हिंसा की आग में क्यों जल रहा है यूरोप? विद्रोह की आहट या जनता का गुस्सा… इटली से फ्रांस तक प्रदर्शन

यूरोप के कई देश जैसे इटली, फ्रांस और अल्बानिया इन दिनों भयंकर हिंसा, लूटपाट और विरोध प्रदर्शनों की चपेट में हैं। महंगाई, बेरोजगारी और विदेशी नीतियों से नाराज जनता सड़कों पर उतर आई है, जिससे सरकारों की चिंता बढ़ गई है और तख्तापलट की आशंका जताई जा रही है।

यूरोप समेत दुनिया भर के कई देशों में इन दिनों बगावत की जोरदार मांग उठ रही है जिसके कारण अलग-अलग देशों की सरकारें बेहद चिंतित हैं और उन्हें तख्तापलट का डर भी सताने लगा है और कुछ लोगों का तो यह भी मानना ​​है कि इसके पीछे ‘सत्ता परिवर्तन’ की कोई साजिश हो सकती है। कहीं बढ़ती हुई महंगाई, तो कहीं भ्रष्टाचार या बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों ने युवाओं के बीच बेचैनी को काफी ज्यादा बढ़ा दिया है और इटली से लेकर फ्रांस तक और अल्बानिया से लेकर पुर्तगाल तक आम जनता का गुस्सा सड़कों पर पूरी तरह फूट पड़ा है। हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और प्रशासन को वॉटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ रहा है और सवाल यह है कि आखिर ये लोग सड़कों पर क्यों उतरे हैं और इस आग के पीछे की असल वजहें क्या हैं इसे गहराई से समझना बेहद जरूरी है।

इस हिंसा की आग में सबसे पहले फ्रांस जला और अब इटली भी इसकी चपेट में आ चुका है और इटली के प्रमुख शहर मिलान में बड़े और महंगे मॉल्स तथा स्टोर्स में पिछले कई दिनों से खुलेआम लूटपाट जारी है जिसके नए-नए वीडियो लगातार रोज सामने आ रहे हैं। प्रदर्शनकारी दिनदहाड़े खुलेआम लूटपाट कर रहे हैं और पुलिस इस स्थिति में कुछ भी नहीं कर पा रही है। यही बेहद डरावना हाल इटली के नेपल्स शहर का भी बन चुका है जहां अब महंगे स्टोर्स के बाद छोटी-छोटी दुकानों और मंडियों में भी लूटपाट होने लगी है। वहां स्थिति यह है कि जिसके हाथ में जो भी सामान लग रहा है वह उसे लेकर तुरंत भाग रहा है। आम नागरिक और दुकानदार इस हद तक लूटपाट से नाराज और परेशान हो चुके हैं कि अब खुद दुकानदारों ने अपनी दुकानों के बाहर हथियार लेकर खड़े होना शुरू कर दिया है और कई दुकानदारों ने इन उग्र प्रदर्शनकारियों के सामने अपनी गन तान दी है क्योंकि सड़कों पर पूरी तरह से प्रदर्शनकारियों का ही कब्जा हो चुका है।

इटली में इस बड़े पैमाने पर आक्रोश फैलने के पीछे यूक्रेन का समर्थन करने पर लोगों की गहरी नाराजगी भी एक बड़ा कारण है। दरअसल, इटली में ईंधन की कीमत दोगुने से भी ज्यादा हो चुकी है जिससे आम जनता बेहद परेशान और नाराज है। गेला शहर में किसान अपने ट्रैक्टरों को लेकर सड़कों पर उतरकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके अलावा देश में खराब सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ भी लोगों के मन में भारी गुस्सा भरा हुआ है। मौजूदा समय में रूस-यूक्रेन युद्ध में इटली खुलकर यूक्रेन का समर्थन कर रहा है, जबकि देश की दक्षिणपंथी नेशनल फ्यूचर पार्टी रूस के साथ अपने पुराने संबंध बहाल करने की जोरदार वकालत कर रही है। इस पार्टी ने खुलकर यूक्रेन को हथियार और आर्थिक मदद देने की कड़ी आलोचना की है और अपने ही देश की गंभीर समस्याओं को पूरी तरह से नजरअंदाज करके यूक्रेन की मदद करने की नीतियों से आम नागरिकों में भारी नाराजगी और रोष व्याप्त है।

इटली में इस प्रकार की हिंसा और उपद्रव फैला रहे लोगों पर अब देश की सरकार काफी सख्त हो गई है। इन प्रदर्शनों की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक आपातकालीन यानी इमरजेंसी मीटिंग बुलाई। मेलोनी ने देश को बताया कि इस प्रदर्शन में हजारों लोग सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों के जरिए आपस में इकट्ठा हुए थे। इसके बाद उन्होंने कई कड़े फैसले लिए हैं जिसके तहत अब तक लगभग 330 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। खास बात यह है कि हिरासत में लिए गए कुल लोगों में से लगभग आधे लोग विदेशी मूल के हैं। सरकार के नए नियमों के मुताबिक 5 या उससे अधिक लोगों के समूह में दंगा करने वाले उपद्रवियों को बेहद कड़ी सजा दी जाएगी।

सरकार द्वारा तय किए गए इन नए नियमों के तहत दोषियों को पांच वर्ष तक की जेल और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा भुगतनी होगी। इसके अलावा अगर किसी नाबालिग द्वारा कोई नुकसान पहुंचाया जाता है तो उसकी पूरी भरपाई उसके माता-पिता को करनी होगी और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मिलान शहर में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की जाएगी। हालांकि, इसके बाद भी सबसे बड़ा सवाल अब भी यही बना हुआ है कि आखिर हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों में अगर आधे लोग विदेशी मूल के हैं तो वे किसी दूसरे देश में आकर इतने उग्र और हिंसक क्यों हो गए हैं। क्या इसके पीछे वाकई कोई रेजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन की गहरी साजिश काम कर रही है।

दूसरी तरफ फ्रांस की स्थिति भी कम डरावनी नहीं है जहां नकाबपोश प्रदर्शनकारी जमकर लूटपाट और तोड़फोड़ मचा रहे हैं। फ्रांस में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने सिर्फ तोड़फोड़ ही नहीं की बल्कि इन दुकानों को भारी आर्थिक नुकसान भी पहुंचाया है। यहां के आम नागरिक अब यह तीखे सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर उपद्रव और हिंसा करने वाले इन लोगों में असली फ्रांस के नागरिक आखिर कितने हैं। फ्रांस के बड़े और प्रसिद्ध जूलरी शोरूम के शीशे तोड़कर प्रदर्शनकारी सीधे अंदर दाखिल हुए और वहां रखे कीमती गहने तथा अंगूठियां लूटकर ले गए। फ्रांस में इस तरह के प्रदर्शन शुरू हुए इतने दिन बीत जाने के बाद भी हिंसा थमने का नाम बिल्कुल नहीं ले रही है। रेनेस शहर में तो दंगों की वजह से हालात इतने ज्यादा बिगड़ चुके हैं कि पुलिसकर्मियों पर लगातार जानलेवा हमले किए जा रहे हैं। सड़कों पर सरेआम आगजनी की जा रही है और पुलिस के बैरिकेड्स को जलाया जा रहा है।

फ्रांस में यह पूरा आंदोलन असल में एक स्कूल से शुरू हुआ था और देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया। यहां के लोग भी बढ़ती हुई महंगाई और बदहाल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था से बेहद नाराज हैं। लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस पूरे मामले को एक बिल्कुल अलग एंगल दे रहे हैं। उनका यह कहना है कि राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों देश में शरणार्थी समस्या को ठीक ढंग से संभाल नहीं पा रहे हैं। उनका यह भी दावा है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में पेरिस एक दिन पूरी तरह से एक मुस्लिम शहर बन जाएगा। इसके अलावा फ्रांस के महंगे स्टोर्स से जो सामान लूटा गया था, वह अब देश के डुप्लीकेट सामान के बाजारों में धड़ल्ले से पहुंचने लगा है। इसके कई वीडियो भी सामने आ चुके हैं जिनमें लूटी गई ब्रांडेड घड़ियां और अन्य कीमती सामान खुलेआम बिक रहे हैं।

इटली और फ्रांस की तरह ही अल्बानिया भी पिछले कई दिनों से लगातार हिंसा की आग में जल रहा है और अल्बानिया में सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ शिक्षा मंत्रालय और कई अन्य महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों को भी आग के हवाले किया जा चुका है और वहां प्रदर्शन अब भी किसी भी तरह थमने का नाम नहीं ले रहा है। अल्बानिया में लाखों आम नागरिक देश के प्रधानमंत्री एदी रामा के खिलाफ जमकर नारेबाजी कर रहे हैं। इस पूरे आंदोलन की एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कड़ी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर से भी जुड़ी हुई है। दरअसल, देश के साजान द्वीप पर एक बहुत बड़े लक्जरी रिसॉर्ट प्रोजेक्ट का प्लान तैयार किया गया है जिसमें जेरेड कुशनर की कंपनी का बड़ा निवेश बताया जा रहा है।

अल्बानिया में चल रहे इस आंदोलन ने अब ‘फ्लेमिंगो क्रांति’ का एक नया रूप ले लिया है। स्थानीय लोगों और युवाओं का यह साफ तौर पर कहना है कि यह एक पूरी तरह से संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र है जहां दुर्लभ फ्लेमिंगो पक्षी निवास करते हैं। इन्हीं फ्लेमिंगो पक्षियों को इस पूरे आंदोलन का प्रतीक बनाकर इसे फ्लेमिंगो क्रांति का नाम दिया गया है। इस रिसॉर्ट प्रोजेक्ट को केवल एक सामान्य विदेशी निवेश नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसे ट्रंप परिवार की राजनीतिक और आर्थिक पहुंच का सीधा प्रतीक माना जा रहा है। इसी बात को लेकर प्रधानमंत्री एदी रामा से उनके पद से इस्तीफा देने की मांग की जा रही है। हालांकि, प्रधानमंत्री एदी रामा ने फिलहाल अपने पद से इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है।

इन तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनों और हिंसा के बीच विभिन्न देशों के राष्ट्रप्रमुखों के भी तीखे बयान सामने आए हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों का कहना है कि देश में सुरक्षा के मद्देनजर कर्फ्यू के कड़े उपाय किए गए हैं, भीड़ को इकट्ठा होने से रोकने के लिए कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि शनिवार को होने वाले प्रदर्शन की भी बिल्कुल अनुमति नहीं दी जाएगी और प्रशासन द्वारा पूरी सख्ती बरती जाएगी। उन्होंने कहा कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर यह पूरी तरह सुनिश्चित करेंगे कि इस तरह की अप्रिय घटनाएं दोबारा न दोहराई जाएं और इसी वजह से कई प्रमुख शहरों में कर्फ्यू लागू किया गया है।

उधर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने भी इन घटनाओं पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। मेलोनी का यह कहना है कि मंत्रिपरिषद ने इस भयानक हिंसा को रोकने और उसका कड़ाई से मुकाबला करने के लिए नए उपायों के साथ एक कानूनी अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। ये नए उपाय उन तमाम सुरक्षा उपायों में जुड़ गए हैं जिन्हें पिछले कुछ महीनों के दौरान बायोमेट्रिक पहचान से शुरू करके अनुमोदित किया गया था, ताकि उन असामाजिक तत्वों को एक साफ नाम दिया जा सके जो हमेशा अपने चेहरों को नकाब के पीछे छुपाते हैं। उन्होंने आगे यह भी चेतावनी दी कि देश की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदर्शनकारियों को पांच साल तक की जेल और 20 हजार यूरो तक के भारी जुर्माने का गंभीर जोखिम उठाना पड़ेगा। अगर विरोध प्रदर्शन के दौरान किसी उपद्रवी का चेहरा ढका हुआ पाया गया और उसने किसी भी व्यक्ति को घायल किया तो उसकी सजा को और अधिक बढ़ा दिया जाएगा।

दूसरी तरफ अल्बानिया के प्रधानमंत्री एदी रामा ने प्रदर्शनकारियों के सामने बातचीत का प्रस्ताव रखते हुए कहा है कि जो कोई भी बिना किसी शर्त के, जहां भी और जब चाहें बातचीत करना चाहता है, वह मेरी और सरकार दोनों की उपलब्धता पर पूरा भरोसा कर सकता है और उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वे लोग इस बातचीत के लिए स्वागत योग्य नहीं हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा में लिप्त हैं और जो इस तरह की हिंसा से दूरी बनाने से पूरी तरह इनकार करते हैं। यूरोप के इन तमाम देशों में सुलग रही यह आग आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और सुरक्षा पर क्या बड़ा असर डालेगी, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा, लेकिन फिलहाल जनता का यह बेकाबू गुस्सा सरकारों की नींद उड़ाए हुए है।