स्मृति शेष / भारत के एक प्रधानमंत्री पाकिस्तान PM के नवाज शरीफ को डांटते थे और इस्लाम भी सिखाते थे

Zoom News : Jul 08, 2020, 12:15 PM
Political Desk | पड़ोसी देश पाकिस्तान के क्रिकेटर प्रधानमंत्री इन दिनों जिहाद का ज्ञान पेल रहे हैं और उनसे पहले भी कमोबेश ऐसे ही आए। उन्हें खुद इस्लाम की तहजीब पता है या नहीं हम नहीं जानते। लेकिन आज हम बात कर रहे हैं भारत के एक ऐसे प्रधानमंत्री की जिन्होंने पाकिस्तान के PM नवाज शरीफ को इस्लाम की शिक्षा दी और बताया कि इस्लाम क्या सिखाता है। मजहबी ज्ञान एक नहीं कई बार दिया गया। यही नहीं वे नवाज शरीफ को डांट देते थे और शरीफ उन्हें भाई जान— भाई जान कहते रह जाते।

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आज हम उन प्रधानमंत्री की पुण्यतिथि पर चर्चा करते हैं कि एक साधारण हिन्दू राजपूत परिवार में जन्मा युवक जो युवा तुर्क नाम से पहचाना गया। कभी किसी सरकार में मंत्री नहीं, सीधा प्रधानमंत्री रहा। उसने कैसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को अपना मुरीद बना लिया था। असंभव दिखने वाले काम चुटकियों में करवा लिए। परन्तु कांग्रेस की सत्ता लोलुपता ने उन्हें चार माह ही देश का पीएम रहने दिया और धोखे के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। समाजवादी और अर्थशास्त्री मानते हैं कि यदि यह व्यक्ति लम्बे समय तक भारत का प्रधानमंत्री रहता तो आत्मनिर्भर भारत का नारा आज देने की जरूरत नहीं होती। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिन मनमोहनसिंह की आर्थिक नीतियों की तारीफ करती कांग्रेस नहीं अघाती, उन्हें आर्थिक सलाहकार बनाकर बड़ा मौका इसी पीएम ने दिया था। जब सरकार जाने लगी तब इन्हें यूजीसी में नियुक्ति दी। 

स्मृति शेष / भारत के एक प्रधानमंत्री पाकिस्तान PM के नवाज शरीफ को डांटते थे और इस्लाम भी सिखाते थे

ये थे बलिया के बाबू साहब, युवा तुर्क चन्द्रशेखर! उनकी सरकार कश्मीर, पंजाब में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और उत्तर-पूर्व के उग्रवाद पर चंद्रशेखर सरकार ठोस कदम उठाने में जुटी थी। सार्थक पहल की कोशिश हो रही थी, ताकि दशकों के ये नासूर ठीक हो सकें। प्रधानमंत्री बनते ही चंद्रशेखर सार्क सम्मेलन के लिए मालदीव गये।

वहां पाकिस्तान से नवाज शरीफ आये थे। पहली ही भेंट में चंद्रशेखर ने उन्हें अपना प्रशंसक बना लिया। वह 'बड़े भाई' कह कर पुकारने लगे। अनौपचारिक चर्चा में कश्मीर प्रसंग पर चंद्रशेखर जी ने नवाज शरीफ से कहा, कश्मीर, कश्मीर की रट लगाते रहते हो आपलोग। चलो भारत कश्मीर आपको दे देगा, पर उसके साथ एक और समस्या सौगात मिलेगी। भारत धर्मनिरपेक्ष मुल्क है, कश्मीर उसका प्रतीक है। जिस दिन भारत से कश्मीर उधर गया कि सांप्रदायिक उभार, उफान और बाढ़ को रोकना मुश्किल होगा।

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तब अगर दूसरे राज्यों के अल्पसंख्यक भारी मात्रा में पाक जायेंगे, तो उन्हें रखने-बसाने और आबाद करने की क्षमता पाकिस्तान में है? नवाज, इस नाजुक मसले पर इस नयी दृष्टि को सुन कर चुप हो गये। हां, उनके भाषणों (पाक के अंदर या बाहर) में कश्मीर पर पाक के हक का उल्लेख बंद हो गया। इस प्रसंग के बाद चंद्रशेखर ने नवाज शरीफ से कहा, हमारा अतीत एक रहा है।

मिट्टी एक है। साझी संस्कृति रही है। अनेक चीजें हमें जोड़ती हैं, क्यों न हम जोड़नेवाले मुद्दों के पुल से गुजरें और बेहतर भारत-पाक बनायें। प्रधानमंत्री के रूप में उनके पास पूरा बहुमत होता और कार्यकाल लंबा होता, तो वे भारत-पाक संबंधों को पुख्ता और बेहतर करने के लिए साहस भरे कदम उठाते।

नवाज शरीफ को बोले भाई जान क्या बदमाशी करा रहे हो

चन्द्रशेखर के प्रधान सचिव एस के मिस्रा बताते हैं कि चंद्रशेखर को वो सम्मान नहीं मिला जिसके कि वो हक़दार थे। एक बार गुलमर्ग में कुछ स्वीडिश इंजीनयरों का अपहरण कर लिया गया. स्वीडन के राजदूत चंद्रशेखर से मिलने आए।

उन्होंने कहा, चलो नवाज़ शरीफ़ से बात करते हैं। फ़ोन पर उनके पहले शब्द थे, ''भाई जान, वहाँ बैठे-बैठे क्या बदमाशी करा रहे हो?'' इस पर नवाज़ शरीफ़ बोले कि इससे हमारा कोई वास्ता तो है नहीं। उनको तो मिलिटेंट्स ने पकड़ लिया।
इस पर चंद्रशेखर ने कहा, ''असलियत हमें मालूम है. असलियत आपको भी मालूम है। मुझे प्रेस में जाना नहीं है। मानवता के नाते ये इंजीनियर कल सुबह तक छूट जाने चाहिए और मुझे कुछ सुनना नहीं है। एस के मिस्रा कहते हैं कि अगले ही दिन ये इंजीनियर रिहा कर दिए गए।

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नवाज साहब! इस्लाम यह नहीं सिखाता

एक जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ नेता और सांसद सोज की लड़की का अपहरण हुआ। सूचना यही थी कि लड़की का अपहरण उग्रवादियों ने किया है। उसे पाक अधिकृत कश्मीर में रखा गया है। सोज ने चंद्रशेखर को फोन किया। एक पिता की परेशानी! बेटी का सवाल! चंद्रशेखर ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन किया। पता चला, वह बीजिंग (चीन) में हैं। शाम को अचानक एक पार्टी में भारत स्थित पाक के राजदूत अब्दुल सत्तार उन्हें मिल गये। जो बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री बने और चंद्रशेखर के प्रशंसक। चंद्रशेखर ने बिल्कुल अनकन्वेंशनल काम किया. सत्तार से कहा, नवाज शरीफ को मेरा संदेश भिजवा सकते हो? सत्तार ने कहा - हां सर! कहा, यह संदेश अधिकारियों या प्रॉपर चैनल की जानकारी में नहीं है। संदेश था कि जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ सोज की लड़की का अपहरण हुआ है। पाक टीवी और रेडियो पर तीन दिनों तक यह प्रचार हो कि जिन लोगों ने भी उक्त निर्दोष लड़की को अगवा किया है, अत्यंत गलत काम किया है। यह इसलाम के आदर्शों के अनुरूप नहीं है. लड़की को छोड़ दिया जाये. तीन दिनों तक पाक रेडियो व टीवी के बुलेटिन में यह प्रचार हुआ। लड़की मुक्त हो गयी। यह थी चन्द्रशेखर की स्टाइल। 

कारगिल पर बोले चन्द्रशेखर

कारगिल और क्रासबॉर्डर टेरेरिज्म' पर उनका नितांत साफ और सपाट रुख था। 1998 में कारगिल पर कहा, अजीब सरकार है। अपनी धरती पर, देश के अंदर अपनी सीमा में बाहरी सैनिक घुस आये। कई महीनों रहे। पर सरकार को मालूम नहीं।पता चला, तो अमेरिकी रुख के अनुसार कार्रवाई सीमित हुई। उस पर घोषणाएं ऐसी, मानो हम युद्ध जीत रहे हों। ठेठ सवाल। हमारे घर में कमरों पर दुश्मन कब्जा कर बैठा। पर हमें नहीं मालूम। जब पता चला, तो दुनिया से मदद मांग रहे हैं। अपने ही कमरे खाली करा कर जश्न मना रहे हैं, मानो दुश्मन देश की धरती कब्जे में आ गयी।

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उन दिनों क्रासबोर्डर टेररिज्म (देश के अंदर आतंकवाद) पर केंद्र सरकार के नेता रोज चिल्ला रहे थे, पाकिस्तान रोके। अमेरिका से गुहार लगा रहे थे। चंद्रशेखर कहते थे कि भारत-पाक सीमा पर कुछ हो, तो समझ में आता है। पर सीमा से दिल्ली तक आतंकवादी आ जाते हैं।संसद पर हमले की तैयारी के साथ। तो क्या देश के अंदर की ऐसी घटनाओं को रोकने की जिम्मेवारी पाकिस्तान पर है या हमारी सरकार और व्यवस्था पर? जब वे सीमा पार कर दिल्ली पहुंच रहे थे, तब हम क्या कर रहे थे?
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