ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित युद्धविराम (सीजफायर) ने वैश्विक स्तर पर शांति की नई उम्मीदें जगाई हैं और मध्य पूर्व के अधिकांश देश इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, यूएई की इस नाराजगी के केंद्र में पाकिस्तान की भूमिका है, जिसने इस पूरे समझौते में एक 'मैसेंजर' या मध्यस्थ के रूप में कार्य किया है। यूएई का मानना है कि इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रक्रिया में उसके क्षेत्रीय हितों और सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता और यूएई की कूटनीतिक उपेक्षा
यूएई के विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका के निर्देशों पर इस सीजफायर की प्रक्रिया को अंजाम दिया, लेकिन इस दौरान क्षेत्र के एक महत्वपूर्ण हितधारक यूएई को विश्वास में नहीं लिया गया। यूएई के विशेषज्ञों का तर्क है कि पाकिस्तान ने समझौते के संदेशों में यूएई का उल्लेख तक नहीं किया, जबकि युद्ध के दौरान सबसे अधिक नुकसान अमीराती क्षेत्रों को ही उठाना पड़ा था। मनारा संस्था के चेयरमैन अली अल-नुएमी जैसे जानकारों ने इसे एक 'धोखा' करार दिया है। उनका कहना है कि समझौते से पहले न तो यूएई से सलाह ली गई और न ही उसे प्रक्रिया की जानकारी दी गई, जिससे कूटनीतिक स्तर पर दरार पैदा हो गई है।
युद्ध के दौरान यूएई को हुआ भारी बुनियादी ढांचागत नुकसान
फाइनेंशियल टाइम्स और यूएई रक्षा मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के साथ चले संघर्ष के दौरान यूएई को भीषण हमलों का सामना करना पड़ा था और आंकड़ों के मुताबिक, ईरान ने पिछले एक महीने में यूएई पर 2200 से अधिक ड्रोन और 500 बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले किए। इन हमलों ने विशेष रूप से दुबई, शारजाह और अबू धाबी जैसे प्रमुख शहरों को निशाना बनाया। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि इन हमलों में 10 अमीराती नागरिकों की जान गई और 26 क्रूज मिसाइलों का भी इस्तेमाल किया गया। यूएई का तर्क है कि जिस देश ने सबसे ज्यादा प्रहार झेले, उसे ही शांति प्रक्रिया से बाहर रखना अनुचित है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और रणनीतिक समझौतों पर विवाद
यूएई की नाराजगी का एक बड़ा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर हुई डील भी है। नीतिगत मामलों के जानकार अल-खलीफा के अनुसार, पाकिस्तान ने होर्मुज पर संयुक्त राष्ट्र की वोटिंग से खुद को अलग रखा था, लेकिन जब समझौते की बात आई, तो उसने ईरान की शर्तों को स्वीकार कर लिया और यह कदम यूएई के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि होर्मुज पर नियंत्रण और वहां की सुरक्षा यूएई की अर्थव्यवस्था और संप्रभुता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यूएई का मानना है कि इस समझौते में ईरान की आक्रामकता को रोकने के लिए कोई ठोस गारंटी नहीं दी गई है।
यूएई की सैन्य तैयारी और ईरान के साथ ऐतिहासिक मतभेद
वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, सीजफायर से पहले यूएई बड़े पैमाने पर युद्ध की तैयारी कर रहा था। यूएई ने इस संदर्भ में अमेरिका से सैन्य सहयोग पर चर्चा भी की थी और ईरानी नागरिकों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। यूएई की रणनीति ईरान के शासन को कमजोर करने और होर्मुज पर नियंत्रण के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य बल बनाने की थी और यूएई और ईरान के बीच 1905 से ही फारस की खाड़ी में स्थित तीन द्वीपों को लेकर क्षेत्रीय विवाद चल रहा है। यूएई को डर है कि इस सीजफायर के बाद ईरान फिर से अपनी विस्तारवादी नीतियों को बढ़ावा दे सकता है, जिसकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं होगा।
सुरक्षा गारंटी की कमी और भविष्य की अनिश्चितता
यूएई के सुरक्षा विशेषज्ञों का मुख्य सवाल यह है कि यदि ईरान भविष्य में फिर से हमले शुरू करता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? सीजफायर की घोषणा में इस बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि ईरान क्षेत्रीय देशों पर हमले पूरी तरह बंद कर देगा। यूएई के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गरगाश ने हालांकि आधिकारिक तौर पर खुद को इस संघर्ष में विजेता बताया है, लेकिन पर्दे के पीछे की नाराजगी स्पष्ट है। यूएई का मानना है कि पाकिस्तान और अमेरिका ने मिलकर एक ऐसा समझौता किया है जो केवल तात्कालिक शांति प्रदान करता है, लेकिन यूएई जैसे पड़ोसी देशों की दीर्घकालिक सुरक्षा को खतरे में डालता है।
