भारतीय निर्यातकों ने अमेरिका के एक नए कानून से पैदा हुई अनिश्चितता पर गहरी चिंता व्यक्त की है। इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल के बड़े खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है। इस कदम को भारत और अमेरिका के बीच अब तक के मजबूत व्यापारिक संबंधों के लिए एक संभावित खतरे के रूप में देखा जा रहा है। यदि भारत रूस से अपनी ऊर्जा खरीद जारी रखता है, तो यह कानून भारतीय सामानों पर भारी शुल्क लगाने की अनुमति देता है। हालांकि, भारतीय निर्यात पर इसके वास्तविक प्रभाव का सटीक आकलन तभी संभव होगा जब अमेरिकी प्रशासन शुल्क की दरों, इसके दायरे में आने वाले उत्पादों और इसे लागू करने की समयसीमा की आधिकारिक घोषणा करेगा।
नए अमेरिकी कानून की बारीकियां
राष्ट्रपति ट्रंप ने 18 सितंबर को रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानून पर हस्ताक्षर किए। इस कानून के माध्यम से रूस और उसके प्रमुख ऊर्जा खरीदारों पर भारी शुल्क लगाया जा सकता है और यह कानून राष्ट्रपति को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की शक्ति देता है जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं, जिनमें चीन और भारत जैसे देश शामिल हैं। यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाएगा। इसके दायरे में वे देश आएंगे जो कानून लागू होने से पहले के 12 महीनों के दौरान कुल मात्रा के आधार पर रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों में शामिल रहे हैं।
निर्यात संगठनों की प्रतिक्रिया और चिंताएं
भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ (फियो) के अध्यक्ष एससी रल्हन ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि हम बहुत चिंतित हैं क्योंकि अगर अमेरिका इतना ऊंचा शुल्क लगाता है, तो अमेरिका को होने वाला हमारा निर्यात पूरी तरह से रुक सकता है। रल्हन के अनुसार, कोई भी आयातक 100 प्रतिशत जैसे ऊंचे शुल्क का बोझ नहीं उठा सकता। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इंजीनियरिंग क्षेत्र के कई निर्यातकों का अमेरिका में बड़ा कारोबार है और अमेरिकी प्रशासन को कोई भी फैसला लेने से पहले इन व्यापारिक हितों पर विचार करना चाहिए।
मुंबई के प्रमुख निर्यातक और टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक शरद सराफ ने भी इसी तरह की चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि शुल्क की दर से ज्यादा अनिश्चितता का माहौल व्यापार को प्रभावित करता है। सराफ का मानना है कि इसका स्पष्ट प्रभाव तभी पता चलेगा जब पूरी जानकारी सामने आएगी। उन्होंने यह भी कहा कि हमें यह देखना होगा कि चीन जैसे हमारे प्रतिस्पर्धी देशों पर कितना शुल्क लगाया जाता है, ताकि हम अपनी बाजार स्थिति का आकलन कर सकें।
व्यापारिक संबंधों पर असर और रणनीतिक दबाव
निर्यातकों का मानना है कि इस कानून से दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में अनिश्चितता बढ़ी है, जिससे भविष्य के लिए फैसले लेना मुश्किल हो रहा है। ऐसी चर्चा है कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप प्रशासन भारत जैसे देशों पर दबाव बनाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल एक रणनीति के रूप में कर सकता है। आयात शुल्क बढ़ने से आयात करने वाले देश में सामान महंगा हो जाता है। इसके अलावा, भारत के प्रतिस्पर्धी देशों जैसे बांग्लादेश, वियतनाम और थाईलैंड पर लगने वाले शुल्क, सामान की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय मानक भी इस व्यापारिक युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
विभिन्न क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव
ट्रेड प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (टीपीसीआई) के चेयरमैन मोहित सिंगला ने कहा कि अमेरिकी कदम भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इसे लागू किया गया, तो कुछ विशिष्ट क्षेत्रों पर इसका बहुत गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे द्विपक्षीय कारोबारी संबंधों में व्यवधान आएगा। अमेरिकी बाजार में सक्रिय एक अन्य निर्यातक ने सुझाव दिया कि अमेरिकी अधिकारियों को वैश्विक अर्थव्यवस्था की परस्पर निर्भरता को समझना चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी नीतिगत निर्णय से व्यापार संतुलन नहीं बिगड़ना चाहिए।
चमड़ा और जूता निर्यात क्षेत्र में फरीदा ग्रुप के चेयरमैन रफीक अहमद ने बताया कि उनकी कंपनी के कुल निर्यात का 65 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जाता है। शुल्क में किसी भी प्रकार की अतिरिक्त बढ़ोतरी इन निर्यात खेपों को सीधे तौर पर प्रभावित करेगी, जो इस क्षेत्र के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है।
जीटीआरआई का विश्लेषण: ऊर्जा सुरक्षा बनाम व्यापार
आर्थिक शोध संस्थान 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई)' ने अपने विश्लेषण में कहा है कि नया अमेरिकी कानून भारत को 100 प्रतिशत तक शुल्क के सीधे जोखिम में डालता है। संस्थान का मानना है कि इसका उपयोग नई दिल्ली पर रूसी तेल की खरीद कम करने के लिए दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। साथ ही, भारत को 6 फरवरी के संयुक्त बयान में प्रस्तावित 18 प्रतिशत शुल्क दर को बहाल करने के बदले एक असमान द्विपक्षीय व्यापार समझौता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने सलाह दी है कि भारत को अस्थायी शुल्क राहत के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करना या रूसी तेल की खरीद बंद करना भी भारत को भविष्य में धारा 301 या अन्य अमेरिकी व्यापार कानूनों के तहत होने वाली कार्रवाई से पूरी तरह नहीं बचा पाएगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि अमेरिका ने यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ समझौते के बावजूद नए शुल्क लगाए हैं। इसलिए, भारत को अपनी ऊर्जा नीति स्वतंत्र रखनी चाहिए।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक वस्तुएं
भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार में कई महत्वपूर्ण वस्तुएं शामिल हैं। भारत से अमेरिका को होने वाले मुख्य निर्यात इस प्रकार हैं:
- दवा उत्पाद और जैविक उत्पाद
- दूरसंचार उपकरण
- बहुमूल्य और अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थर
- पेट्रोलियम उत्पाद
- वाहन और वाहनों के कलपुर्जे
- सोना और अन्य बहुमूल्य धातुओं के आभूषण
- सूती तैयार परिधान
- लौह एवं इस्पात उत्पाद
- कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद
- कोयला और कोक
- कटे और तराशे हुए हीरे
- विद्युत मशीनरी
- विमान, अंतरिक्ष यान और उनके कलपुर्जे
- सोना
