मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है क्योंकि हूती विद्रोहियों की रणनीतिक चालों ने दशकों पुराने गठबंधनों को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है। पहली नज़र में, एक हूती लड़ाका किसी साधारण मजदूर की तरह लग सकता है—दुबला-पतला शरीर, पैरों में हवाई चप्पल, लुंगी जैसा कपड़ा और एक पुरानी शर्ट। लेकिन जब ये लड़ाके हाथ में बंदूक और कंधे पर रॉकेट लांचर लेकर मैदान में उतरते हैं, तो अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर देते हैं। अरब प्रायद्वीप में वर्तमान में यही विरोधाभास सत्ता के संघर्ष को परिभाषित कर रहा है, जहाँ हूतियों ने क्षेत्रीय दिग्गजों के पारंपरिक प्रभुत्व को चुनौती दी है।
सऊदी अरब की आर्थिक घेराबंदी और तेल संकट
सऊदी अरब, जो कभी दुनिया में तेल का सुल्तान माना जाता था, आज अपनी समुद्री जीवन रेखाओं को कटते हुए देख रहा है। हूती हमलों ने किंगडम की अपने प्राथमिक संसाधन को परिवहन करने की क्षमता को प्रभावी ढंग से पंगु बना दिया है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने और बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य पर हूतियों के कड़े पहरे के कारण, पारंपरिक समुद्री मार्ग अब सुरक्षित नहीं रहे हैं। इसके अलावा, ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन भी ठप पड़ी है, जिससे सऊदी अरब चारों तरफ से घिर गया है। हूती आसमान से मिसाइलें बरसा रहे हैं, जबकि सऊदी अरब अपने पुराने सहयोगी अमेरिका की ओर सुरक्षा के लिए देख रहा है। हालांकि, वाशिंगटन की खामोशी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या अमेरिका चुप रहना चाहता है या उसे आधुनिक युद्ध की बदलती परिस्थितियों ने खामोश कर दिया है।
पवित्र शहर मक्का में रेड अलर्ट का साया
तनाव तब चरम पर पहुंच गया जब इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का की शांति हवाई हमले के सायरन से भंग हो गई। शाम की अजान खत्म होते ही सायरन की आवाज ने गलियों में खौफ पैदा कर दिया। इस डर का कारण यमन की ओर से दागे गए हूतियों के ड्रोन थे और हालांकि सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम ने इन ड्रोनों को मक्का शहर की सीमा पर ही मार गिराया, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर बहुत गहरा था। इतिहास में पहली बार मक्का शहर ने रेड अलर्ट के साये में सांस ली। हालांकि हूतियों ने मक्का पर हमले की खबरों को सऊदी प्रशासन की मनगढ़ंत कहानी बताया है, लेकिन इस घटना ने जेद्दा और ताइफ जैसे शहरों में भी असुरक्षा की भावना बढ़ा दी है, जो कथित तौर पर हूतियों की हिट लिस्ट में थे।
80 साल पुरानी दोस्ती और अमेरिका का यू-टर्न
वर्तमान संकट 14 फरवरी 1945 को बनी उस ऐतिहासिक संधि के अंत का संकेत दे रहा है जो यूएसएस क्विंसी जहाज पर हुई थी। स्वेज नहर की ग्रेट बिटर लेक में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और सऊदी संस्थापक सुल्तान अब्दुल अजीज के बीच हुई उस बैठक ने दोस्ती की नींव रखी थी। उस समय अमेरिका को तेल की जरूरत थी और सऊदी अरब को सुरक्षा की और अमेरिका ने रक्षा का भरोसा दिया और सऊदी ने तेल की आपूर्ति का वादा किया। यह दोस्ती 80 साल तक चली, लेकिन आज जब सऊदी अरब अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है, तो अमेरिका पीछे हटता दिख रहा है। सोमवार को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर से मुलाकात कर सुरक्षा की गुहार लगाई, लेकिन कूपर ने साफ कर दिया कि अमेरिका अब ईरान या उसके समर्थित गुटों के साथ किसी नए संघर्ष में नहीं उलझेगा।
गुप्त कूटनीति और धार्मिक विरासत का खौफ
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हूती के एक प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात की थी, जिसमें उन्होंने आश्वासन दिया कि उनके निशाने पर अमेरिकी नौसेना या वाणिज्यिक जहाज नहीं हैं, बल्कि उनका अभियान केवल सऊदी अरब तक सीमित है। इस आश्वासन के बाद वाशिंगटन ने हूती ठिकानों पर प्रत्यक्ष बमबारी न करने का फैसला लिया। इसके अलावा, एक बड़ा धार्मिक कारण भी अमेरिका को रोक रहा है। हूती जैदी शिया समुदाय से आते हैं और खुद को पैगंबर मुहम्मद के नवासे हसन और हुसैन का वंशज मानते हैं। अमेरिका जानता है कि हूतियों पर हमला दुनिया भर के शियाओं को एकजुट कर सकता है, जिससे निपटना किसी भी देश के लिए आसान नहीं होगा। हूती प्रमुख अब्दुल मलिक अल-हूती ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि सऊदी सेना हमला करेगी तो वे रियाद पर हमला करेंगे और यदि बंदरगाहों को निशाना बनाया गया तो वे सऊदी बंदरगाहों को तबाह कर देंगे। वाशिंगटन के लिए अब प्राथमिकता अपनी संपत्तियों को बचाना है, न कि सऊदी अरब के क्षेत्रीय युद्धों में ढाल बनना।
