क्या फिर महंगा होगा पेट्रोल डीजल? 100 डॉलर के करीब पहुंचा कच्चा तेल

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई बढ़ने की आशंका है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के बेहद करीब पहुंच गई हैं। मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है, जिसका सीधा असर ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। ताजा हमलों और युद्ध के दायरे के और अधिक विस्तार होने की आशंका ने निवेशकों के बीच डर पैदा कर दिया है और ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि मौजूदा हालात में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकती हैं। इस स्थिति का सबसे गंभीर असर भारत जैसे उन देशों पर पड़ने की संभावना है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल के आयात पर निर्भर हैं।

तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के मुख्य कारण

मध्य पूर्व का क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यहां होने वाला किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष या भू-राजनीतिक तनाव सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करता है। हालिया सैन्य गतिविधियों के बाद बाजार में यह डर बैठ गया है कि यदि युद्ध और अधिक फैलता है या प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों पर इसका असर पड़ता है, तो वैश्विक तेल सप्लाई में बड़ी बाधा आ सकती है। इसी आशंका और डर के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान में बाजार पूरी तरह से डर की भावना से संचालित हो रहा है और निवेशक सुरक्षित विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। यदि यह तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो कीमतों में और भी अधिक तेजी आने की पूरी संभावना है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला संभावित प्रभाव

भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इस भारी निर्भरता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली हर छोटी-बड़ी बढ़ोतरी का सीधा और गहरा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और विमान ईंधन की लागत में वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन खर्च बढ़ जाता है, जिससे फल, सब्जियां और अन्य रोजमर्रा की वस्तुएं भी महंगी हो जाती हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो इससे देश में महंगाई का दबाव काफी बढ़ सकता है। इसके साथ ही, सरकार के आयात बिल में बढ़ोतरी होगी और चालू खाते के घाटे पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

शेयर बाजार और वैश्विक आर्थिक परिदृश्य

कच्चे तेल की कीमतों में आने वाले इस उछाल का असर केवल ईंधन की कीमतों तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसका व्यापक प्रभाव शेयर बाजार और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों पर भी देखने को मिलेगा और विशेष रूप से एयरलाइन कंपनियां, लॉजिस्टिक्स, केमिकल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इस बढ़ोतरी से सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि उनकी परिचालन लागत बढ़ जाएगी। वहीं, ऊर्जा की ऊंची लागत के कारण दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में निवेशकों की पैनी नजर मध्य पूर्व की स्थिति और तेल उत्पादक देशों की प्रतिक्रिया पर टिकी रहेगी। यदि कूटनीतिक प्रयासों से तनाव कम होता है, तो कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है, लेकिन हालात बिगड़ने की स्थिति में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर जाएगा, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर महसूस किया जाएगा।