भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार 19 फरवरी को भारी उथल-पुथल देखी गई, जिसके परिणामस्वरूप निवेशकों को भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ा। कारोबार के दौरान प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स में लगभग 850 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। 75 पर पहुंच गया। इस व्यापक बिकवाली के कारण बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण, जो पिछले सत्र में ₹472 लाख करोड़ था, घटकर ₹468 लाख करोड़ रह गया। इस प्रकार, एक ही दिन में निवेशकों की संपत्ति में लगभग ₹4 लाख करोड़ की कमी आई है। बाजार में आई इस गिरावट का सबसे अधिक असर मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट की कंपनियों पर देखा गया।
मुनाफावसूली और घरेलू कारकों का प्रभाव
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के सत्रों में देखी गई बढ़त के बाद घरेलू बाजार में मुनाफावसूली का दौर शुरू हुआ है। बुधवार तक सेंसेक्स और निफ्टी 50 ने लगातार तीन सत्रों में बढ़त दर्ज की थी। केंद्रीय बजट, भारत-अमेरिका द्विपक्षीय समझौते और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति जैसे प्रमुख आर्थिक घटनाक्रमों के संपन्न होने के बाद बाजार में नए सकारात्मक ट्रिगर्स की कमी देखी जा रही है। तीसरी तिमाही के कॉर्पोरेट नतीजों का दौर भी लगभग पूरा हो चुका है, जिसके कारण निवेशकों ने ऊंचे स्तरों पर अपनी पोजीशन कम करना शुरू कर दिया है और घरेलू कारकों की अनुपस्थिति में बाजार अब वैश्विक संकेतों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक और ब्याज दरों पर अनिश्चितता
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की जनवरी में हुई बैठक के कार्यवृत्त (Minutes) से यह संकेत मिले हैं कि नीति निर्माता भविष्य की रणनीति को लेकर एकमत नहीं हैं और रिपोर्टों के अनुसार, फेड अधिकारियों के बीच इस बात पर मतभेद है कि ब्याज दरों में कटौती कब शुरू की जानी चाहिए। कुछ अधिकारियों का मानना है कि यदि मुद्रास्फीति में निरंतर गिरावट आती है तो राहत दी जा सकती है, जबकि अन्य का तर्क है कि कीमतों का दबाव बने रहने पर सख्त रुख जारी रखना आवश्यक होगा। ब्याज दरों में कटौती में देरी या दरों में संभावित वृद्धि की आशंका से डॉलर इंडेक्स मजबूत हो सकता है, जिसका सीधा असर भारतीय बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेश (FII) के प्रवाह पर पड़ सकता है।
भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान स्थिति
वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। मीडिया रिपोर्टों, विशेष रूप से सीएनएन और एक्सियोस के दावों के अनुसार, अमेरिकी सेना ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर सकती है। इन रिपोर्टों में संकेत दिया गया है कि यह अभियान कई हफ्तों तक चलने वाला एक बड़ा सैन्य अभियान हो सकता है। युद्ध जैसी स्थिति की आशंका ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है। बाजार के जानकारों का कहना है कि निवेशक सप्ताहांत से पहले किसी भी बड़े जोखिम से बचने के लिए अपनी पोजीशन घटा रहे हैं, जिससे बिकवाली का दबाव और बढ़ गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए चिंता का विषय बनी हुई है और 35 प्रति बैरल पर पहुंच गया था। 4 प्रति बैरल के स्तर पर बना रहा। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक मानी जाती हैं क्योंकि इससे व्यापार घाटा बढ़ने और रुपये पर दबाव आने की संभावना रहती है। ऊर्जा लागत में वृद्धि का सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर भी पड़ता है।
मूल्यांकन और मिडकैप-स्मॉलकैप में दबाव
बाजार में गिरावट का एक प्रमुख कारण शेयरों का उच्च मूल्यांकन (Valuation) भी बताया जा रहा है। जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के आंकड़ों के अनुसार, निफ्टी इंडेक्स वर्तमान में वित्त वर्ष 2027 के अनुमानित मुनाफे के लगभग 20 गुना पर कारोबार कर रहा है। इसके विपरीत, एनएसई मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स क्रमशः 28 और 24 गुना के उच्च मूल्यांकन पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लार्ज-कैप कंपनियों के शेयर अब उचित मूल्यांकन पर उपलब्ध हैं, लेकिन मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट में अभी भी काफी महंगापन है और इसी असंतुलन के कारण बाजार एक सीमित दायरे में कारोबार कर रहा है और किसी भी नकारात्मक खबर पर तेज प्रतिक्रिया दे रहा है।
