एक बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 107 दिनों की गहन बातचीत और सैन्य तनाव के बाद ईरान के साथ एक शांति समझौते को अंतिम रूप दे दिया है। इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर के साथ ही अमेरिका अब खाड़ी क्षेत्र के लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष से बाहर निकल जाएगा, जिसने महीनों से अमेरिकी विदेश नीति को व्यस्त रखा था। हालांकि, इस समझौते का मतलब यह नहीं है कि वाशिंगटन के लिए युद्ध के बादल पूरी तरह छंट गए हैं। इसके विपरीत, पेंटागन अब नए मोर्चों पर अपनी नजरें गड़ाए हुए है। ऐसी खबरें हैं कि अमेरिका अब तीन प्रमुख देशों: क्यूबा, कोलंबिया और पेरू के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और युद्ध की तैयारी कर रहा है। इन देशों को अमेरिका का कट्टर विरोधी माना जाता है और पेंटागन ने इनके खिलाफ संभावित संघर्ष के लिए विस्तृत योजनाएं तैयार कर ली हैं।
खाड़ी से हटकर अब नए मोर्चों पर ध्यान
ईरान के साथ 107 दिनों तक चले तनाव के खत्म होने के बाद, अमेरिका अब अपने सैन्य संसाधनों और रणनीतिक योजना को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि शांति समझौते ने मध्य पूर्व में एक अस्थायी राहत दी है, लेकिन पेंटागन ने भविष्य की चुनौतियों के लिए पहले ही खाका तैयार कर लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका उन शासनों के खिलाफ सख्त रुख अपना रहा है जिन्हें वह अपने राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा मानता है। अब ध्यान तेल समृद्ध खाड़ी से हटकर पश्चिमी गोलार्ध की ओर स्थानांतरित हो गया है, जहां कम्युनिष्ट और अमेरिका विरोधी विचारधाराएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे वाशिंगटन को अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने के लिए सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी करनी पड़ रही है।
अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का ऐतिहासिक संदर्भ
संभावित संघर्ष की वर्तमान तैयारियां अमेरिका के ऐतिहासिक ट्रैक रिकॉर्ड के अनुरूप हैं और अपनी आजादी के बाद से अब तक, अमेरिका लगभग 400 छोटे और बड़े युद्धों और सैन्य अभियानों में शामिल रहा है। अमेरिका के पूरे इतिहास में केवल 13 वर्ष ऐसे रहे हैं जब वह किसी न किसी सैन्य संघर्ष या युद्ध में शामिल नहीं था। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि अमेरिकी विदेश नीति में सैन्य शक्ति का उपयोग एक निरंतर प्रक्रिया रही है और एक संघर्ष का अंत अक्सर दूसरे संघर्ष की शुरुआत का संकेत होता है।
पहला लक्ष्य: कम्युनिष्ट सरकार वाला क्यूबा
क्यूबा अपनी कम्युनिष्ट सरकार के कारण लंबे समय से अमेरिका के रडार पर है। अमेरिका ने क्यूबा के राष्ट्रपति पर इनाम तक घोषित कर दिया है, जो राजनयिक संबंधों के पूरी तरह टूटने का संकेत है। वर्तमान में, अमेरिका ने क्यूबा के चारों ओर अपने युद्धपोतों की बाड़ेबंदी कर दी है ताकि वहां की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके और 10 जून को अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि पेंटागन क्यूबा से जुड़ी किसी भी संभावित परिस्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इसी महीने की शुरुआत में, अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने क्यूबा को एक फेल्ड स्टेट यानी विफल देश करार दिया था। रुबियो के अनुसार, वर्तमान सरकार क्यूबा की स्थिति में सुधार नहीं कर सकती है, और वहां के कम्युनिष्ट नेता लंबे समय से अमेरिका के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।
दूसरा लक्ष्य: कोलंबिया के साथ बढ़ता तनाव
कोलंबिया भी अमेरिकी प्रशासन के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बनकर उभरा है। हालांकि जनवरी 2026 में कोलंबिया पर सैन्य कार्रवाई की बात पहले कही गई थी और बाद में मामला कुछ शांत हो गया था, लेकिन अब राष्ट्रपति ट्रंप की नजर फिर से इस दक्षिण अमेरिकी देश पर है। कोलंबिया को अमेरिका का धुर विरोधी माना जाता है और अमेरिकी राष्ट्रपति कई मौकों पर कोलंबियाई नेतृत्व के खिलाफ बेहद तल्ख और तीखी टिप्पणियां कर चुके हैं। अमेरिका अपने प्रभाव क्षेत्र में किसी भी विरोधी ताकत को पनपने नहीं देना चाहता, जिसके कारण कोलंबिया के साथ सैन्य टकराव की संभावना बनी हुई है ताकि क्षेत्रीय शक्तियों को अमेरिकी रणनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप रखा जा सके।
तीसरा लक्ष्य: पेरू में बढ़ता कम्युनिष्ट प्रभाव
अमेरिका और पेरू के बीच संबंध जो कभी बेहतर हुआ करते थे, अब तेजी से बिगड़ रहे हैं। वाशिंगटन की मुख्य चिंता पेरू में कम्युनिष्टों का बढ़ता प्रभाव है। हाल ही में पेरू में हुए चुनावों के दौरान, ट्रंप ने वहां की जनता को सीधी चेतावनी दी थी कि वहां कम्युनिष्टों की सरकार नहीं आनी चाहिए। इन चेतावनियों के बावजूद, पेरू में कम्युनिष्ट नेताओं की जीत की संभावनाओं ने अमेरिका को सैन्य विकल्पों पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है ताकि वह अपने क्षेत्रीय हितों की रक्षा कर सके और दक्षिण अमेरिका में कम्युनिष्ट विचारधारा के प्रसार को रोक सके।
वैश्विक विरोधी और युद्ध का खतरा
इन तीन देशों के अलावा, चीन, रूस और उत्तर कोरिया को अमेरिका का धुर विरोधी माना जाता है और इसके साथ ही वेनेजुएला, मेक्सिको और ब्राजील जैसे देशों को भी अमेरिका अपने दुश्मन देशों की सूची में रखता है। क्यूबा, कोलंबिया और पेरू जैसे देशों के साथ संघर्ष की एक बड़ी वजह यह भी है कि इन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं। परमाणु हथियारों की कमी इन देशों को अमेरिकी हमले के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। अमेरिका ने अतीत में भी अपनी आक्रामक नीति का परिचय दिया है, जैसा कि ईरान के मामले में देखा गया था, जहां अमेरिका ने 107 दिनों के बाद हुए शांति समझौते से पहले तेहरान पर बिना किसी पूर्व सूचना के हमला कर दिया था।
