भारतीय वायुसेना (IAF) अपनी सामरिक क्षमता को वैश्विक मानकों के अनुरूप उन्नत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, वायुसेना ने साल 2028 तक अपने राफेल लड़ाकू विमानों के बेड़े में स्वदेशी ‘अस्त्र’ (Astra) एयर-टू-एयर मिसाइलों को एकीकृत करने की योजना तैयार की है। यह पहल न केवल भारत की मारक क्षमता को बढ़ाएगी, बल्कि रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को भी एक नई दिशा प्रदान करेगी और वर्तमान में राफेल विमान यूरोपीय मिसाइल प्रणालियों जैसे मीटियोर और मीका से लैस हैं, लेकिन स्वदेशी मिसाइलों के शामिल होने से परिचालन लागत में कमी आने की संभावना है।
फ्रांसीसी कंपनियों के साथ तकनीकी और सॉफ्टवेयर सहयोग
राफेल विमानों में अस्त्र मिसाइलों के एकीकरण की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है, जिसके लिए विमान के मूल निर्माता और रडार सिस्टम प्रदाताओं के सहयोग की आवश्यकता होती है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, राफेल बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट एविएशन (Dassault Aviation) और रडार एवं इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम विशेषज्ञ कंपनी थेल्स (Thales) इस परियोजना में भारत को तकनीकी सहायता प्रदान करेंगी। ये कंपनियां मिसाइल को विमान के फायर कंट्रोल रडार और मिशन कंप्यूटर के साथ जोड़ने के लिए आवश्यक सॉफ्टवेयर कोड और हार्डवेयर संशोधन में मदद करेंगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सहयोग सुनिश्चित करेगा कि अस्त्र मिसाइल राफेल के अत्याधुनिक रडार सिस्टम के साथ पूरी सटीकता से तालमेल बिठा सके।
अस्त्र Mk-1 और Mk-2 मिसाइलों की मारक क्षमता
अस्त्र मिसाइल श्रृंखला को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित किया गया है और अस्त्र Mk-1 मिसाइल पहले से ही सुखोई-30MKI और स्वदेशी तेजस विमानों में सफलतापूर्वक तैनात की जा चुकी है, जिसकी मारक क्षमता 100 किलोमीटर से अधिक है। वहीं, आगामी अस्त्र Mk-2 मिसाइल को और भी अधिक घातक बनाया गया है, जिसकी अनुमानित रेंज लगभग 160 किलोमीटर है। यह मिसाइल बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) श्रेणी में आती है, जो दुश्मन के विमानों को उनकी नजर में आने से पहले ही नष्ट करने में सक्षम है। राफेल में इन दोनों संस्करणों के शामिल होने से भारतीय पायलटों को लंबी दूरी के हवाई युद्ध में बढ़त प्राप्त होगी।
परीक्षण और सत्यापन के विभिन्न चरण
मिसाइल को राफेल विमान में पूरी तरह से तैनात करने से पहले इसे कड़े परीक्षणों से गुजरना होगा। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, एकीकरण प्रक्रिया की शुरुआत कंप्यूटर सिमुलेशन और लैब परीक्षणों से होगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मिसाइल का वजन और आकार विमान के एयरोडायनामिक्स को प्रभावित न करे। इसके बाद 'कैप्टिव फ्लाइट ट्रायल्स' आयोजित किए जाएंगे, जिसमें मिसाइल को विमान पर लगाकर उड़ाया जाएगा लेकिन दागा नहीं जाएगा। अंतिम चरण में 'लाइव फायरिंग' टेस्ट होंगे, जहां मिसाइल को वास्तविक लक्ष्यों पर दागकर उसकी सटीकता और रडार एकीकरण की जांच की जाएगी। इन सभी चरणों के सफल समापन के बाद ही इसे सेवा में शामिल किया जाएगा।
रणनीतिक विश्लेषण और रक्षा आत्मनिर्भरता
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, राफेल में स्वदेशी हथियारों का एकीकरण भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में, विदेशी मिसाइलों के प्रत्येक स्टॉक के लिए भारत को भारी विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है और उनके रखरखाव के लिए भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है। अस्त्र मिसाइल के सफल एकीकरण से न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि युद्ध जैसी स्थितियों में हथियारों की आपूर्ति सुनिश्चित करना भी आसान हो जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भविष्य में अन्य विदेशी प्लेटफार्मों पर भी स्वदेशी हथियारों के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करेगा।
निष्कर्षतः, 2028 तक राफेल और अस्त्र मिसाइल का यह संगम भारतीय वायुसेना को दक्षिण एशिया में एक अद्वितीय हवाई शक्ति के रूप में स्थापित करेगा। यह परियोजना भारत के रक्षा उद्योग की परिपक्वता को दर्शाती है और वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत करती है।
