अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता: जेनेवा में बैठक, ट्रंप ने दी सैन्य चेतावनी

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम पर अगले दौर की वार्ता बृहस्पतिवार को जेनेवा में होगी। ओमान की मध्यस्थता में होने वाली इस बैठक से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ता विफल होने पर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है, जबकि ईरान ने कूटनीतिक समाधान की संभावना जताई है।

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी गतिरोध को समाप्त करने के उद्देश्य से अगले दौर की वार्ता बृहस्पतिवार को जेनेवा में आयोजित की जाएगी। ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने रविवार को इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम की पुष्टि की है। अधिकारियों के अनुसार, यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब मध्य पूर्व में सैन्य तनाव अपने चरम पर है और अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को व्यापक रूप से बढ़ाया है। ओमान ने इससे पहले भी दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ताओं की मेजबानी की थी और पिछले सप्ताह जेनेवा में हुए प्रारंभिक दौर की सुविधा भी प्रदान की थी।

ओमान की मध्यस्थता और वार्ता का आधिकारिक विवरण

ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी कि वे परमाणु सौदे को अंतिम रूप देने की दिशा में हो रही प्रगति से संतुष्ट हैं। ओमान लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। तेहरान के शीर्ष राजनयिकों ने भी संकेत दिया है कि वे जेनेवा में अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ के साथ सीधी या अप्रत्यक्ष चर्चा की उम्मीद कर रहे हैं। इस वार्ता का मुख्य केंद्र ईरान के परमाणु कार्यक्रम की सीमाएं तय करना और उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की समीक्षा करना है और अधिकारियों के अनुसार, जेनेवा में होने वाली यह बैठक पिछले सप्ताह शुरू हुई कूटनीतिक प्रक्रिया का विस्तार है।

राष्ट्रपति ट्रंप की चेतावनी और अमेरिकी प्रशासन की शर्तें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस वार्ता से पहले कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान को चेतावनी जारी की है और ट्रंप ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि यदि कूटनीतिक वार्ता विफल होती है, तो ईरान के परमाणु ठिकानों के खिलाफ सीमित सैन्य हमले संभव हैं। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि ईरान के पास परमाणु हथियार बनाने की क्षमता बिल्कुल नहीं होनी चाहिए और उसे यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं दी जा सकती। ट्रंप प्रशासन वर्तमान में मध्य पूर्व में पिछले कई दशकों की सबसे बड़ी सैन्य उपस्थिति बनाए हुए है, जिसे ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान को एक ऐसे समझौते के लिए मजबूर करना है जो उसके मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को भी नियंत्रित करे।

ईरान का कूटनीतिक रुख और संवर्धन पर संप्रभुता का दावा

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सीबीएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि परमाणु मुद्दे पर कूटनीतिक समाधान की अभी भी अच्छी संभावना बनी हुई है। अराघची ने जोर देकर कहा कि ईरान वर्तमान में एक मसौदा प्रस्ताव पर काम कर रहा है और उसे अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत यूरेनियम संवर्धन का अधिकार है और उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान किसी भी दबाव के आगे आत्मसमर्पण नहीं करेगा। अराघची ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में ईरानी पहचान और संप्रभुता का हवाला देते हुए कहा कि उनका देश झुकने वाला नहीं है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने भी हालिया वार्ताओं को उत्साहजनक बताया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ईरान किसी भी सैन्य परिदृश्य के लिए पूरी तरह तैयार है।

मध्य पूर्व में सुरक्षा परिदृश्य और सैन्य तैनाती

क्षेत्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से, अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु स्थलों पर संभावित हमलों को लेकर अपनी तैयारी तेज कर दी है। जून में हुए कुछ घटनाक्रमों के बाद से ईरान ने दावा किया है कि उसने यूरेनियम संवर्धन की गतिविधियों को सीमित किया है, हालांकि पश्चिमी खुफिया एजेंसियां इन दावों पर संदेह व्यक्त करती रही हैं। अमेरिका ने क्षेत्र में अपने विमान वाहक पोत और उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियां तैनात की हैं और अधिकारियों के अनुसार, यह सैन्य जमावड़ा न केवल ईरान को रोकने के लिए है, बल्कि वार्ता की मेज पर अमेरिका की स्थिति को मजबूत करने के लिए भी है। ईरान ने भी अपनी सीमाओं पर रक्षात्मक प्रणालियों को सक्रिय कर दिया है और अपने सहयोगियों के साथ समन्वय बढ़ा दिया है।

2015 परमाणु समझौते की पृष्ठभूमि और वर्तमान गतिरोध

मौजूदा तनाव की जड़ें 2015 के संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) में निहित हैं, जिससे डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को एकतरफा रूप से बाहर कर लिया था। उस समझौते का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना था, जिसके बदले में उसे आर्थिक प्रतिबंधों से राहत दी जानी थी। ट्रंप के हटने के बाद से ईरान ने समझौते की कई शर्तों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया और यूरेनियम संवर्धन के स्तर को बढ़ा दिया। पिछले कई वर्षों से यह वार्ता गतिरोध का शिकार रही है क्योंकि ईरान ने अपने मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों के साथ संबंधों पर चर्चा करने से इनकार कर दिया है। वर्तमान में जेनेवा में होने वाली वार्ता इन पुराने मुद्दों को सुलझाने का एक और प्रयास मानी जा रही है।