चंद्रशेखर / World Bank, अमेरिका और UK को औकात बताने वाला पीएम पूंजीवादियों को रास नहीं आया

Zoom News : Jul 08, 2020, 12:58 PM


Political Desk | भारत में एक ऐसा प्रधानमंत्री भी हुआ है, जिसने कहा था कि दुनिया से दौलत क्यों चाहिए, जब हमारे देश में क्षमता है। बीजेपी और पीएम मोदी जब आत्मनिर्भर भारत का नारा बुलंद कर रहे हैं तो हमें चन्द्रशेखर की पुण्यतिथि पर उन्हें शिद्दत से याद करना लाजिमी लगता है क्योंकि देश की क्षमता और संसाधनों के पक्ष में खड़े रहकर वे हमेशा से विदेशी पूंजी और कंपनियों को बेचे जाने के खिलाफ रहे।

कभी किसी सरकार में मंत्री नहीं रहे चन्द्रशेखर सीधे प्रधानमंत्री बने। यह आशंका भी थी कि क्या वे यह जिम्मेदारी बखूबी संभाल भी पाएंगे, लेकिन मात्र कुछ सप्ताहों की सरकार ने वह कर दिखाया, ​जो किसी को उम्मीद से परे लगता है। हमारे नेता अमेरिका और युरोप के प्रभाव में नजर आते हैं, लेकिन उस समय के किस्से हम आपको बता रहे हैं कि चन्द्रशेखर को युवा तुर्क और अडिग निर्णय वाला ऐसे ही नहीं कहा जाता था।

स्मृति शेष / भारत के एक प्रधानमंत्री पाकिस्तान PM के नवाज शरीफ को डांटते थे और इस्लाम भी सिखाते थे

राज्यसभा के उप सभापति और प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश नारायण लिखते हैं चंद्रशेखर सीधे प्रधानमंत्री बने थे। पहले कभी सरकार में नहीं रहे। कई विभागों में आशंका थी। प्रधानमंत्री कैसे संवेदनशील मामलों को 'हैंडिल' करेंगे। विदेश मंत्रालय में भी यह संशय था। चंद्रशेखर की तत्काल निर्णय क्षमता, हाजिरजवाबी, बहुत कम समय में जड़ पकड़ने की बौद्धिक तेजस्विता और टू द प्वाइंट (मुद्देवार) बातचीत से नौकरशाही पूरी तरह वाकिफ नहीं थी। विदेशी संबंधों या राजनय में उनकी बारीक पकड़ हतप्रभ करनेवाली थी।
इंग्लैड से लेबर पार्टी के नेता और उनके चार-पांच सांसद आये। लेबर पार्टी के नेता, यानी ब्रिटेन के भावी प्रधानमंत्री। इसके पहले लेबर पार्टी के दूसरे महत्वपूर्ण नेता (डिप्टी लीडर पार्लियामेंट) काफमैन पाकिस्तान गये थे। वह पाक-अधिकृत कश्मीर भी गये। भारत के खिलाफ जहर उगला। वहां से काफमैन भारत आना चाहते थे। विदेश मंत्रालय उन्हें 'वीसा' देने के पक्ष में था। डर था कि इंग्लैंड की लेबर पार्टी के महत्वपूर्ण नेता को वीसा न देने से भारत को नुकसान होगा। चंद्रशेखर सरकार ने तय किया, 'वीसा' नहीं देना है। उसी समय यह डेलीगेशन आया था। विदेश मंत्रालय परेशान था कि प्रधानमंत्री से बातचीत में प्रश्न उठेगा, तो भारत का क्या जवाब होगा?

एक झटके में मौन हो गया ब्रिटेन का डेलिगेशन

डेलीगेशन आया। महत्वपूर्ण अवसर था। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से बात शुरू हुई। औपचारिकताओं के बाद चंद्रशेखर ने ही टिप्पणी की। लेबर पार्टी का भारत की आजादी में बड़ा योगदान रहा है। लेबर पार्टी, दुनिया में स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के आंदोलन में जुड़ी रही है, पर हाल के दिनों में इसमें क्या परिवर्तन हुए हैं? आपके यहां काफमैन कौन हैं, जो भारत के बारे में अनाप-शनाप टिप्पणियां करते हैं? पूरा ब्रिटिश डेलीगेशन बचाव की मुद्रा में। वे सफाई देने लगे। भारत का विदेश मंत्रालय स्तब्ध, पर आह्लादित। स्तब्ध इस प्रसंग में कि प्रधानमंत्री ने 'अद्भुत मैच्युरिटी', कौशल और आत्मविश्वास का परिचय दिया। ब्रिटिश डेलीगेशन अत्यंत प्रभावित, भविष्य के रिश्ते और सुदृढ़ करने के प्रस्ताव के साथ लौटा। ऐसे अनेक प्रसंग हैं, विदेश मंत्रालय के तत्कालीन बड़े अफसर सुनाते हैं।

अमेरिका को कहा आप हमें ज्ञान मत दीजिए

इस देश के लोग जानते हैं कि भारत में ऐसे भी पूर्व प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने की अर्जी दी, अमेरिका गये, फिर भी समय नहीं मिला। आज अमेरिकी इशारों पर भारतीय राजनीति के नृत्य के दृश्य (पक्ष-विपक्ष दोनों) दो दशकों पहले तक शर्मनाक माने जाते। याद करिए चंद्रशेखर के समय, कांग्रेस, वीपी सिंह की सरकारों द्वारा सौगात में दिया गया अर्थसंकट था। चंद्रशेखर की सरकार के पास मजबूत राजनीतिक समर्थन और संगठन नहीं था। तब का एक प्रसंग। भारत-पाक सीमा पर 35 घुसपैठिये मारे गये थे। इसे लेकर अमेरिका के सीनेटरों ने भारत के खिलाफ मुहिम चलायी। मानवाधिकार के उल्लंघन के सवाल उठाये। भारत को अलग-थलग करने की कोशिश हो रही थी। उसी समय अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति भारत आये। विदेश विभाग बेचैन कि यह प्रसंग उठेगा ही। भारत क्या कहेगा? प्रधानमंत्री को विदेश मंत्रालय की चिंता की सूचना मिली।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से मिलने आये। इधर-उधर की चर्चा के बाद, वह मुद्दा उठा बैठे। कहा, आपकी सीमा पर 35 लोग मारे गये, इससे अमेरिकी सीनेटर काफी चिंतित व बेचैन हैं। चंद्रशेखर ने नपे-तुले शब्द में कहा कि महाशय आपके सीनेटरों से अधिक मैं अपनी सीमा, देश और समस्याओं को जानता हूं, जो लोग 100 वर्षों बाद भी बदला लेते हैं, उस कौम को हमें नसीहत-सलाह देने का हक नहीं है। सारे लोग स्तब्ध। फिर बराबरी पर बात हुई। अच्छे माहौल में बातचीत का सुखद अंत। 

हम अपने आपको कमजोर और असहाय क्यों मानें

हरिवंश आगे लिखते हैं कि याद रखिए, चंद्रशेखर को विरासत या सौगात में जर्जर अर्थव्यवस्था मिली थी। कंगाल और दिवालिया। उन दिनों लगातार चंद्रशेखर अपने भाषण में, बातचीत में कहते थे - हम अपने को इतना हीन, कमजोर और असहाय क्यों समझते हैं? दुनिया की मदद हमें चाहिए, तो हम भी 90 करोड़ की आबादी (1991 की आबादी) वाले देश हैं, हमारी मदद भी दूसरों को चाहिए। दूसरों को भी हमारी उतनी ही जरूरत है, जितनी हमें दूसरों की। बराबरी, समता और सम्मान का रिश्ता हो। दाता और याचक का नहीं। चंद्रशेखर के इन तर्कों को मैं सुनता, तो मुझे दिल्ली के सत्ता गलियारों में उन्हीं दिनों की एक चर्चित घटना याद आती। 

बगलें झांकने लगे विश्वबैंक के उपाध्यक्ष

विश्व बैंक के एक वाइस प्रेसीडेंट भारत आये थे। वह पाकिस्तानी मूल के थे। बाद में पाकिस्तान की राजनीति में थोड़े समय के लिए शिखर तक पहुंचे। 'कर्टसी काल' में वह प्रधानमंत्री से मिलने आये। बातचीत में उन्होंने विश्व बैंक के बाजारवाद, उपभोक्तावाद और ऐसे आर्थिक कदमों के बारे में चर्चा की। भारत के लिए सुझाव दिये। कहा कि विश्व बैंक, भारत को 'फेवर' करता है। चंद्रशेखर ने विश्व बैंक के अर्थदर्शन पर अपनी टिप्पणी की। विश्व बैंक के अर्थदर्शन व जड़ों पर प्रहार। उसके पीछे की राजनीति की ओर इशारा। उस वाइस प्रेसीडेंट ने कहा कि योर ऑनर, अगर विश्व बैंक अपनी सारी मदद बंद कर दे, तो भारत का क्या करेगा?

तब भारत गहरे अर्थसंकट में था। बैलेंस ऑफ पेमेंट की स्थिति नाजुक थी। प्रधानमंत्री का जवाब था : तुरंत टीवी-रेडियो पर जाऊंगा। देश को संबोधित करूंगा। कहूंगा कि सारे आयात बंद कर रहा हूं, जीवन रक्षक दवाएं व आवश्यक पेट्रोलियम उत्पादों के सिवा और हम अपने देशज हल ढूंढ़ लेंगे।

इसके बाद प्रधानमंत्री ने कहा कि मिस्टर वाइसप्रेसीडेंट, मैं एक बात कहूं?

क्या आपके विश्व बैंक या पश्चिमी देशों में ताकत है कि वे भारत के बाजार को नजरअंदाज कर दें। आप कंज्यूमर मार्केट चाहते हैं, इसलिए यहां आते हैं। याद रखिए कि आज भी भारत के 30 फीसदी लोगों का संबंध बाजार से नहीं है। नमक के सिवा वे दातून से खाने की चीजों तक, आपस में विनिमय करते हैं। यह भी याद रखियेगा कि आपके पश्चिमी बाजार को हमारी अधिक जरूरत है। आपको यहां बाजार चाहिए व उपभोक्ता चाहिए। वह हतप्रभ और अवाक रह गये, कहा, हमारा आशय यह नहीं था।

वह वाइस प्रेसीडेंट प्रधानमंत्री से मिल कर अहमदाबाद लौटे। शाम में अहमदाबाद में सनत मेहता को फोन किया। मेहता नर्मदा प्रोजेक्ट के प्रमुख थे। इसमें वर्ल्ड बैंक ने पैसा लगाया था। निजी बातचीत में सनत मेहता से इस वाइसप्रेसीडेंट ने कहा कि जब तक चंद्रशेखर इस देश के प्रधानमंत्री हैं, यहां कुछ संभव नहीं है। चंद्रशेखर के देशज सोच पर यह पश्चिमी ताकतों की टिप्पणी थी।

क्योंकि वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार विकास की बात करते थे।

विश्व बैंक ने उन दिनों भारत में नयी आर्थिक नीति लागू करने के संबंध में जो वैकल्पिक प्रस्ताव भेजे थे, प्रधानमंत्री रहते हुए चंद्रशेखर को वे नहीं दिखाये गये। नरसिंह राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह प्रसंग बहुत उछला। यह सवाल उठा कि विश्व बैंक के इशारे पर कैसे भारत की नौकरशाही ने चार महीने, विश्व बैंक के उस दस्तावेज को तत्कालीन प्रधानमंत्री से छिपाये रखा। अंदरूनी तथ्य यह है कि यह सिलसिला पहले से चल रहा था। वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे, तब अजीत सिंह ने नयी औद्योगिक नीति बनायी। यह नीति भी विश्व बैंक के दिशा-निर्देश के अनुरूप बनी थी। इससे भी पहले राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने नयी आर्थिक नीतियों का सूत्रपात किया।

वे भी विश्व बैंक की इच्छानुसार तय हुईं। तब से ही चंद्रशेखर इन अर्थनीतियों के खिलाफ अकेली आवाज बन गये। अपने दल की सरकार की औद्योगिक नीति (अजीत सिंह) के खिलाफ लोकसभा में अत्यंत प्रभावी बयान दिया। नरसिंह राव, मनमोहन सिंह की नयी अर्थनीति के खिलाफ पूरे देश में बहस चलवायी।

उदारीकरण की अर्थनीति पर 1993 में उन्होंने कहा था, 'मैं आज यह बात नहीं कर रहा हूं। जब 1991 में हमारे देश के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री जोरों से यह कह रहे थे कि हमको दुनिया के बाजार से अपने आपको जोड़ना है, तो मैंने उस समय संसद में कहा था कि आप किस बाजार से अपने को जोड़ना चाहते हैं? वह बाजार जो दो विश्वयुद्धों के लिए जिम्मेदार है? वह बाजार जो गरीब देशों को आपस में लड़ाता है? वे लोग मौत के सौदागर हैं और भारत जिंदगी का संदेश देनेवाला देश है। दोनों का एक साथ कोई समझौता नहीं हो सकता।'

विश्वबैंक, अमेरिका और ब्रिटेन को औकात बताने वाला पीएम पूंजीवादियों को रास नहीं आया

आज स्मरण करिए उनका यह स्टैंड! यह भी याद रखिए कि तब संसद में वाम से दक्षिण तक सब बाजार व्यवस्था के समर्थक बन गये थे।

दरअसल नव पूंजीवाद (नयी अर्थनीति के दौर को समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री नियो कैप्टलिज्म या बाजारवाद या ग्लोबलाइजेशन के नाम से भी पुकारते हैं) के इस दौर से चंद्रशेखर का पुराना बैर था। राजनीति में उनका उदय-विकास ही उस वैचारिक धरातल पर हुआ, जो निजी पूंजी के बढ़ते वर्चस्व को एक सुंदर समतामूलक समाज के लिए घातक मानता है। इसी आधार पर उनका युवा तुर्क आंदोलन परवान चढ़ा। बैंकों का राष्ट्रीयकरण या प्रिवीपर्स खत्म करने जैसे कदम या बिड़ला-टाटा के खिलाफ एकाधिकार के मामले, एक बड़े सपने को साकार करने की दिशा में उठे कदम थे। इस कारण हिंदुस्तान की बड़ी पूंजी, बड़े घराने, शुरू से ही उनके खिलाफ रहे। इसी बड़ी पूंजी ने एक बार राज्यसभा से उनका टिकट कटवाने की कोशिश की।

इन मामलों को भूपेश गुप्त व अन्य कई जानेमाने लोगों ने उन दिनों संसद में उठाया। इसी पूंजी ने उनकी सरकार को अस्थिर करने में भूमिका निभायी। 1990 में देश अर्थसंकट में था। उस दौरान चंद्रशेखर सरकार ने करीब 1200 करोड़ के कर कारपोरेट घरानों पर लगाये। इसमें से एक बड़े घराने पर सबसे बड़ा बोझ पड़ा। साधारण जनता पर कर नहीं लगाये गये। यह वह घराना था, जो आज राजनीति का भविष्य तय करता है।

वह अक्सर कहते थे कि देश संकट में है, तो जो संपन्न, समर्थ और ऊपर का तबका है, उसे अतिरिक्त कुर्बानी देनी होगी। बोझ उठाना होगा। बड़ी पूंजी या पूंजी के एकाधिकार के विरोध की भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। उनकी सरकार, हरियाणा के दो सिपाहियों द्वारा राजीव गांधी की चौकसी के कारण नहीं गयी।

पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमन (जो उन दिनों राष्ट्रपति थे) ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि राजीव गांधी ने कम-से-कम एक साल तक बिना शर्त चंद्रशेखर को समर्थन देने का आश्वासन दिया, तब चंद्रशेखर को सरकार बनाने के लिए न्योता गया। सरकार जाने के पीछे मूल कारण थे, बड़े घरानों द्वारा चंद्रशेखर के खिलाफ मुहिम, अयोध्या-प्रकरण पर हल के आसार, स्टेट्समैन और कुशल शासक के रूप में चंद्रशेखर का उदय, अमेरिकापरस्त ताकतों के खिलाफ मुहिम और प्रस्तावित बजट का भय।

चंद्रशेखर सरकार को बजट नहीं बनाने दिया गया। क्योंकि बड़े घरानों और समर्थक राजनीतिक दल के बीच यह चर्चा व चिंता का विषय था कि 1990 के अर्थसंकट से निबटने के लिए चंद्रशेखर सरकार जो देशज रास्ता ढूंढ़ रही थी या चंद्रशेखर अपने विचारों और अर्थदर्शन के अनुरूप बजट तैयार करवा रहे थे, उससे देश में आर्थिक मुद्दों पर मोरचाबंदी हो जाती। धर्म और जाति की राजनीति पीछे छूट जाती। भारत का ताकतवर इलीट क्लास, पूंजी-घराने और बड़े दल ऐसा नहीं चाहते थे। इसलिए चंद्रशेखर की सरकार गयी।

शासन करने की उनकी समझदारी (कॉमनसेंस), संपन्न विवेक और प्रति-उत्पन्नमति बेमेल थे। परदेश में अपनी छाप छोड़ने का वक्त उन्हें नहीं मिला। प्रधानमंत्री के रूप में उनके पास पूरा बहुमत होता और कार्यकाल लंबा होता, तो वे भारत-पाक संबंधों को पुख्ता और बेहतर करने के लिए साहस भरे कदम उठाते।

ऐसे महापुरुष को नमन!!

स्रोत : उपसभापति राज्यसभा श्री हरिवंशजी का आर्टीकल

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