राज्यसभा के सभापति ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा पेश किए गए महाभियोग प्रस्ताव को आधिकारिक तौर पर खारिज कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने की मांग करते हुए संसद के दोनों सदनों में नोटिस दिया था। राज्यसभा के सभापति ने 'जजेस इंक्वायरी एक्ट 1968' की धारा 3 के तहत अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार, यह प्रस्ताव 12 मार्च को राज्यसभा में पेश किया गया था। इस नोटिस पर राज्यसभा के 63 सांसदों और लोकसभा के 130 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। नियमों के तहत, किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 या राज्यसभा के 50 सांसदों का समर्थन अनिवार्य होता है। हालांकि, सभापति ने प्राथमिक जांच और तकनीकी आधार पर इसे आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
सभापति द्वारा प्रस्ताव की तकनीकी अस्वीकृति
राज्यसभा के सभापति ने इस मोशन को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि 'जजेस इंक्वायरी एक्ट 1968' के तहत दी गई शक्तियों के आधार पर इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अधिकारियों के अनुसार, सभापति ने पाया कि प्रस्ताव में लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए थे। यह कानून सभापति को यह अधिकार देता है कि यदि उन्हें लगे कि आरोप निराधार हैं या प्रक्रियात्मक त्रुटियां हैं, तो वे प्रस्ताव को सदन के पटल पर चर्चा के लिए रखने से पहले ही रोक सकते हैं।
विपक्ष द्वारा लगाए गए प्रमुख आरोप
विपक्षी दलों द्वारा दिए गए नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए गए थे। टीएमसी द्वारा तैयार किए गए इस नोटिस में कुल 7 मुख्य बिंदुओं का उल्लेख किया गया था। इनमें प्रमुख रूप से चुनावी प्रक्रिया के दौरान किसी एक विशेष राजनीतिक दल का पक्ष लेने, चुनावी धांधली की शिकायतों की जांच को जानबूझकर बाधित करने और मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी करने के आरोप शामिल थे। विशेष रूप से बिहार और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे।
संवैधानिक सुरक्षा और निष्कासन की प्रक्रिया
भारतीय संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त का पद अत्यंत सुरक्षित माना जाता है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 124(5) में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की वही प्रक्रिया निर्धारित है, जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अपनाई जाती है। उन्हें केवल 'सिद्ध कदाचार' (Proved Misbehavior) या 'अक्षमता' (Incapacity) के आधार पर ही हटाया जा सकता है। भारत के संसदीय इतिहास में यह पहली बार था जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का औपचारिक नोटिस दिया गया था।
संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना एक जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए सरकार या प्रस्तावक दल को संसद के दोनों सदनों में 'विशेष बहुमत' प्राप्त करना होता है। नियमों के अनुसार, सदन की कुल सदस्यता के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है। यदि एक सदन में प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो दूसरे सदन में भी इसी प्रक्रिया को दोहराना पड़ता है। वर्तमान मामले में सभापति द्वारा प्रस्ताव खारिज किए जाने के बाद यह प्रक्रिया अब समाप्त हो गई है।
