संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम के तहत फ्रांस ने रूस और चीन के साथ मिलकर बहरीन द्वारा पेश किए गए एक प्रस्ताव के खिलाफ वीटो का प्रयोग किया है और यह प्रस्ताव होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की स्थिति से संबंधित था और इसे संयुक्त राज्य अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। 23 वर्षों के अंतराल के बाद यह पहली बार है जब फ्रांस ने किसी वैश्विक मुद्दे पर रूस और चीन के साथ गठबंधन किया है। इससे पहले वर्ष 2003 में इराक युद्ध के दौरान इन तीनों देशों ने अमेरिका के एक प्रस्ताव का इसी तरह विरोध किया था।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (P-5), जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन शामिल हैं, के बीच इस मतदान ने शक्ति संतुलन को बदल दिया है। बहरीन का यह प्रस्ताव यदि पारित हो जाता, तो ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव काफी बढ़ सकता था। हालांकि, फ्रांस के इस कदम ने अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन को एक बड़ा झटका दिया है। वर्तमान में सुरक्षा परिषद के भीतर अमेरिका का प्रभाव 3-2 के समीकरण से कमजोर होता दिखाई दे रहा है।
बहरीन का प्रस्ताव और सुरक्षा परिषद की कार्यवाही
बहरीन ने होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा और नौवहन की स्थिति को लेकर एक औपचारिक प्रस्ताव सुरक्षा परिषद के समक्ष रखा था और इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य ईरान की गतिविधियों पर अंकुश लगाना और क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय निगरानी बढ़ाना था। अमेरिका और ब्रिटेन ने इस प्रस्ताव का पूर्ण समर्थन किया था। अधिकारियों के अनुसार, मतदान के दौरान रूस और चीन ने अपनी पूर्व घोषित नीतियों के तहत वीटो किया, लेकिन फ्रांस का उनके साथ आना अप्रत्याशित माना जा रहा है। फ्रांस के इस निर्णय के कारण प्रस्ताव स्वतः ही निरस्त हो गया, जिससे ईरान को एक बड़ी कूटनीतिक राहत मिली है।
फ्रांस और अमेरिका के बीच बढ़ता कूटनीतिक तनाव
फ्रांस के इस कड़े रुख के पीछे कई कूटनीतिक कारण बताए जा रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर की गई हालिया टिप्पणियों ने दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ाई हैं और जंग की शुरुआत के समय अमेरिका ने फ्रांस के साथ पर्याप्त परामर्श नहीं किया था। इसके अतिरिक्त, अमेरिका चाहता था कि फ्रांस ईरान के खिलाफ युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाए, जिसे राष्ट्रपति मैक्रों ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था। फ्रांस ने अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति का हवाला देते हुए अमेरिका के दबाव में आने से इनकार कर दिया है।
इजराइल के साथ फ्रांस के संबंधों में गिरावट
मध्य पूर्व के मामले में फ्रांस का रुख इजराइल के साथ उसके तनावपूर्ण संबंधों से भी प्रभावित है। फ्रांस ने हाल ही में इजराइल की ओर जाने वाले उन सभी विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र (Airspace) बंद कर दिया है जो सैन्य सहायता से जुड़े हो सकते हैं। फ्रांस ने इजराइल पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप भी लगाए हैं। इसके जवाब में इजराइल ने पेरिस के साथ होने वाले रक्षा सौदों और हथियारों की खरीद की प्रक्रियाओं को रोक दिया है। यह कूटनीतिक रंजिश फ्रांस को अमेरिका और इजराइल के साझा रुख से दूर ले जा रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और व्यापारिक समझौते
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस के इस फैसले के पीछे आर्थिक और व्यापारिक हित भी शामिल हैं। ईरान युद्ध के दौरान पहली बार फ्रांस के स्वामित्व वाले एक बड़े कंटेनर जहाज को होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकलने दिया गया है और सूत्रों के अनुसार, फ्रांस और ईरान के बीच इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही को लेकर एक अनौपचारिक समझ बनी है। इस समझौते के तहत ईरान फ्रांस के व्यापारिक जहाजों को बिना किसी बाधा के मार्ग प्रदान करने पर सहमत हुआ है। यह आर्थिक हित फ्रांस के वीटो करने के निर्णय में एक प्रमुख कारक माना जा रहा है।
वैश्विक गठबंधन और नाटो पर संभावित प्रभाव
यूनाइटेड अगेंस्ट न्यूक्लियर ईरान (UANI) के विशेषज्ञों के अनुसार, फ्रांस ने अब मध्य पूर्व के मामलों में रूस और चीन के साथ खड़े होने का रणनीतिक विकल्प चुन लिया है। यह बदलाव भविष्य में नाटो (NATO) के भीतर भी दरार पैदा कर सकता है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक साक्षात्कार में नाटो की समीक्षा करने की बात कही है और गठबंधन से बाहर निकलने की संभावनाओं पर भी विचार करने का संकेत दिया है। फ्रांस, रूस और चीन का यह नया गठबंधन वैश्विक राजनीति के पुराने समीकरणों को चुनौती दे रहा है, जिससे अमेरिका की एकपक्षीय निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ सकता है।
