कच्चे तेल की कीमतों में 8 प्रतिशत की भारी गिरावट: क्या भारत में सस्ता होगा पेट्रोल और डीजल?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक हफ्ते में 8 प्रतिशत की गिरावट आई है। इजराइल-हिजबुल्लाह सीजफायर और अमेरिका-ईरान डील के बाद वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है, जिससे भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होने की संभावना जताई जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में पिछले एक हफ्ते के दौरान करीब 8 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इस गिरावट से न केवल भारत बल्कि दुनिया के तमाम देशों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है और बाजार के जानकारों का अनुमान है कि अगले एक साल के भीतर कच्चे तेल के दाम 60 डॉलर से 65 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ सकते हैं। इस स्थिति ने भारत में एक नई चर्चा छेड़ दी है कि क्या अब देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी आएगी। इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझना जरूरी है क्योंकि इसके पीछे कई वैश्विक कारण और आर्थिक समीकरण काम कर रहे हैं।

बाजार की वर्तमान स्थिति और कीमतों का गणित

सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मामूली बढ़त देखी गई, लेकिन पूरे हफ्ते का रुझान गिरावट की ओर ही रहा। ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर 57 सेंट प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि अमेरिकी क्रूड (WTI) के दाम 77 डॉलर 54 सेंट प्रति बैरल पर रहे। अगर पिछले एक हफ्ते के आंकड़ों पर नजर डालें तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 8 प्रतिशत की कमी आई है। 12 जून को बाजार बंद होने के समय कच्चे तेल की कीमत 87 डॉलर 33 सेंट प्रति बैरल थी, जिसमें अब तक 6 डॉलर 76 सेंट प्रति बैरल की गिरावट आ चुकी है। वहीं, अमेरिकी तेल के दाम 12 जून को 84 डॉलर 88 सेंट प्रति बैरल थे, जो अब 7 डॉलर 34 सेंट प्रति बैरल कम होकर 77 डॉलर 54 सेंट पर आ गए हैं।

सीजफायर और कूटनीतिक समझौतों का असर

कच्चे तेल की कीमतों में इस बड़ी गिरावट का मुख्य कारण इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच सीजफायर पर बनी सहमति को माना जा रहा है। इसके अलावा, ईरान और अमेरिका के बीच हुई एक महत्वपूर्ण डील ने भी बाजार की धारणा को बदला है। जानकारों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में शांति बनी रहती है और ईरान का तेल पूरी क्षमता के साथ वैश्विक बाजार में लौटता है, तो कीमतों में और भी कमी देखने को मिल सकती है। मरीनट्रैफिक के आंकड़ों के मुताबिक, सीजफायर समझौते के बाद खाड़ी देशों के उत्पादक निर्यात बढ़ाने की तैयारी में हैं और शुक्रवार को कच्चे तेल और एलपीजी से भरे कम से कम चार टैंकर होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते इराकी बंदरगाहों की ओर जाते देखे गए हैं।

अमेरिका-ईरान डील और 85 मिलियन बैरल तेल

ईरान के विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी है कि युद्ध समाप्त करने को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। इस समझौते के बाद स्विट्जरलैंड में होने वाली प्रस्तावित बैठक को भी टाल दिया गया है क्योंकि अब इसकी आवश्यकता नहीं रही। इस डील का सबसे बड़ा असर यह होगा कि मध्य पूर्व की खाड़ी में फंसा हुआ 8 करोड़ 50 लाख बैरल से ज्यादा तेल अब वैश्विक बाजार में आ सकेगा। साथ ही, ईरानी तेल पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के हटने से आपूर्ति में भारी बढ़ोतरी होगी। हालांकि, ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पर कड़े नियंत्रण के संकेत दिए हैं, लेकिन बाजार को उम्मीद है कि आपूर्ति का प्रवाह जल्द ही सामान्य हो जाएगा।

भविष्य का अनुमान और ओपेक की रिपोर्ट

दुनिया भर में तेल और एलएनजी की कुल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। सिटी बैंक के विश्लेषण के अनुसार, अगले 6 से 12 महीनों में तेल बाजार में सरप्लस यानी अतिरिक्त आपूर्ति की स्थिति बन सकती है। इससे 2027 की पहली तिमाही तक कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 60 डॉलर से 65 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकती हैं। कॉमर्जबैंक ने भी साल के अंत तक ब्रेंट क्रूड का अनुमान 85 डॉलर से घटाकर 80 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। दूसरी ओर, ओपेक ने अपनी 2026 वर्ल्ड ऑयल आउटलुक रिपोर्ट में कहा है कि वैश्विक मांग 2025 में 105 करोड़ 10 लाख बैरल प्रति दिन से बढ़कर 2030 तक 113 करोड़ 30 लाख बैरल प्रति दिन हो जाएगी।

क्या भारत में कम होंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उन्हें इस गिरावट का फायदा मिलेगा। जून के महीने में अब तक ब्रेंट क्रूड के दाम में 14 डॉलर 41 सेंट प्रति बैरल की कमी आ चुकी है। गौरतलब है कि मई के महीने में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7 से 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी और आखिरी बार 25 मई को दाम बढ़ाए गए थे। जानकारों का कहना है कि कीमतों में गिरावट के बावजूद पेट्रोलियम कंपनियों के पुराने नुकसान की भरपाई अभी पूरी नहीं हुई है। जब कच्चे तेल के दाम ऊंचे थे, तब इन कंपनियों को रोजाना 1000 से 1500 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था। पेट्रोलियम कंपनियां 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर नो प्रॉफिट नो लॉस की स्थिति में आती हैं। यदि दाम 75 डॉलर प्रति बैरल के नीचे स्थिर रहते हैं, तभी कंपनियों को मुनाफा होगा और वे आम जनता को राहत दे पाएंगी।

महानगरों में पेट्रोल और डीजल की वर्तमान कीमतें

वर्तमान में देश के प्रमुख महानगरों में ईंधन की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई यह 8 प्रतिशत की गिरावट भविष्य में भारतीय बाजार के लिए सुखद संकेत हो सकती है, बशर्ते वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल बनी रहें।