का विवरण

अन्य प्रमुख आईटी कंपनियों के आंकड़ों में भी इसी तरह की गिरावट देखी गई है और एचसीएल टेक ने वित्त वर्ष 2026 के लिए केवल 59 आवेदन किए हैं, जबकि वित्त वर्ष 2025 में यह संख्या 323 थी। विप्रो के मामले में, कंपनी ने वर्ष 2024 में 257 आवेदन और वर्ष 2025 में 523 आवेदन किए थे। विशेष रूप से, वर्ष 2024 में विप्रो द्वारा किए गए 257 आवेदनों में से 169 आवेदन खारिज कर दिए गए थे, जबकि कंपनी ने स्वयं 88 आवेदन वापस ले लिए थे। इन्फोसिस ने वर्ष 2024 में PERM के तहत 87 आवेदन किए थे, हालांकि वर्ष 2025 और 2026 के लिए कंपनी के आवेदन संबंधी आंकड़े फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं।

बाजार हिस्सेदारी और विशेषज्ञों की राय

एचसीएल टेक के पूर्व सीईओ विनीत नायर ने इस स्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पिछले साल कुल 117849 PERM सर्टिफिकेट जारी किए गए थे, जिनमें भारतीय आईटी कंपनियों की हिस्सेदारी 1400 से भी कम थी। यह कुल जारी किए गए सर्टिफिकेट का 2 प्रतिशत से भी कम हिस्सा है। नायर के अनुसार, इस कम हिस्सेदारी के कारण अमेरिकी कार्रवाई का प्रत्यक्ष प्रभाव शुरुआती अनुमानों की तुलना में काफी कम हो सकता है। विदेशी मूल की कंपनियों जैसे कैपजेमिनी ने वर्ष 2026 में 98 आवेदन किए, जबकि 2025 में 361 और 2024 में 300 आवेदन किए थे। कॉग्निजेंट ने वर्ष 2024 में 1236 आवेदन किए थे, लेकिन उसके बाद के वर्षों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

क्या है PERM और इसका महत्व

अमेरिका के श्रम विभाग द्वारा जारी किया जाने वाला स्थायी श्रम प्रमाणन (PERM) एक ऐसी अनुमति है जो किसी कंपनी को विदेशी कर्मचारी को अमेरिका में स्थायी रूप से काम पर रखने का अधिकार देती है। जो पेशेवर वर्तमान में वर्क वीजा पर अमेरिका में कार्यरत हैं, उनके लिए PERM आवेदन ग्रीन कार्ड यानी स्थायी निवास प्राप्त करने की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इस प्रोग्राम से सस्पेंड होने का मतलब है कि ये कंपनियां फिलहाल अपने विदेशी कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास की प्रक्रिया शुरू नहीं कर पाएंगी। हालांकि, भारतीय कंपनियों द्वारा आवेदनों में की गई कटौती और कुल बाजार में उनकी कम हिस्सेदारी को देखते हुए, इस प्रतिबंध का व्यापक आर्थिक प्रभाव पड़ने की आशंका कम है।