05 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। मिडिल-ईस्ट में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी को इस गिरावट का मुख्य कारण माना जा रहा है। 98 के स्तर तक गिरा था, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों ने इसे नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर धकेल दिया है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आयात पर दबाव
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $85 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों का 80% से अधिक हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण भारत के आयात बिल में बढ़ोतरी हुई है, जिससे डॉलर की मांग में भारी इजाफा हुआ है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जब भी कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होती है, भारतीय रुपया दबाव में आ जाता है क्योंकि तेल कंपनियों को भुगतान के लिए अधिक डॉलर की आवश्यकता होती है।
सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की बढ़ती मांग
इजराइल और ईरान के बीच युद्ध की स्थिति ने वैश्विक निवेशकों के बीच अनिश्चितता पैदा कर दी है। ऐसी स्थितियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) उभरते बाजारों जैसे भारत से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर और सोने की ओर रुख कर रहे हैं। डॉलर इंडेक्स में मजबूती आने से भारतीय रुपया कमजोर हुआ है। इस साल अब तक रुपए में 2% से अधिक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है, जिससे यह उभरते बाजारों की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक बन गई है।
घरेलू अर्थव्यवस्था और महंगाई पर संभावित प्रभाव
रुपए के कमजोर होने का सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ने की संभावना है। आयातित कच्चा माल महंगा होने से विनिर्माण लागत बढ़ सकती है। विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, लैपटॉप और ऑटोमोबाइल पार्ट्स की कीमतों में वृद्धि देखी जा सकती है क्योंकि इन वस्तुओं के पुर्जे बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में भी संशोधन की संभावना बनी रहेगी।
विदेशी व्यापार और आम नागरिकों पर असर
मुद्रा के अवमूल्यन का असर उन छात्रों पर सबसे अधिक पड़ेगा जो विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और डॉलर के मुकाबले रुपया गिरने से ट्यूशन फीस और रहने का खर्च बढ़ जाएगा। इसी तरह, विदेश यात्रा की योजना बना रहे पर्यटकों को भी अब डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपए खर्च करने होंगे। व्यापारिक दृष्टिकोण से, जो कंपनियां विदेशों से कच्चा माल मंगवाती हैं, उनके मार्जिन पर दबाव बढ़ेगा, हालांकि निर्यातकों को डॉलर में भुगतान प्राप्त होने के कारण कुछ लाभ मिल सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक की संभावित भूमिका
बाजार विशेषज्ञों और रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपए की अत्यधिक गिरावट को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है और केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके डॉलर की आपूर्ति बढ़ा सकता है ताकि रुपए में होने वाली अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सके। वर्तमान में रुपए की चाल पूरी तरह से वैश्विक तेल बाजार और मिडिल-ईस्ट के घटनाक्रमों पर निर्भर है। जब तक भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होता, मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।
