ईपीएफ स्कीम 2026 के लागू होने के साथ ही भारत में रिटायरमेंट बचत के नियमों में एक बड़ा बदलाव आया है। इस नई योजना के तहत नौकरी छोड़ने के बाद भविष्य निधि यानी पीएफ की निकासी को लेकर नियमों को काफी सख्त और उद्देश्यपूर्ण बनाया गया है। अब कोई भी कर्मचारी नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद अपना पूरा पीएफ फंड नहीं निकाल सकेगा। सरकार का यह कदम कर्मचारियों की भविष्य की बचत को सुरक्षित करने और उन्हें बुढ़ापे में एक मजबूत वित्तीय आधार प्रदान करने की दिशा में उठाया गया है। यह बदलाव कर्मचारियों की फाइनेंशियल प्लानिंग पर गहरा असर डालने वाला है।
75 प्रतिशत और 25 प्रतिशत का नया नियम
नए नियमों के विस्तार में जाएं तो यह स्पष्ट होता है कि यदि कोई कर्मचारी बेरोजगार हो जाता है, तो वह अपने कुल पीएफ बैलेंस का केवल 75 प्रतिशत हिस्सा ही तुरंत निकाल पाएगा। इस 75 प्रतिशत की गणना में कर्मचारी का अपना योगदान, नियोक्ता का योगदान और उस पर अब तक मिला पूरा ब्याज शामिल होता है। इसका मतलब यह है कि पहले की तुलना में निकाली जा सकने वाली राशि कई मामलों में अधिक हो सकती है क्योंकि इसमें सभी घटकों को शामिल किया गया है। हालांकि, शेष 25 प्रतिशत राशि को खाते में ही सुरक्षित रखा जाएगा। इस बची हुई 25 प्रतिशत राशि को निकालने के लिए कर्मचारी को लगातार 12 महीने तक बेरोजगार रहने की शर्त को पूरा करना होगा।
पुरानी ईपीएफ स्कीम 1952 से तुलना
इससे पहले ईपीएफ स्कीम 1952 के तहत नियम काफी अलग थे। पुराने नियमों के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी नौकरी छोड़ने के बाद 2 महीने तक बेरोजगार रहता था, तो वह अपने पीएफ खाते की पूरी 100 प्रतिशत राशि निकाल सकता था। इस लचीलेपन के कारण कई कर्मचारी हर बार नौकरी बदलने पर अपना पूरा पीएफ निकाल लेते थे। इससे उनकी रिटायरमेंट के लिए जमा की जा रही पूंजी बार-बार शून्य हो जाती थी और उन्हें लंबी अवधि में मिलने वाले बड़े फंड का नुकसान होता था। सरकार ने इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए 2026 की नई स्कीम में बदलाव किए हैं।
नियम बदलने के पीछे सरकार का तर्क
सरकार का स्पष्ट मानना है कि पीएफ का मुख्य उद्देश्य नौकरी बदलने के दौरान होने वाले खर्चों को पूरा करना नहीं, बल्कि रिटायरमेंट के बाद के जीवन को सुरक्षित करना है। जब कर्मचारी बार-बार पूरा पैसा निकाल लेते हैं, तो उनके निवेश पर मिलने वाला कंपाउंडिंग यानी चक्रवर्धि ब्याज का लाभ खत्म हो जाता है। कंपाउंडिंग का असली जादू तब दिखता है जब पैसा लंबे समय तक निवेशित रहे। नए नियम के तहत कम से कम 25 प्रतिशत पैसा पीएफ खाते में बना रहेगा, जिससे उस पर ब्याज मिलता रहेगा। यदि कर्मचारी को एक साल के भीतर नई नौकरी मिल जाती है, तो यही 25 प्रतिशत राशि उसके नए योगदान के साथ जुड़कर भविष्य में एक बड़ा फंड बनाने में मदद करेगी।
निकासी की प्रक्रियाओं का सरलीकरण
निकासी की सीमा तय करने के साथ-साथ सरकार ने आंशिक निकासी के नियमों को सरल भी बनाया है और पहले पीएफ से एडवांस निकालने के लिए 13 अलग-अलग तरह की श्रेणियां और नियम थे, जो काफी जटिल थे। अब इन सभी को घटाकर केवल 3 मुख्य श्रेणियों में सीमित कर दिया गया है। इसके अलावा, अधिकांश एडवांस पीएफ निकासी के लिए अब कम से कम 12 महीने की सदस्यता की एक समान शर्त रखी गई है। पहले कुछ विशेष मामलों में 7 साल तक की नौकरी की शर्त अनिवार्य होती थी, जिसे अब आसान कर दिया गया है ताकि जरूरत पड़ने पर कर्मचारी एक साल की नौकरी के बाद भी पैसा निकाल सकें।
विशेषज्ञों की राय और वित्तीय सलाह
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि बेरोजगारी के शुरुआती महीनों में 75 प्रतिशत पीएफ निकालने की सुविधा एक बड़ी राहत है। लेकिन अगर किसी को नई नौकरी मिलने में 12 महीने से अधिक का समय लगता है, तो शेष 25 प्रतिशत राशि का लॉक होना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए, विशेषज्ञों की सलाह है कि हर कर्मचारी को पीएफ के भरोसे रहने के बजाय एक अलग इमरजेंसी फंड भी बनाना चाहिए। इस फंड का उपयोग किराया, राशन, बिजली बिल और अन्य दैनिक खर्चों के लिए किया जाना चाहिए, ताकि पीएफ की राशि केवल अत्यंत आवश्यकता के समय ही निकाली जाए और रिटायरमेंट के लिए बचत सुरक्षित रहे।
