भारत ने रावी नदी पर शाहपुर कंडी बैराज का निर्माण कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है और आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह प्रोजेक्ट 31 मार्च तक पूरी तरह से चालू हो जाएगा। इस विकास के साथ ही रावी नदी का वह अतिरिक्त पानी जो अब तक पाकिस्तान की ओर बह जाता था उसे पूरी तरह से रोक दिया गया है। जम्मू-कश्मीर के मंत्री जावेद राणा के अनुसार इस कदम का प्राथमिक उद्देश्य केंद्र शासित प्रदेश के सीमावर्ती जिलों कठुआ और सांबा में सिंचाई की सुविधाओं को सुदृढ़ करना है। अब इस पानी का उपयोग भारतीय क्षेत्रों में कृषि और बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा।
46 वर्षों का लंबा इंतजार और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रावी नदी पर इस महत्वपूर्ण परियोजना की नींव 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी। हालांकि इस प्रोजेक्ट की परिकल्पना 1979 में ही कर ली गई थी जब पंजाब और जम्मू-कश्मीर सरकारों के बीच रंजीत सागर बांध और शाहपुर कंडी बैराज के निर्माण को लेकर समझौता हुआ था। अंतर-राज्यीय विवादों और राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण यह परियोजना लगभग 46 वर्षों तक लंबित रही। वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने इस परियोजना को 'राष्ट्रीय परियोजना' घोषित करते हुए इसमें हस्तक्षेप किया जिसके बाद निर्माण कार्य में तेजी आई।
सिंचाई क्षमता और कृषि क्षेत्र को मिलने वाला लाभ
शाहपुर कंडी बैराज के पूर्ण होने से जम्मू-कश्मीर और पंजाब के कृषि परिदृश्य में बड़े बदलाव की उम्मीद है। अधिकारियों के अनुसार यह परियोजना लगभग 32,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि की सिंचाई में सहायक होगी। इसमें से जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों की 32,173 हेक्टेयर भूमि को सीधा लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त पंजाब में भी 5,000 हेक्टेयर से अधिक खेती योग्य भूमि को नियमित जल आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। यह परियोजना न केवल सिंचाई बल्कि जल विद्युत उत्पादन के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करेगी।
पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान लगभग 25% है और इसकी 80% खेती सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। रावी नदी के पानी के प्रवाह में कमी आने से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना है। लाहौर और मुल्तान जैसे प्रमुख शहरों की जलापूर्ति और रबी एवं खरीफ फसलों के उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। पाकिस्तान पहले से ही जल संकट और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है ऐसे में भारत द्वारा अपने हिस्से के पानी का पूर्ण उपयोग पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां उत्पन्न कर सकता है।
सिंधु जल संधि 1960 और भारत के कानूनी अधिकार
भारत का यह कदम 1960 की सिंधु जल संधि के प्रावधानों के पूर्णतः अनुरूप है। इस संधि के तहत तीन पूर्वी नदियों—सतलुज, ब्यास और रावी—के पानी पर भारत को विशेष और पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। वहीं पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—का पानी पाकिस्तान के लिए आवंटित है और अब तक पर्याप्त बुनियादी ढांचा न होने के कारण रावी का कुछ पानी पाकिस्तान चला जाता था जिसे भारत अब अपने बांधों के माध्यम से संचित कर रहा है। इसके अतिरिक्त भारत ने चिनाब और झेलम नदियों पर भी कई जलविद्युत परियोजनाओं पर काम तेज कर दिया है जो भविष्य में जल प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाएंगे।
